Odisha Viral Video: सिस्टम की बेरुखी की दर्दनाक तस्वीर, 20 हजार रुपये के लिए बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा भाई

Odisha Tribal Man Viral Video: बेबसी जब हद पार कर जाए, तो इंसान समाज के कायदे-कानून और डर सब भूल जाता है। ओडिशा के क्योंझर जिले से एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने न केवल बैंकिंग सिस्टम की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि प्रशासन को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

यहां एक बुजुर्ग आदिवासी भाई, अपनी मृत बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए उसका 'कंकाल' कंधे पर लादकर बैंक पहुंच गया। यह घटना 27 अप्रैल (सोमवार) की है, जिसने बैंक में मौजूद कर्मचारियों और ग्राहकों की रूह कंपा दी।

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Odisha Skeleton Viral Video का क्या है पूरा मामला?

क्योंझर जिले के पटना थाना क्षेत्र के मल्लिपाशी गांव के रहने वाले जीतू मुंडा (55) की बड़ी बहन कालरा मुंडा की करीब दो महीने पहले लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई थी। कालरा के 'ओडिशा ग्रामीण बैंक' के खाते में लगभग ₹19,300 जमा थे। गरीबी और तंगहाली से जूझ रहे जीतू मुंडा को पैसों की सख्त जरूरत थी। वह अपनी बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए कई बार बैंक के चक्कर लगा चुके थे।

बैंक अधिकारियों ने उन्हें यह समझाया की कि, जमा पैसे को निकालने के लिए खाताधारक को खुद आना होगा। जीतू ने बार-बार कहा कि उनकी बहन मर चुकी है, लेकिन फिर भी बैंक की ओर से उनसे बार-बार दस्तावेजी सबूत मांगे गए।

Jitu Munda ने मजबूरी में उठाया कदम

जीतू मुंडा अनपढ़ हैं और उन्हें बैंकिंग की जटिल प्रक्रियाओं (डेथ सर्टिफिकेट, लीगल हेयर सर्टिफिकेट) के बारे में जानकारी नहीं थी। बैंक के बार-बार चक्कर काटने और अधिकारियों की बेरुखी से तंग आकर जीतू ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। वे श्मशान घाट पहुंचे, अपनी बहन की कब्र खोदी और वहां से उसका कंकाल एक बोरी में भरकर सीधे बैंक पहुंच गए। उन्होंने बैंक के सामने वह कंकाल रख दिया।

प्रशासन ने क्या कहा?

बैंक में कंकाल देख हड़कंप मच गया। तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। थाना प्रभारी किरण प्रसाद साहू ने ANI से बताया-"जीतू एक अनपढ़ आदिवासी है। उसे नहीं पता था कि 'नॉमिनी' या 'लीगल हेयर' क्या होता है। बैंक अधिकारियों ने भी उसे प्रक्रिया समझाने में संवेदनशीलता नहीं दिखाई। हताशा में उसने अपनी बहन के अवशेषों को बैंक के सामने पेश कर दिया।"

क्योंझर के उप-कलेक्टर उमा शंकर दलाई ने मामले पर दुख जताते हुए कहा कि जीतू को कागजी कार्रवाई की समझ नहीं थी। प्रशासन अब जीतू मुंडा को डेथ सर्टिफिकेट और लीगल हेयर सर्टिफिकेट बनवाने में मदद कर रहा है। साथ ही, उन्हें रेड क्रॉस की तरफ से ₹20,000 की तत्काल सहायता देने और बैंक में जमा राशि जल्द से जल्द दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

एक बार फिर उठे सिस्टम पर सवालिया निशान

यह घटना केवल एक आदिवासी भाई की बेबसी नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) के अभाव और सरकारी संस्थानों की संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए बैंकिंग व्यवस्था इतनी कठिन हो चुकी है कि उन्हें अपनी बेबसी साबित करने के लिए इस हद तक जाना पड़े? क्या बैंक ने ग्राहक के घर जाकर Verification करने की कोशिश की? क्या स्थानीय प्रशासन ने मृत्यु के दो महीने बाद भी डेथ सर्टिफिकेट जारी करने में देरी की? जीतू मुंडा की आंखों का खालीपन आज पूरे सिस्टम से सवाल पूछ रहा है।

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