कहीं अब लोकसभा स्पीकर बनने से कतराने न लगें सांसद? जानिए कारण
नई दिल्ली- दो दशक हो चुके हैं। इन 20 वर्षों में लोकसभा स्पीकरों (Lok Sabha Speaker) के साथ एक अजीब संयोग जुड़ गया है। इस दौरान जितने भी लोकसभा स्पीकर (Lok Sabha Speaker) हुए हैं, वे दोबारा लोकसभा में वापसी नहीं कर सके हैं। अलबत्ता, पिछले स्पीकरों के दोबारा लोकसभा नहीं पहुंचने के कारण अलग-अलग हैं। मसलन कोई चुनाव हार गया, तो किसी को पार्टी ने ही निकाल दिया। एक स्पीकर की तो उनके कार्यकाल के दौरान ही हादसे में मौत हो गई। लेकिन, इनमें मौजूदा स्पीकर सुमित्रा महाजन की कहानी थोड़ी दिलचस्प है। वो इसबार चुनाव ही नहीं लड़ रही हैं, इसलिए वो अब लोकसभा में नहीं लौट रही हैं। यह एक बेहद रोचक ट्रेंड है, जिसे सिर्फ संयोग ही माना जा सकता है। पिछले दो दशकों से जारी इस ट्रेंड का विश्लेषण इसलिए भी अहम हो जाता है, क्योंकि भारत में स्पीकर का ओहदा बहुत ही सम्मानित और लोकसभा में सबसे ऊंचा है। वह संसद भवन का कस्टोडियन (custodian) भी है।

पिछली दो लोकसभा के स्पीकरों का अंजाम
मध्य प्रदेश के इंदौर से 8 बार सांसद रहीं लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन (Sumitra Mahajan) ने मौजूदा आम चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। वो जून 2014 में सर्वसम्मति से स्पीकर चुनी गई थीं और उन्होंने अपने व्यवहार से सभी पार्टियों के बीच अपनी एक लोकप्रिय छवि कायम की थी। अगर इस बार भी उन्हें बीजेपी टिकट देती, तो वह फिर से इंदौर से जीतकर लोकसभा में पहुंच जातीं। वो 67 वर्षों में लोकसभा की दूसरी महिला स्पीकर हैं। उनसे पहले मीरा कुमार ने स्पीकर की जिम्मेदारी संभाली थी। वो देश की पहली महिला स्पीकर बनीं थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार की सासाराम (सुरक्षित) लोकसभा सीट से उन्हें हार का सामना पड़ गया। इसलिए, वो लोकसभा नहीं पहुंच सकीं। हालांकि, इस चुनाव में वो फिर से सासाराम सीट से ही कांग्रेस के टिकट पर भाग्य आजमा रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि अबकी बार उन्हें फिर से लोकसभा पहुंचने का मौका मिलेगा। पिछली बार बीजेपी के छेदी पासवान के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाजन की तरह मीरा कुमार ने भी सभी दलों के बीच अपनी एक अच्छी छवि बनाई थी। कुमार की बेटी देवांगना कुमार ने 2014 के चुनाव के बारे में हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि,"बिहार ने एनडीए के पक्ष में असामान्य ढंग से वोटिंग किया था, और मेरी मां हार गई। इस बार वो फिर लड़ रही हैं और हमें भरोसा है कि वो विजयी होकर निकलेंगी। "

सोमनाथ चटर्जी के साथ क्या हुआ?
मीरा कुमार से पहले सोमनाथ चटर्जी (Somnath Chatterjee) को लोकसभा स्पीकर की जिम्मेदारी मिली थी। वे पहले और एकमात्र कम्युनिस्ट सांसद थे, जिन्हें 2004 में इस जिम्मेदारी के लिए चुना गया। जब वे स्पीकर चुने गए तो पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने उनपर चुटकी ली थी, "आप बोलपुर से चुन कर आए हैं। लेकिन यहां आप को कम बोलना पड़ेगा।" लेकिन, लोगों को शायद ही पता था कि जिस पार्टी से सांसद चुने जाने के कारण उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिली, वही उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर करेगी। अमेरिका से न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर लेफ्ट ने 2008 में मनमोहन सरकार से समर्थन खींच लिया था। पार्टी ने चटर्जी पर दबाव डाला कि स्पीकर का पद छोड़कर पार्टी सांसद के तौर पर सरकार के खिलाफ वोटिंग करें। लेकिन, वो तैयार नहीं हुए। तब पार्टी ने उन्हें निकाल दिया। बाद के चुनाव में सीपीएम ने उन्हे टिकट नहीं दिया और वे राजनीति से ही किनारे हो गए।

मनोहर जोशी भी चुनाव हार गए थे
सोमनाथ चटर्जी से पहले शिवसेना सांसद मनोहर जोशी (Manohar Joshi) सर्वसम्मति से लोकसभा स्पीकर चुने गए थे। उन्होंने जीएमसी बालयोगी की जगह यह अहम जिम्मेदारी संभाली थी, जिनका एक विमान हादसे में निधन हो गया था। 1999 के आम चुनाव में मनोहर जोशी लोकसभा के लिए चुने गए थे। उससे पहले वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे। शिवसेना में उनका कद बहुत बड़ा था। बावजूद इसके 2004 में वह लोकसभा चुनाव हार गए और फिर दोबारा लोकसभा नहीं पहुंच पाए।

नीलम संजीव रेड्डी के नाम रिकॉर्ड
पहले आम चुनाव के बाद से देश में अब तक कुल 16 स्पीकर (speaker) लोकसभा (Lok Sabha) का संचालन कर चुके हैं। इनमें से अकेले नीलम संजीव रेड्डी (Neelam Sanjeeva Reddy) अकेली ऐसी शख्सियत हैं जो दो बार स्पीकर (speaker) चुने गए हैं। उन्हें बाद में राष्ट्रपति बनने का भी मौका मिला था। जबकि, 16 में से सिर्फ 10 स्पीकर को ही लोकसभा के लिए दोबारा चुने जाने का मौका मिल पाया। पिछले 20 वर्षों में तो एक भी नेता को यह मौका दोबारा नहीं मिला है। यानी जो स्पीकर बना, वह अगले चुनाव में लोकसभा से बाहर हो गया, कारण जो भी हों।

बाकी स्पीकर्स का क्या रहा रिकॉर्ड?
जीएस मावलंकर (GS Mavalankar) भारत के पहले स्पीकर थे, जो 1952 में चुने गए थे। 1956 में उनका निधन हो गया, इसलिए उनके दोबारा चुने जाने का सवाल नहीं उठता। एक और स्पीकर केएस हेगड़ का भी दोबारा लोकसभा के लिए नहीं चुने जा सके। वे 1977 की इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव के बाद स्पीकर बने थे।
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