क्‍या सच में 12 अगस्‍त को नहीं होगी रात? जानिए वायरल मैसेज की हकीकत

नई दिल्‍ली। लोगों की आखें खोलने का जिम्‍मा अब ट्विटर, फेसबुक और व्‍हाट्सऐप ने ले रखा है। आपको नहीं लगता तो उदाहरण देख लीजिए। नोट में चिप है, 14 साल की लड़के की गूगल में नौकरी लग गई है या फिर चोटीकटवा घूम रहा है। अब ऐसी चीज वायरल हो रही है जिसे मानव जाति के लिए अदभुत बताया जा रहा है। जी हां सोशल मीडिया पर एक स्‍टोरी वायरल हो रही है जिसमें कहा गया है कि आने वाले 12 अगस्‍त को रात नहीं होगी। पूरी दुनिया में रात में भी दिन की तरह उजाला होगा। इस वायरल मैसेज का नासा के हवाले से दावा किया जा रहा है। तो आइए आपको इस वारयल मैसेज का सच बताते हैं।

क्‍या होगा 12 अगस्‍त की रात

क्‍या होगा 12 अगस्‍त की रात

वैज्ञानिक तथ्यों की मानें तो यह चमत्कार नहीं बल्कि एक आकाशीय घटना है और इसके पीछे नासा की रिपोर्ट इस वायरल हो रहे तथ्यों से अलग है। आपको बता दें कि आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर तेजी से जाते हुए कुछ पिंड पृथ्वी पर आकर गिरते हैं। इन्हें उल्का कहते हैं। इन्हें 'टूटते हुए तारे' और 'लूका' भी कहा जाता है। वायुमंडल में आने के बाद ये जलने लगते हैं और इनमें से उजाला होता है। खगोलविदों को मानना है कि ऐसी घटना हर साल जुलाई से अगस्त के बीच होती है लेकिन इस बार उल्का पिंड ज्यादा मात्रा में गिरेंगे, इसलिए कहा जा रहा है कि 11-12 अगस्त की रात आसमान में अंधेरा नहीं बल्कि उजाला होगा।

प्रति घंटे 200 उल्‍का पिंड गिर सकते हैं

प्रति घंटे 200 उल्‍का पिंड गिर सकते हैं

नासा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल गिरने वाले उल्का पिंड की मात्रा पहले के मुकाबले ज्यादा होगी। नासा के मुताबिक इस साल 11-12 अगस्त की मध्यरात्रि में प्रति घंटे 200 उल्का पिंड गिर सकते हैं। नासा के मुताबिक उत्तरी गोलार्द्ध में इसे अच्छे तरीके से देखा जा सकता है।

लोगों तक पहुंचाएं सही खबर

लोगों तक पहुंचाएं सही खबर

जहां तक बात है सूर्य जैसी रोशनी (जैसा की दावा किया जा रहा है कि रात ही नहीं होगी) होने की तो यह सरासर गलत है। जानकारों के अनुसार किसी भी तरह के उल्कापात में भले ही वह कितनी भी ज्यादा क्यों न हो रही हो, उसमें दिन जैसी रोशनी नहीं हो सकती। इसलिए अगर आपके पास भी इस तरह के संदेश आ रहे हैं तो इन अफवाहों को न फैलाकर सही खबर लोगों तक पहुंचाएं।

और क्‍या है अफवाह

और क्‍या है अफवाह

सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें वायरल हो रही हैं कि ऐसा 96 साल बाद हो रहा है। तो आपको बता दें कि ये पूरी तरह झूठ है। ये मीटियर शॉवर यानी उल्का बारिश हर साल होती है वो भी एक नहीं तीन तीन बार। एक बार जनवरी में, फिर अगस्त में और लास्ट जनवरी में। नासा ने ये बताया है कि इस बार की उल्का बारिश हर बार से ज्यादा होगी लेकिन ऐसा नहीं है कि हजारों सालों में ऐसा कभी हुआ ही नहीं।

क्या होते हैं उल्कापिंड

क्या होते हैं उल्कापिंड

उल्कापिंड असल में छोटे-छोटे पत्थर या मेटैलिक बॉडी होते हैं, जो बाहरी अंतरिक्ष में घूमते रहते हैं। उल्कापिंड भी एस्टेरॉयड (क्षुद्रग्रह) की तरह ही होते हैं, लेकिन यह उनसे काफी छोटे होते हैं। यह एक छोटे से अनाज के दाने से लेकर एक मीटर तक बड़े होते हैं।

कैसे चमक उठते हैं उल्कापिंड

कैसे चमक उठते हैं उल्कापिंड

अंतरिक्ष में घूमते हुए उल्कापिंड जब धरती के वायुमंडल में पहुंचते हैं तो उनकी गति 20 किमी प्रति सेकेंड यानी 72 हजार किमी प्रति घंटा तक होती है। इतनी तेज गति से धरती के वायुमंडल में पहुंचने की वजह से घर्षण होता है और इस घर्षण के कारण इनमें आग लग जाती है। जिसकी वजह से यह चमक उठते हैं और टूटते हुए तारे का आभास देते हैं।

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