कभी लालू यादव के राइट हैंड हुआ करते थे नीतीश, फिर बन गए सबसे बड़े विरोधी, पढ़ें क्या पूरा किस्सा
बिहार की राजनीति जिन 3 नामों के आसपास घूमती है, वह नाम हैं लालू यादव, नीतीश कुमार और सुशील मोदी। आज के टाइम में ये तीनों एक दूसरे के बड़े राजनीतिक विरोधी हैं।
लेकिन कभी बिहार की राजनीति नीतीश कुमार की लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की सुशील कुमार मोदी से दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं। राजनीतिक कारणों से इनकी दोस्ती में दरारें भी आई लेकिन समय आने पर दोस्त दोस्त के काम भी आए।

आज सबसे पहले बात नीतीश कुमार और लालू यादव की दोस्ती की करते हैं। लालू और नीतीश पटना में कॉलेज के दिनों के दोस्त रहे हैं। दोनों ही बिहार में समाजवादी छात्र राजनीति का हिस्सा थे। जेपी आंदोलन में भी दोनों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। उस समय लालू यादव का राजनतीकि कद नीतीश के मुकाबले ज्यादा था। साल 1977 में लालू और नीतीश दोनों ने ही जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। लालू लोकसभा के लिए और नीतीश विधानसभा के लिए चुनावी मैदान में उतरे थे। इस चुनाव में लालू यादव को जहां जीत मिली तो नीतीश चुनाव हार गए। इसके बाद 1980 में हुए चुनाव में लालू विधानसभा का चुनाव तो जीते लेकिन लोकसभा का चुनाव हार गए।
नीतीश कुमार की हार का सिलसिला यहां भी जारी रहा और वे दोबारा चुनाव हार गए, लेकिन 1985 में वो समय भी आया जब दोनों नेता एकसाथ विधानसभा पहुंचे। तब तक लालू मंझे हुए नेता के रूप में उभर चुके थे और नीतीश उस समय नए थे। साल 1989 के आम चुनाव में लालू और नीतीश दोनों ही लोकसभा के लिए चुने गए। जब 1990 में जनता दल ने बिहार विधानसभा में बहुमत हासिल किया तो लालू यादव मुख्यमंत्री बने और नीतीश उनका दाहिना हाथ बने।
नीतीश को यहां से उम्मीद थी उन्हें अधिक महत्व दिया जाएगा, लेकिन लालू यादव ने उन्हें धीरे-धीरे इग्नोर करना शुरू कर दिया। दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं और दोनों अलग हो गए। लालू यादव ने आगे चलकर आरजेडी का गठन किया और नीतीश कुमार ने जेडीयू का। एक समय तो ऐसा भी आया जब नीतीश ने आरजेडी से गठबंधन तोड़ बीजेपी का दामन थामा और दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी बन गए। समय ने फिर से करवट ली और नीतीश ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ लालू से हाथ मिलाया।
वहीं बात अगर नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी की दोस्ती की करें तो बिहार की सियासत में जय-वीरु कहे जाने वाले इन दोनों दोस्तों के सियासी रास्ते अब अलग-अलग हो चुके हैं। कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो ऐसा ही दिखता है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब नीतीश कुमार और सुशील मोदी की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। नीतीश और सुशील कुमार मोदी दोनों जेपी आंदोलन से जुड़े नेता रहे हैं और एक दूसरे पर भरोसा करते हैं।
सुशील मोदी के बिना नीतीश कुमार खुद को अधूरा महसूस करते थे। हाल ही में नीतीश कुमार ने जब बीजेपी से गठबंधन तोड़ा तो उन्होंने कहा था कि अगर सुशील मोदी होते तो ये नौबत ही नहीं आती। मतलब नीतीश कुमार सीएम कुर्सी सिर्फ और सिर्फ सुशील मोदी के लिए छोड़ने को तैयार थे। जेडीयू के नेता भी मानते हैं कि सुशील मोदी और नीतीश कुमार के बीच काफी अच्छे संबंध रहे हैं। यही वजह है कि जेडीयू के नेता सुशील मोदी पर रिएक्शन देने से भी परहेज करते हैं। साल 2020 से पहले बिहार में जब-जब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ सत्ता में रहे तब-तब उनके जूनियर पार्टनर के तौर पर सुशील मोदी साथ रहे। मगर अब ये संबंध धीरे-धीरे सियासी होते दिख रहे हैं।












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