जायज था नीतीश के ‘डीएनए’ पर मोदी का सवाल?

क्योंकि ‘नीतीश के ‘डीएनए’ में खोट’ जैसी बात को एक गाली के रूप में लिया गया था। महागठबंधन के समर्थक लोग अब नीतीश के ‘डीएनए’ पर मोदी के सवाल को जायज मानने लगे हैं।

दिल्ली। बिहार के सीएम नीतीश कुमार को बिहार विधानसभा में बहुमत मिल गया। 131 विधायकों ने उनके समर्थन में वोट किया। आनन-फानन में महागठबंधन (राजद-जदयू-कांग्रेस) तोड़कर भाजपा खेमे में पहुंचे नीतीश कुमार पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वह सियासी हमला आज याद रहा है। वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने भाजपा का साथ छोड़ने पर नीतीश कुमार को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि नीतीश कुमार के डीएनए में ही खोट है। इसे लेकर बिहार में भारी हंगामा हुआ और आखिरकार महागठबंधन की जीत हुई तथा भाजपा चुनाव हार गई। मोदी न जब नीतीश के 'डीएनए' पर सवाल खड़ा किया था तो यह बात सबको नागवार गुजरी थी। क्योंकि 'नीतीश के 'डीएनए' में खोट' जैसी बात को एक गाली के रूप में लिया गया था। महागठबंधन के समर्थक लोग अब नीतीश के 'डीएनए' पर मोदी के सवाल को जायज मानने लगे हैं।

 जायज था नीतीश के ‘डीएनए’ पर मोदी का सवाल?

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    कहा जा रहा है कि सच में 'नीतीश के 'डीएनए' में खोट' है, वरना जिस महागठबंधन के बल पर चुनाव बाद मुख्यमंत्री बने थे, उसका साथ नहीं छोड़ते। हालांकि 28 जुलाई को बिहार विधानसभा में बहुमत साबित करने के दौरान नीतीश कुमार ने कहा कि सांप्रदायिकता की आड़ में भ्रष्टाचार का साथ नहीं दिया जा सकता। मैं सबको आईना दिखाऊंगा। हमारे अस्तित्व को नकारने की कोशिश की गई है। सत्ता सेवा के लिए होती है भ्रष्टाचार के लिए नहीं। सदन में नीतीश के विश्वासमत हासिल होने के बाद विधानसभा से बाहर निकले पूर्व उप मुख्यमंत्री व राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि एक तरफ 28 साल के नौजवान ने सिर नहीं झुकाया और दूसरी तरफ मंझे हुए खिलाड़ी ने आरएसएस के आगे घुटने टेक दिए, जो जनादेश महागठबंधन को मिला था, आज नीतीश जी ने उसे अपमानित करने का काम किया है।

    मेरे सवालों का जवाब नीतीश जी के पास नहीं था। यह सब माहौल बनाने के लिए नाटक किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की जनता को अमानित किया है। जनता ठगा हुआ महसूस कर रही है। आज विश्वासमत के खिलाफ आरजेडी, कांग्रेस ने वोट किया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जनादेश महागठबंधन को मिला था। खैर, 1985 में पहली बार विधायक बनने से पहले नीतीश कुमार का जीवन संघर्षपूर्ण रहा है। 26 जुलाई को बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीनफा देने वाले नीतीश का जीवन सादगीपूर्ण रहा है। नीतीश बचपन से ही ना केवल ईमानदार थे बल्कि समाज सुधारक की भूमिका में भी रहे। पटना से 50 किलोमीटर दूर बख्तियारपुर में नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को हुआ। पिता रामलखन सिंह वैद्य और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन पर गांधी जी के विचारों की अमिट छाप थी। नीतीश कुमार का घरेलू नाम मुन्ना है। उनके शिक्षक बताते हैं कि नीतीश बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे। नीतीश बचपन से ही राजनीतिक तौर पर भी जागरूक थे।

    पत्रकार संकर्षण ठाकुर की किताब 'सिंगल मैन: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नीतीश कुमार ऑफ बिहार' के मुताबिक नीतीश ने विद्युत बोर्ड में नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पकड़ी। 1974 में नीतीश ने जेपी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1974 से 1977 के बीच वो उस समय के कद्दावर नेता सत्येन्द्र नारायण सिंह के काफी करीब आ गए। 1985 में नीतीश ने पहली बार बिहार विधान सभा का चुनाव हरनौत सीट से जीता। विधायक बनने से पहले नीतीश का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा है। धनाढ्य परिवार से नहीं होने की वजह से उन्हें आर्थिक परेशानियां भी उठानी पड़ीं। हालांकि, तब उनके कई दोस्तों ने उन्हें कई तरह से मदद की थी। 1989 में नीतीश केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हुए। उसी साल कांग्रेस के खिलाफ जनता दल का गठन हुआ। तब नीतीश जनता दल के महासचिव बने। उसी साल नौवीं लोकसभा के चुनाव में नीतीश ना सिर्फ बाढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए बल्कि वीपी सिंह की सरकार में केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री भी बनाए गए। 1991 में चंद्रशेखर की सरकार गिरने के बाद दसवीं लोकसभा के चुनाव में भी नीतीश बाढ़ से सांसद चुने गए। एनडीए के शासन काल में भी नीतीश अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल के सदस्य रहे।

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    इस दौरान वो भूतल परिवहन मंत्री, कृषि मंत्री, फिर रेल मंत्री बने। नीतीश साल 1998 से 1999 तक रेल मंत्री रहे। बंगाल की गैसल रेल दुर्घटना पर उन्होंने रेल मंत्री से इस्तीफा दे दिया था। बाद में वो साल 2001 से लेकर 2004 तक वाजपेयी सरकार में दोबारा रेल मंत्री रहे। बीच में साल 2000 में कुछ दिनों के लिए वो पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री भी बने। 1990 में जब लालू यादव बिहार के सीएम बने थे, तब नीतीश के साथ उनकी दोस्ती बहुत गाढ़ी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह रामसुंदर दास को सीएम बनाना चाहते थे तब शरद यादव व नीतीश कुमार ने उप प्रधानमंत्री देवीलाल से मिलकर लालू को सीएम बनवाया था। बाद में इन नेताओं के बीच खटास आ गई।

    ताजा घटनाक्रम में नीतीश कुमार ने 26 जुलाई को बि‍हार के सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही उन्होंने एक तीर से कई शिकार किए। वह पिछले कई महीनों से भाजपा से करीबी होने के संकेत दे रहे थे। 2014 में जिस तेवर और तल्खी के साथ उन्हों ने नरेंद्र मोदी का विरोध किया था और उसी नाम पर एनडीए से नाता तोड़ दिया था, वह तेवर मोदी की प्रचंड जीत के बाद से ही नरम पड़ने लगा था। 20 महीने पहले जब नीतीश मुख्यमंत्री बने थे उसके कुछ महीनों के बाद उनका भाजपा-मोदी विरोध कमजोर ही पड़ता गया। असल में नीतीश को राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन मजबूरी में करना पड़ा था। जाहिर है, मजबूरी बि‍हार विधानसभा चुनाव में सत्तां में वापसी की थी। पर गठबंधन का दांव उल्टा पड़ा। राजद ज्यादा फायदा उठा ले गया। नीतीश सीएम तो बन गए पर लालू का संख्याबल लगातार उन्हें दबाता रहा। बताते हैं कि लालू कुछ-कुछ उसी अंदाज में सरकार चलवाने लगे जैसा वह खुद सीएम रहते हुए चलाते थे। ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए इलाकों पर दावेदारी ठोंकी जाने लगी। आरोप है कि मंत्री-विधायक कभी भी किसी कारोबारी-पूंजीपति के यहां धमकने लगे। नीतीश ने शराबबंदी की तो कई सफेदपोश रसूख के दम पर गलत तरीके से शराब बेचने-पीने में व्येस्त रहे। नीतीश को लगने लगा कि यह गठबंधन उनकी छवि‍ पर बहुत भारी पड़ेगा। लोकतंत्र में संख्या बल ही सबसे अहम है। सरकार चलाना है तो सहना पड़ेगा। पर इसी बीच एक रास्ता निकला। भाजपा के साथ बढ़ते प्यार का इजहार करते हुए नीतीश ने इस्तीफा देकर महागठबंधन तोड़ दिया।

     जायज था नीतीश के ‘डीएनए’ पर मोदी का सवाल?

    राजग से अलग होने के बाद, भाजपा से फिर कभी न जुड़ने की कसम वाले उनके ढेरों बयान याद किए जा सकते हैं। पर अब वे भाजपा के पाले में हैं और भाजपा उनके साथ है। मोदी, नीतीश के प्रशंसक हो गए हैं, और नीतीश, मोदी के मुरीद। इस्तीफा देते ही जिस तरह फौरन मोदी से लेकर भाजपा के अनेक नेताओं ने नीतीश की तारीफ में ट्वीट किए, और कुछ ही घंटों में नए गठजोड़ से लेकर नई सरकार तक सब कुछ तय हो गया, उससे ऐसा लगता है कि शायद खिचड़ी पहले से पक रही थी! कह सकते हैं कि नीतीश के सामने बड़ी विकट स्थिति थी। मंत्रिमंडल से तेजस्वी के न हटने पर भी अगर वे राजद के साथ सरकार चलाते रहते, तो उनकी अपनी छवि धूमिल होने का खतरा था। ईमानदारी और सुशासन को नीतीश अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी मानते होंगे। पर फिर से भाजपा का दामन थाम लेने से उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को चोट पहुंची है। साथ ही यह कहा जाने लगा है कि बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'नीतीश के 'डीएनए' में खोट' वाली जो बात कही थी, वह सच निकली। बहरहाल, अब देखना है कि नीतीश कुमार की भाजपा के साथ यह नई यारी कितने दिनों तक निभती है?

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