संसद में जब हिंदी और संस्कृत से पीछे छूट गई अंग्रेजी

नए सांसदों ने जब शपथ ली तो हिंदी, संस्कृत, गुजराती और पंजाबी के साथ देश की कई क्षेत्रीय भाषाओं का दबदबा कायम था। वहीं अंग्रेजी इन भाषाओं के मुकाबले कहीं पीछे छूटती नजर आ रही थी।
हिंदी और दूसरी भाषाओं के लिए अच्छी खबर उस समय आई जब इंडियन एक्सप्रेस ने इस बात की जानकारी दी कि जब सितंबर में नरेंद्र मोदी अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे तो वह वहां पर भी कई अतंराष्ट्रीय नेताओं से हिंदी में ही बात करेंगे।
नरेंद्र मोदी इंटरप्रेटर यानी दुभाषिए की मदद अपने पहले अमेरिकी दौरे पर लेंगे। गौरतलब है कि चीन या फिर जापान के नेता या फिर फ्रांस के नेता जब कभी भी विदेशी दौर पर जाते हैं तो वह अपनी ही भाषाओं में बात करते हैं। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई हमेशा विदेशी दौरों पर हिंदी को ही प्राथमिकता देते थे।
जब राजपक्षे से की हिंदी में बात
नरेंद्र मोदी अंग्रेजी में इतने सहज हैं कि उन्हें अंग्रेजी का हिंदी में अनुवाद करने के लिए दुभाषिए की जरूरत नहीं है। हाल ही में मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के लिए जब श्रीलंकन राष्ट्रपति राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे दिल्ली आए थे तो वह तो नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान वह अंग्रेजी में ही बोल रहे थे, लेकिन उनकी बात समझने के लिए प्रधानमंत्री को एक बार भी दुभाषिए की जरूरत नहीं पड़ी।
मोदी ने अपने जवाब हिंदी में ही दिए, जिसे दुभाषिए ने राजपक्षे को समझाया। ओमान के सुल्तान के विशेष दूत के लिए भी उन्होंने यही प्रोटोकॉल अपनाया।
वाजपेयी के रास्ते पर नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी हिंदी को प्राथमिकता देकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के ही रास्ते पर चल पड़े हैं। अटल बिहारी वाजेपई भारत के ऐसे एकमात्र नेता हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में जब कभी भी अपना भाषण दिया तो हमेशा हिंदी का ही प्रयोग किया।
वह अक्सर हिंदी में ही बात करते थे लेकिन जहां जरूरत होती थी तो अंग्रेजी से भी परहेज नहीं करते थे। ऐसे मौके पर हमेशा दुभाषिए की मदद ली जाती थी।












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