शहीदों को सलाम: 79 साल से आज भी रहस्य क्यों बनी 'नेताजी' की मौत? आजादी के लिए ठुकरा दिया था ICS का पद
Saheedo Ko Salam: 'सुभाष चंद्र बोस', जिन्हें प्यार से नेताजी के नाम से जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख और करिश्माई नेताओं में से एक थे। उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) की स्थापना की और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का नारा दिया। बोस (Subhash Chandra Bose) का साहस, नेतृत्व और क्रांतिकारी दृष्टिकोण उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख चेहरा बनाता है। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। वह अपने अद्वितीय साहस, दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प के लिए जाने जाते हैं।
सुभाष चंद्र बोस का जन्म एक समृद्ध और शिक्षित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता, जानकीनाथ बोस, एक प्रतिष्ठित वकील थे। सुभाष ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक में की और बाद में प्रेसिडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। वे ब्रिटेन गए और वहां से भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा पास की, लेकिन भारत की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकरा दिया। वनइंडिया आपको अपनी 'शहीदों को सलाम' सीरीज के जरिए बोस के योगदान से रूबरू करा रहा है...

कैसे हुई थी राजनीति में एंट्री?
सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से भारतीय राजनीति में एंट्री ली। वे महात्मा गांधी के नेतृत्व में कार्यरत थे, लेकिन उनके उग्र और क्रांतिकारी दृष्टिकोण के कारण उनका दृष्टिकोण कांग्रेस के नरमपंथी नेताओं से अलग था। उन्होंने 1938 में हरिपुरा अधिवेशन और 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला।
आजाद हिंद फौज (INA) की स्थापना
सुभाष चंद्र बोस ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से आजाद हिंद फौज (INA) की स्थापना की। उन्होंने भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना से अलग करके INA में शामिल किया और जापान और जर्मनी जैसे देशों से समर्थन प्राप्त किया। उन्होंने "दिल्ली चलो" और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" जैसे नारों से भारतीय जनमानस को प्रेरित किया।
अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष
INA ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ बर्मा (अब म्यांमार) और भारत की सीमाओं पर संघर्ष किया। बोस की अगुवाई में INA ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी और अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया। उनके नेतृत्व ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लाठियां खाई, नजरबंद हुए, जेल गए...फिर भी नहीं डगे कदम
- असहयोग आंदोलन (1921): जब वे असहयोग आंदोलन में शामिल हुए, उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल में रखा गया। इस दौरान उन्हें अंग्रेजों द्वारा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
- 1930 का दशक: जब वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता बने और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुलकर बोले, तो उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। जेल में उन्हें प्रताड़ित किया गया और कई बार लाठी-डंडों से मारा गया।
- 1939 में गिरफ्तारी: जब वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तब उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अपना विरोध जारी रखा। इस कारण से उन्हें नजरबंद किया गया। नजरबंदी के दौरान भी उन्हें मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी गईं।
वियना में हुआ स्टेनोग्राफर प्रेम, फिर शादी
सुभाष को 1934 में देश से निर्वासित किया तो वियना पहुंचे। यहां उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने का फैसला किया। उन्होंने अपने दोस्त डॉ. मिस्टर माथुर से एक स्टेनोग्राफर की जरूरत बताई, जिसे अंग्रेजी की समझ और तेज टाइपिंग स्पीड हो। माथुर के नजर में जर्मन-अंग्रेजी की समझ रखने वालीं ऑस्ट्रिया में 26 दिसंबर, 1910 में पैदा हुईं वेटनेरी डॉक्टर बाबा यानी ग्रैंडफ़ादर शूमेकर की बेटी एमिली शेंकल थीं। एमिली ने स्टेनोग्राफर का कोर्स भी किया था। बोस की एमिली से मुलाकात हुई। 24 साल की एमिली बेहद सुंदर थीं। एमिली को सुभाष अच्छे लगने लगे। 1942 में दोनों की शादी हुई।
क्यों दिया था 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का नारा?
सुभाष चंद्र बोस का नारा "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" 4 जुलाई 1944 को बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में इंडियन नेशनल आर्मी (INA) को संबोधित करते हुए दिया गया था। यह नारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जोश और उत्साह भरने के लिए दिया गया था, जिससे देशभक्तों में देश के लिए बलिदान देने की प्रेरणा जागी।
मौत 79 साल बाद भी अनसुलझा रहस्य
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। 1945 में ताइवान में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की आधिकारिक घोषणा के बावजूद, इस घटना के बारे में कई साजिश सिद्धांत और विवादित मत आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। उनके निधन के बारे में स्पष्टता की कमी और विभिन्न सिद्धांतों ने उनकी मौत को एक गहरे रहस्य में बदल दिया है।
क्या थी मौत की घटना की घोषणा?
18 अगस्त 1945 को, ताइवान (तब फॉर्मोसा) में एक विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु होने की आधिकारिक घोषणा की गई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, विमान टेकऑफ़ के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया और बोस गंभीर रूप से जल गए। उन्हें ताइपेई के एक अस्पताल में ले जाया गया, जहां उनकी मृत्यु हो गई। उनके अंतिम संस्कार की रिपोर्ट भी उपलब्ध है, जिसमें उनके अवशेषों को टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में सुरक्षित रखा गया है।
'अयोध्या का गुमनामी बाबा', जीवित होने के दावे
- कई लोगों का मानना है कि बोस विमान दुर्घटना में नहीं मरे थे, बल्कि वे गुप्त रूप से रूस या किसी अन्य देश में चले गए थे।
- कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, बोस ने अपना नाम बदलकर गुमनामी का जीवन जीया। उदाहरण के लिए, गुमनामी बाबा के रूप में जाना जाने वाला एक व्यक्ति, जो अयोध्या में रहता था, को नेताजी माना गया।
मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए आयोग गठित
- शाह नवाज कमेटी (1956): इस कमेटी ने विमान दुर्घटना में बोस की मृत्यु की पुष्टि की।
- खोसला आयोग (1970): इस आयोग ने भी विमान दुर्घटना में बोस की मृत्यु की पुष्टि की।
- मुखर्जी आयोग (1999-2005): इस आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि ताइवान में कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई थी और बोस की मृत्यु की कहानी पर संदेह जताया।

एक नजर में जानें सबकुछ
प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के रूप में योगदान
- क्रांतिकारी विचारधारा: बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरमपंथी विचारधारा से अलग होकर स्वतंत्रता के लिए आक्रामक और क्रांतिकारी दृष्टिकोण अपनाया।
- इंडियन नेशनल आर्मी (INA): उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) की स्थापना की और भारतीय स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया।
- अंतरराष्ट्रीय समर्थन: बोस ने जर्मनी, जापान और अन्य देशों से समर्थन प्राप्त किया ताकि ब्रिटिश राज के खिलाफ मजबूत सैन्य और राजनीतिक मोर्चा खड़ा किया जा सके।
अंग्रेजों को दी टक्कर
- कांग्रेस के भीतर संघर्ष: 1939 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराकर कांग्रेस अध्यक्ष बने। हालांकि बाद में उन्हें अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा।
- विदेशी समर्थन: बोस ने जर्मनी और जापान से समर्थन प्राप्त किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारत पर हमला करने की योजना बनाई।
- आजाद हिंद फौज (INA): बोस ने INA का नेतृत्व किया और 'दिल्ली चलो' का नारा दिया। उन्होंने बर्मा (अब म्यांमार) और भारत की सीमाओं पर ब्रिटिश सेनाओं से मुकाबला किया।
भारत की आजादी में भूमिका
- सशस्त्र संघर्ष: उन्होंने INA के माध्यम से ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया।
- राष्ट्रीय जागरूकता: बोस ने अपने भाषणों और कार्यों के माध्यम से भारतीय जनता में स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता और उत्साह पैदा किया।
- अंतरराष्ट्रीय समर्थन: बोस ने विभिन्न देशों से समर्थन प्राप्त कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक मंच पर ले जाने का प्रयास किया।

परिवार में कौन-कौन?
- पिता: जानकीनाथ बोस
- मां: प्रभावती देवी
- पत्नी: एमिली शेंकल
- बच्चे: उनकी एक बेटी थी, अनीता बोस फाफ
बोस के परिवार के जीवित सदस्य
- अनीता बोस फाफ: डॉ.अनीता बोस फाफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल की बेटी हैं। वह वर्तमान में जर्मनी में रहती हैं और एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं।
- अनीता बोस फाफ ने अपने पिता की विरासत को जीवित रखा है और उनकी याद में कई कार्यक्रमों और सेमिनारों में भाग लेती हैं। वह अपने पिता की जीवनी और उनके विचारों पर शोध करती हैं।
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