नरेंद्र मोदी की एक जीत ने तोड़ दिया अमेरिका, ब्रिटेन का दंभ

Narendra Modi-western nations
वाशिंगटन। नरेंद्र मोदी की लैंडस्‍लाइड जीत के बाद न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी जश्‍न का माहौल है। जिस तरह की विशाल जीत नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने दर्ज की है, उससे राजनीति के विशेषज्ञ भी हैरान हैं।

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इसकेसाथ ही नरेद्र मोदी की इस विशाल जीत ने पश्चिम के कई देशों को एक ऐसी मुश्किल परिस्थिति में डाल दिया है जिसके बाद उनके पास मोदी से हाथ मिलाने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है।

कभी काटते थे कन्‍नी अब हाथ मिलाने को मजबूर
वे सभी देश जिन्‍होंने हमेशा नरेंद्र मोदी से कन्‍नी काटने की कोशिश की, अब केंद्र में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नई दिल्‍ली ही उनके लिए एक अहम साझीदार बनने वाला है।

अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा हों या फिर दूसरे देशों के नेता, सभी ने नरेंद्र मोदी को न सिर्फ फोन करके चुनाव जीतने की बधार्इ दी बल्कि उन्‍हें अपने देश आने का न्‍यौता भी दिया। इन सभी नेताओं की ओर से भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी दिखाई दी।

यह सभी उन्‍हीं देशों की सरकारें हैं जिन्‍होंने वर्ष 2002 के गोधरा दंगों के बाद हमेशा मोदी को तिरछी नजरों से देखा तो वहीं अमेरिका ने मानवाधिकारों के आधारों पर वर्ष 2005 में नरेंद्र मोदी को वीजा देने से ही इंकार कर

दिया। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह बात साफ की जा चुकी है कि उसके पास इस बात के कोई सुबूत नहीं हैं जिनसे यह साबित होता हो कि वर्ष 2002 में गुजरात में हुई हिंसा को भड़काने में नरेंद्र मोदी का कोई रोल था।

तो झेलना होगा बड़ा नुकसान
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के मिला वैष्‍णव कहते हैं कि अमेरिकी अधिकारी इस बात से काफी बेहतरी से वाकिफ हैं कि अगर उन्‍होंने नरेंद्र मोदी के साथ कोई संबंध नहीं रखें या फिर उन्‍हें जानने की कोशिश नहीं कि तो फिर उनके लिए वास्‍तविक नुकसान होगा।

विशषज्ञों के मुताबिक जैसे-जैसे इस बात की संभावना बढ़ती गई कि नरेंद्र मोदी चुनावों में जीत हासिल करने वाले हैं, यूनाइटेड स्‍टेट्स ऑफ अमेरिका संबंधों को बेहतर करने में लग गया। भारत में अमेरिका की राजदूत नैंसी पावेल की फरवरी में मोदी के साथ हुई मुलाकात इसी का हिस्‍सा थी।

इसके साथ ही अमेरिका की ओर से यह बात भी साफ कर दी कि उसे नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री वीजा देने में कोई समस्‍या नहीं है।

अमेरिका के अलावा दूसरे पश्विमी देश जैसे ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से भी उनके लचीले रुख का पता लगता है। चुनावों से ब्रिटेन और फ्रांस के राजूदतों ने नरेंद्र मोदी से व्‍यक्तिगत तौर पर मुलाकात की और उन्‍हें चुनावों में जीत के लिए शुभकामनाएं भी दीं।

नहीं मिले नरेंद्र मोदी से तो संबंधों पर पड़ेगा असर
वर्ष 2005 में जब नरेंद्र मोदी के वीजा को लेकर विवाद शुरू हुआ था उस समय एक वरिष्‍ठ अमेरिकी डिप्‍लोमैट की ओर से यह चेतावनी दी गई थी कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार 'अमेरिका विरोधी होगी और साथ ही अमेरिका के साथ कम आपसी सहयोग वाली होगी।'

इस चेतावनी के बारे में विकीलीक्‍स की ओर से खुलासा किया गया था। जिस समय अटल बिहारी वाजपेई देश के प्रधानमंत्री थे, उस समय अमेरिका और भारत के रिश्‍तों में गर्मजोशी आनी शुरू हुई थी। नरेंद्र मोदी के पास अभी विदेश नीति का वह अनुभव नहीं है।

उसके बावजूद उन्‍होंने बयान दिया था कि अतंराष्‍ट्रीय संबंध देश हित के आधार पर आगे बढ़ने चाहिए न कि किसी व्‍यक्ति को इसके केंद्र में रखकर इस पर कुछ सोचा जाना चाहिए। इस बयान के बाद अमेरिकी अधिकारियों को इस बात की उम्‍मीद है कि नरेंद्र मोदी अमेरिका के खिलाफ किसी भी तरह का कोई बैर भाव नहीं रखेंगे।

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