मैं थक गई हूं, अब पैरों में दम नहीं हैः नजीब की मां
दिल्ली में सीबीआई मुख्यालय के बाहर कुछ नौजवान प्रदर्शनकारी सेल्फ़ी ले रहे हैं. डिवाइडर पर नजीब की मां फ़ातिमा नफ़ीस गुमसुम सी खड़ी हैं.
जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी के छात्र नजीब को ग़ायब हुए पूरा एक साल हो चुका है. इस एक साल में फ़ातिमा नफ़ीस ने कई प्रदर्शन किए हैं, पुलिस की लाठियां खाई हैं और मीडिया को कई इंटरव्यू दिए हैं.
वो बीते चौबीस घंटों से सीबीआई मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रही थीं और हर बार की तरह इस बार भी जांच एजेंसी ने उन्हें नजीब को खोज लेने का भरोसा दिया है.
फ़ातिमा नफ़ीस से जब मैंने बात शुरू की तो वो उम्मीद से भरी थीं. उन्होंने कहा, "सीबीआी ने जो पिछले छह महीने में किया है वो मेरी समझ से परे है, लेकिन सीबीआई को जांच अदालत ने दी है और उन्हें अदालत को ही जवाब भी देना है. मुझे उम्मीद है कि इस प्रदर्शन का असर होगा और सीबीआई अगली सुनवाई में अदालत के सामने कुछ ठोस पेश करेगी."
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नजीब के बिना एक साल
नजीब के बिना बीता एक साल कैसा रहा इस सवाल के जवाब पर वो कहती हैं, "मेरे पास अपनी मुश्किल बयां करने के लिए लफ्ज़ नहीं हैं. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, लेकिन मैं बयान नहीं कर सकती हूं. मैंने ये एक साल नहीं बल्कि इस दौरान एक-एक लम्हे के दर्द को महसूस किया है."
तमाम मुश्किलों के बाद अभी भी फ़ातिमा नफ़ीस ने अपने बेटे नजीब के मिलने की उम्मीद नहीं छोड़ी है. वो कहती हैं, "मैं एक उम्मीद के साथ जी रही हूं. ये उम्मीद ही मेरा हौसला बढ़ाती है. मैं उस पल का इंतज़ार कर रही हूं जब हज़ारों लोगों की दुआओं में असर होगा और मेरा बेटा नजीब वापस लौटेगा."
एक मां अपने गुम हो गए बेटे के लिए क्या-क्या कर सकती है, फ़ातिमा नफ़ीस इसकी मिसाल हैं. वो कहती हैं कि बीते एक साल के दौरान बहुत कुछ है जो उनकी ज़िंदगी में पीछे छूट गया है, रिश्तेदार दूर हो गए हैं, ग़ैर अपने बन गए हैं.
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इंसानियत पर यक़ीन
वो कहती हैं, "ज़िंदगी के मैंने वो रंग देख लिए हैं जो कभी सोचे भी नहीं थे. ये साल बहुत तकलीफ़देह रहा है. जो मेरे ख़ून के रिश्ते थे वो अब दूर हो गए हैं और जिनसे इंसानियत का रिश्ता था वो क़रीब आ गए हैं. अब मेरे रिश्ते उन्हीं से हैं जो एक साल से मेरे साथ खड़े हैं. ये लोग जो मेरे साथ जुड़े हुए हैं ये इंसानियत के ग़वाह हैं और ये इस बात का सबूत है कि अभी दुनिया से इंसानियत ख़त्म नहीं हुई है."
नजीब के साथ देखे गए ख़्वाबों के बारे में बात करते वक़्त उनकी आंखों में एक चमक सी थी, उन्होंने कहा, "मैंने नजीब के साथ जो ख़्वाब देखे थे वो अभी भी मेरी आंखों में हैं. पढ़ाई का तो मैं नहीं कह सकती कि मैं उन्हें यहां छोड़ूंगी या नहीं, लेकिन मैंने हमेशा सोचा था कि मैं उनके बच्चों की परवरिश करूंगी, उनके साथ अच्छा वक़्त बिताऊंगी और मुझे उम्मीद है कि मेरे ये ख़्वाब पूरे होंगे. मेरा नजीब जहां भी है अल्लाह की पनाह में है, अल्लाह बेहतर जानने वाला और बेहतर करने वाला है. वो जब घर से निकला था तब मैंने उसे अल्लाह की हिफ़ाज़त में छोड़ा था और वो जहां होगा महफ़ूज़ होगा."
लेकिन उनकी आंखों की ये चमक अचानक आंसुओं में बदल गई. हिम्मत की मूर्ति बनी मां टूटी सी नज़र आई. लड़खड़ाते शब्दों में उन्होंने कहा, "मैं थक गई हूं. थक गई हूं. बहुत थक गई हूं. मुझसे चला नहीं जाता. बहुत मजबूर हूं. अगर मैं हूं तो इतने लोग यहां हैं. मैं नहीं आऊंगी तो मेरे बेटे के लिए कोई नहीं आएगा."
"उम्मीद करती हूं जल्द से जल्द सबकी दुआएं पूरी हों और नजीब घर वापस आएं, मैं घर बैठ पाऊं. थक चुकी हूं. अब पैरों में दम नहीं है."












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