''मेरे ज़िंदा बच्चे को मेरी मरी हुई बच्ची के साथ सुला रखा था''

Posted By: BBC Hindi
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मैक्स अस्पताल, दो बच्चों की मौत, शालीमार बाग़
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मैक्स अस्पताल, दो बच्चों की मौत, शालीमार बाग़

'' जब वर्षा ने बताया था कि वो मां बनने वाली है तब मैं बहुत ख़ुश हुआ था. तीन साल बाद परिवार पूरा होने जा रहा था. बाप बनने की ख़ुशी बहुत बड़ी होती है. लेकिन अब...''

एक पिता जिसने पहले 30 नवंबर को अपनी बेटी का अंतिम संस्कार किया. अब वो अपने बेटे की नन्ही लाश का अंतिम संस्कार करने जा रहे थे.

आशीष वही बेबस पिता हैं जिनके ज़िंदा बच्चे को दिल्ली के शालीमार बाग़ स्थित मैक्स अस्पताल ने मृत बता पैकेट में लपेटकर दे दिया था.

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कहां से लाऊं बच्चे?

आशीष कहते हैं कि मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा क्या करूं, किससे कहूं? रोना चाहता हूं लेकिन रोऊंगा तो बाक़ियों को कौन संभालेगा? वर्षा को ढांढ़स कौन देगा?

वर्षा उनकी पत्नी हैं जिन्होंने एक हफ़्ते के भीतर अपने दो बच्चों को खो दिया. आशीष बताते हैं कि वो वर्षा के सामने नहीं जा रहे हैं.

उन्होंने बताया, ''वो मुझे देखते ही रोने लगती है. बच्चों का पूछती है...कहां से लाऊं बच्चे? वो तो मर गए.''

"घर में किलकारियां सुनने की तैयारी हो रही थी"

मृत बच्चों के दादा कैलाश कहते हैं जिस घर में एक हफ़्ता पहले तक किलकारियों के सुनने की तैयारी हो रही थी, आज सन्नाटे में वहां मक्खी भिनक रही है. हमारे बच्चे तो चले गए और अब उन्हें मारने वालों से भी लड़ना पड़ रहा है.

उस दिन को याद करते हुए कैलाश की आंखें भर आती हैं. वो कहते हैं, हमारा तो सब चला गया. 28 नवंबर से अब तक की हर छोटी-बड़ी बात वो एक सांस में बताने लग जाते हैं.

वो कहते हैं, 'वर्षा बिल्कुल ठीक थी. हम लोग उसका बहुत ख्याल रखते थे. खाना-पीना, दवा-दारू सब. पैसा नहीं सोचते थे. बस दिमाग़ में एक ही बात चलती रहती थी कि जुड़वा ख़ुशियां आने वाली हैं.'

जब उनसे पूछा कि क्या वर्षा को प्रेग्नेंसी में कोई दिक्क़त थी? गुमसुम बैठे आशीष बोल पड़ते हैं, 'नहीं-नहीं... मैं हर छोटी बात का ख्याल रखता था.'

डॉक्टरों ने नर्सरी का भारी भरकम चार्ज बताया था

उन्होंने बताया कि वर्षा को रूटीन चेक-अप के लिए पश्चिम विहार के अट्टम नर्सिंग होम ले जाते थे. वहां डॉक्टर स्मृति ने हर बार यही कहा कि सब नॉर्मल है लेकिन जब वर्षा के वॉटर बैग से लीकेज होने लगी तो उन्होंने मैक्स हॉस्पिटल जाने के लिए कहा.

मैक्स का नाम लेते ही आशीष गहरी सांस लेते हुए कहते हैं, 'पता नहीं यहां क्यों आया. डॉक्टर स्मृति ने मैक्स में डॉक्टर उमा रानी से मिलने के लिए कहा था. हम यहां आए और वर्षा को भर्ती करा दिया. 35 हजार के तीन इंजेक्शन लगाए. डॉक्टर ने कहा वर्षा तो ठीक है लेकिन बच्चों को जन्म के बाद 12 हफ़्ते तक नर्सरी में रखना होगा.'

आशीष बताते हैं कि वो थोड़ा परेशान हो गए थे. उन्होंने मैक्स अस्पताल के चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर एपी मेहता से भी बात की तो उन्होंने बताया कि शुरू के चार दिन बच्चों को नर्सरी में रखने के हर दिन के हिसाब से एक लाख लगेंगे और बाद में 50 हज़ार.

कैलाश बताते हैं कि हम लोगों के पास इतना पैसा नहीं है फिर भी हमनें सोचा कि बच्चों के लिए कुछ इंतज़ाम कर लेंगे.

बेटी मृत ही पैदा हुई थी

29 नवंबर को शाम 5 बजे मैक्स अस्पताल में ही वर्षा का अल्ट्रासाउंड हुआ था, जहां बच्चों के पूरी तरह स्वस्थ होने की बात कही गई.

30 नवंबर को सुबह 7:30 बजे बेटे का जन्म हुआ और 7:42 पर बेटी का लेकिन वो मृत ही पैदा हुई थी. बच्चों के नाना प्रवीण बताते हैं कि उन लोगों को 8 बजे बच्चों को देखने के लिए बुलाया गया.

कैलाश उस पल को याद करके रोने लगते हैं. वो कहते हैं, 'मेरे ज़िंदा पोते को, मरी हुई पोती के साथ सुला रखा था. उनको साफ़ भी नहीं किया गया था. बिना कपड़े के उनको ऐसे ही लिटाकर छोड़ दिया था. बताइए कोई ज़िदा बच्चे को मरे बच्चे के साथ सुलाता है?'

आशीष ने कहा, 'मैंने सोचा चलो एक बच्चा नहीं बचा लेकिन दूसरा तो है. पर साढ़े 12 बजे हमें कहा गया कि वो बच्चा भी मर गया.

बच्चों का पार्सल का पैकेट हिलने लगा

आशीष अपने दोनों हाथ दिखाते हुए कहते हैं, इन्हीं हाथों में दो पैकेट दे दिए गए. कहा गया आपके बच्चे हैं.

मेरे बच्चों को पार्सल बना दिया था. हम बच्चों को लेकर चंदर विहार श्मशान जा रहे थे तभी मधुबन चौक पर वो पैकेट हिलने लगा जो मेरे ससुर के हाथ में था. पहले हमें लगा गाड़ी हिली है लेकिन जब देका तो पैकेट हिल रहा था.

मेरे ससुर ने कहा कि लगता है बच्चा ज़िंदा है. मेरा दिमाग़ सन्न था.

पैकेट खोलना शुरू किया. मालूम पांच परत में लपेट रखा था मेरे ज़िंदा बच्चे को. 3 मिनट में पैकेट खुला. उसे देखकर समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो रहा है...

उसके बाद मैं अपने ज़िंदा बच्चे को लेकर प्रीतमपुरा के अग्रवाल अस्पताल गया. वहां डॉक्टर को पुरानी कोई बात नहीं कही.

वहां डॉक्टर संदीप अग्रवाल ने बताया कि बच्चे के बचने की उम्मीद बहुत कम है. इंफ़ेक्शन हो रखा है. फिर भी हमने कहा कि इलाज कीजिए. बच्चे का इलाज वहीं चल रहा था. फिर कल उसने दम तोड़ दिया.

आशीष कहते हैं हम बहुत आम लोग हैं. हमें ज़्यादा समझ नहीं आता. हमारे दिमाग़ में सिर्फ़ इतना था कि बच्चा बच जाए लेकिन किसी को 45 मिनट तक सांस न आए तो वो तो मर ही जाएगा...फिर वो तो कुछ घंटों का जन्मा हुआ था.

मां पर गये थे बच्चे

मैक्स अस्पताल के सामने अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ प्रदर्शन कर रहे आशीष कहते हैं कि उन्हें इंसाफ़ चाहिए. वो चाहते हैं कि जिन दो डॉक्टरों ने बच्चे को मृत बताया उन्हें सज़ा हो.

वहीं औरतें के बीच सिर पर हाथ धरकर बैठी मृत बच्चों की दादी कहती हैं मेरा पोता बहुत सुंदर था. एकदम वर्षा की तरह. गोरा-चिट्टा. सोचे थे छठी पर ये करेंगे, कुंआ पूजन पर वो करेंगे...अब यहां सिर पीट रह हैं. कोई सुनने वाला नहीं.

इस बारे में जब हमने शालीमार बाग़ के मैक्स अस्पताल के पीआर पर्सन से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने फ़ोन पर कुछ भी कहने से साफ़ इनकार कर दिया.

मंत्री कहते हैं कार्रवाई होगी

हालांकि उन्होंने एक स्टेटमेंट जारी किया है जिसके अनुसार, ''हमें अभी-अभी 23 हफ्ते के प्रीमैच्योर बच्चे की मौत का पता चला, जो वेंटिलेटर सपोर्ट पर था. बच्चे के माता-पिता और परिवार वालों के प्रति हमारी पूरी संवेदना है. हालांकि हमें पता है कि इस तरह के एक्सट्रीम प्री-टर्म बच्चे का सर्वाइव करना मुश्किल होता है लेकिन परिवार और मां-बाप के लिए ये बहुत दुखद होता है. हम प्रार्थना करेंगे कि उन्हें इस दुख से उबरने की ताक़त मिले.''

वहीं कल दूसरे बच्चे की मौत के बाद दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने प्रेस कॉन्फ्रेस करके बयान दिया कि पूरे मामले की गंभीरता से जांच हो रही है. उन्होंने बताया कि मामले सामने आने के दो घंटे के भीतर ही जांच कमिटी का गठन कर दिया गया था. फ़ाइनल रिपोर्ट आने के बाद क़ानूनी दायरे में रहते हुए एक्शन लिया जाएगा.

मामला सामने आने के बाद शालीमार बाग थाने में मौजूद पुलिस अधिकारी ऋषिपाल सिंह ने बीबीसी को बताया था कि पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 308 (ग्रीवियस इंज्यूरी) के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है.

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इन सारी बातों से अलग कोने में बैठे आशीष की लाल आंखें रहते-रहते छलक जाती हैं. कहते हैं घर पर बच्चों वाले पोस्टर लगाए थे. वर्षा को कहता था इसे देखा करो, बच्चे सुंदर होंगे...अब उनका क्या करूंगा. दिल करता है उतार के फेंक दूं लेकिन न हाथ साथ देते हैं और न दिल.

''खिलौने ख़रीदे थे...कहां फेंक आऊं उन्हें? मेरा दर्द सिर्फ मेरे भीतर दफ़्न है. अब तो डरता हूं कि क्या कभी मेरा परिवार पूरा होगा?''

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English summary
My alive child had slept with my dead girl
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