'विचारधारा या सत्ता से प्रभावित होने से' बचना चाहिए- पत्रकारों से और क्या बोले CJI रमना ? जानिए
मुंबई, 30 दिसंबर: भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमना ने देश में न्यायपालिका और पत्रकारिता को लेकर बहुत ही अहम बातें कही हैं। उन्होंने बुधवार को मुंबई प्रेस क्लब में एक कार्यक्रम के दौरान कहा है कि सभी तरह की बाधाओं के बावजूद न्यायपालिका संवैधानिक लक्ष्य हासिल करने के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा है कि 'हाल में फैसलों को लेकर उपदेश देने और जजों को खलनायक दिखाने की प्रवृत्ति ' को 'रोकने की आवश्यकता' है। देश के चीफ जस्टिस रेड इंक अवार्ड प्रजेंटेशन के मौके पर व्याख्यान दे रहे थे। इस मौके पर उन्होंने पत्रकारों से कहा है कि उन्हें सिर्फ अपनी ड्यूटी करनी चाहिए और ऐसा करते समय अपनी विचारधारा और सत्ता के प्रभाव में नहीं आना चाहिए।

'कोई भी पेशेवर पत्रकार के साथ कंफर्टेबल नहीं है'
देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने कहा है कि 'न्यायपालिका एक मजबूत स्तंभ है। तमाम बाधाओं के बावजूद, यह संवैधानिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रही है। मीडिया को निश्चित रूप से न्यायपालिका में भरोसा और विश्वास रखना चाहिए। लोकतंत्र के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में मीडिया की यह जिम्मेदारी है कि वह न्यायपालिका को बुरी ताकतों की ओर से प्रेरित हमलों से बचाए और रक्षा करे। हम मिशन लोकतंत्र में और राष्ट्रीय हित को बढ़ावा देने में एक साथ हैं। हमें एकसाथ चलना है।' एक पत्रकार के रूप में खुद के छोटे से दौर को याद करते हुए, सीजएआई ने उन संघर्षों का जिक्र किया जिनसे मीडिया प्रोफेशनल गुजरते हैं। वे बोले, 'सत्ता से सच बोलना और समाज के सामने आईना रखना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है......आप पर बहुत ज्यादा दबाव और तनाव है। आधुनिक दुनिया में, एक पत्रकार के रूप में अपना कर्तव्य निभाना रेजर की धार पर नाचने की तरह है।' उनके मुताबिक, 'कुछ लोग जो पावरफुल पोजिशन पर हैं, राजनेता और नौकरशाह दोनों, हर तरह का माफिया और जो लोग कानून के गलत तरफ हैं, कोई भी पेशेवर पत्रकार के साथ कंफर्टेबल नहीं है। '

'पत्रकारिता के लिए कुछ विषय चिंताजनक'
उन्होंने डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया रिपोर्ट का जिक्र कर कहा कि इसकी वजह से कई बदलाव तो अच्छे के लिए हुए हैं, लेकिन 'पत्रकारिता के साथ कुछ ऐसे विषय भी सामने आए हैं जो चिंताजनक हैं।' जस्टिस रमना ने कहा कि 'रेटिंग की रेस में, प्रकाशन से पहले सत्यापन के महत्वपूर्ण पत्रकारिता सिद्धांत का पालन नहीं किया जा रहा है...इसके चलते गलत रिपोर्टिंग होती है.... ' उनके मुताबिक, 'ऐसी गलत खबरों को सोशल मीडिया चंद सेकेंडों में काफी बढ़ा देता है। एक बार प्रकाशित होने के बाद उसे वापस लेना मुश्किल होता है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उलट, दुर्भाग्य से, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जवाबदेह ठहराना लगभग असंभव है, भले ही वे सबसे अपमानजनक और मानहानि वाले सामग्री पेश करते हैं, जो करियर और जीवन को बर्बाद करने की क्षमता रखते हैं। ' उन्होंने मीडिया पेशेवरों से इसके समाधान के लिए आगे आने का आह्वान किया है।

'न्यूज में व्यूज का मिश्रण एक खतरनाक कॉकटेल है'
चीफ जस्टिस रमना ने मीडिया को लेकर एक और बहुत गंभीर बात कही है। उन्होंने कहा है, 'एक और ट्रेंड जो मैं आजकल रिपोर्टिंग में देख रहा हूं, वह है खबरों में वैचारिक रुख और पूर्वाग्रहों का नजर आना।' उनके मुताबिक, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग में व्याख्या और रायशुमारी से बचना चाहिए। उन्होंने कहा, 'न्यूज में व्यूज का मिश्रण एक खतरनाक कॉकटेल है। इसी से आंशिक रिपोर्टिंग की समस्या जुड़ी हुई है कि खास रंग देने के लिए कुछ चुनिंदा तथ्य उठा लिए जाएं। उदाहरण के लिए किसी भाषण से एक खास हिस्सा उठाकर उसे हाइलाइट कर देना, ज्यादातर संदर्भ से बाहर एक खास एजेंडा के अनुरूप..... '

'विचारधारा या सत्ता से प्रभावित होने से' बचना चाहिए-जस्टिस रमना
उन्होंने पत्रकारों को याद दिलाया कि 'खुद को किसी विचारधारा या सत्ता से प्रभावित होने देना' आपदा को बुलावा है।' उनके अनुसार 'एक हिसाब से पत्रकार जज की तरह हैं। आप चाहे जिस भी विचारधारा को मानते हैं और जो भी विश्वास आपको प्रिय है, आपको उनसे प्रभावित हुए बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। आप सिर्फ तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट करें, इस तरीके से कि पूर्ण और सटकी तस्वीर सामने आ जाए।'(तस्वीरें-फाइल)












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