बागपत के सत्यपाल सिंह- सपना वैज्ञानिक का, बने पुलिस, बन गये नेता

आर्थिक राजधानी मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर डा. सत्यपाल सिंह रिटायरमेंट के करीब एक साल पहले ही पुलिस की नौकरी छोड़ कर राजनीति में आ चुके हैं। वो भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन कर चुके हैं। सत्यपाल सिंह जिन्होंने अपनी जिंदगी के 34 साल अपराधियों को पकड़ने और कानून व्यवस्था को मेनटेन करने में लगा दिये, वो असल में पुलिस बनना ही नहीं चाहते थे। वो एक वैज्ञानिक बनकर देश की सेवा करना चाहते थे।
यानी 29 नवंबर 1955 में मेरठ के बसौली में पैदा हुए और बागपत में पले बढ़े सत्यपाल बड़े होकर वैज्ञानिक बनना चाहता था, लेकिन जिंदगी के उतार चढ़ाव और कड़ी मेहनत उसे पुलिस विभाग के शीर्ष पद तक ले गई और अब वो अपनी नई पारी के साथ राजनीति में सक्रिय होने जा रहे हैं। सच पूछिए तो देश को ऐसे ही नेताओं की जरूरत भी है।
सत्यपाल सिंह ने ऑस्ट्रेलिया से किया एमबीए, फिर बने आईपीएस ऑफीसर
सत्यपाल के जीवन सफर पर नजर डालें तो उनकी स्कूली पढ़ाई बागपत में ही हुई, उसके बाद उन्होंने मेरठ से रसायन विज्ञान में एमएससी किया फिर एम-फिल किया। रसायनशास्त्र के वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ रहे सत्यपाल सिंह केमिस्ट्री में ही पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन अचानक उनका मूड बदल गया और उन्होंने आईपीएस की तैयारी शुरू कर दी। सत्यपाल ने पीएचडी में दाखिला लेने के बजाये ऑस्ट्रेलिया चले गये और वहां पर एमबीए करने लगे। एमबीए करते वक्त भी उन्होंने आईपीएस बनने के लक्ष्य को छोड़ा नहीं।
एमबीए पूरा करने के बाद सत्यपाल वापर भारत आये और लोक प्रशासन में एमए किया और फिर इसी विषय में ही पीएचडी में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने आईपीएस की तैयारी तेज कर दी और परीक्षा पास कर ली। 1980 के बैच में सत्यपाल सिंह आईपीएस अधिकारी बने और उनकी पहली पोस्टिंग नासिक के असिस्टेंट सुप्रींटेंडेंट ऑफ पुलिस के रूप में हुई। उसके बाद वो बुलंधाना के एसपी बने।
मुंबई पुलिस कमिश्नर बनने के पहले आप महाराष्ट्र के एडिशनल डीजीपी बने। साथ ही उनहोंने मुंबई के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर (क्राइम) के रूप में अपनी सेवा दी और नागपुर के पुलिस कमिश्नर स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल इन कोंकण रेंज बने।
इस बीच सत्यपाल ने सीबीआई को भी अपनी सेवाएं प्रदान की। आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में नक्सलवाद को नियंत्रित करने में सत्यपाल ने बड़ी भूमिका निभाई, जिसके लिये उन्हें विशेष पदक से सम्मानित किया गया। उन्हें 2004 में राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया। सत्यपाल सिंह पर उनके 34 वर्ष के कार्यकाल में एक भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। वो हमेशा से ही साफ-सुथरी छवि वाले अधिकारी रहे। खैर अब यह तो तय है कि सत्यपाल राजनीति में सक्रिय होने जा रहे हैं। पार्टी कोई भी हो, उनके इस निर्णय का सभी को स्वागत करना चाहिये, क्योंकि देश को ऐसे अधिकारियों की सख्त जरूरत है।












Click it and Unblock the Notifications