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मनरेगा की तरह शहरी इलाकों के लिए आ सकती है नई योजना, 35 हजार करोड़ होंगे खर्च

नई दिल्ली: कोरोना महामारी की वजह से मार्च में लॉकडाउन लागू हुआ। जिस वजह से लाखों फैक्ट्रियां और कंपनियां बंद हो गईं। इस बीच करोड़ों की संख्या में मजदूरों ने गांवों की ओर फिर से पलायन किया। वहां ज्यादातर को मनरेगा के तहत काम तो मिल गया, लेकिन शहरी इलाकों में बेरोजगारी की समस्या बनी रही। इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने नया प्लान तैयार किया है। जिससे शहरी इलाकों में हालात सुधर सकें।

पिछले साल से हो रहा था विचार

पिछले साल से हो रहा था विचार

इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार मनरेगा की तर्ज पर एक नई योजना लागू करने का प्लान बना रही है। जिसके लिए करीब 35 हजार करोड़ रुपये सरकार खर्च कर सकती है। शहरी एवं आवासीय विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव संजय कुमार ने बताया कि इस स्कीम को छोटे शहरों में लॉन्च किया जाएगा। इस स्कीम पर मोदी सरकार पिछले साल से ही विचार कर रही थी, लेकिन कोरोना वायरस के चलते अब इस पर काम तेज हो गया है। उन्होंने कहा कि इस योजना को पहले छोटे शहरों में शुरू करना है क्योंकि बड़े शहरों में प्रोफेशनल एक्सपार्ट की जरूरत पड़ेगी।

मनरेगा से जुड़े 27 करोड़ से ज्यादा लोग

मनरेगा से जुड़े 27 करोड़ से ज्यादा लोग

आपको बता दें कि लॉकडाउन से करोड़ों लोग बेरोजगार हुए हैं। जिस वजह से मोदी सरकार ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में एक लाख करोड़ से ज्यादा का फंड खर्च कर रही है। इसके तहत मजदूरों को साल में न्यूनतम 100 दिन काम दिया जाएगा। जिसके लिए उन्हें कम से कम 202 रुपये रोजाना मजदूरी मिलेगी। मनरेगा के तहत लोगों को सार्वजनिक परियोजनाओं जैसे सड़क निर्माण, तालाब की खुदाई, पार्क का निर्माण आदि में काम दिया जाता है। इसके अलावा हाल ही में मोदी सरकार ने हाईवे प्रोजेक्ट्स में भी मनरेगा मजदूरों को शामिल करने की बात कही थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन के बाद मनरेगा मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। जिस वजह से मौजूदा वक्त में इसमें 27 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं।

कितनी अहम होगी ये परियोजना?

कितनी अहम होगी ये परियोजना?

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना ने भारत को बुरी तरह प्रभावित किया। जिस वजह से एक बड़ी आबादी फिर से गरीबी की ओर जा रही है। ऐसे वक्त में सरकार की ये योजना अहम रोल अदा कर सकती है। जानकार बताते हैं कि देश में डिमांड की कमी है, सप्लाई की नहीं। जब गरीब वर्ग के पास पैसा पहुंचेगा तो डिमांड बढ़ेगी। ऐसे में अर्थव्यवस्था फिर से पुरानी रफ्तार पकड़ लेगी।

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