भाजपा की प्राथमिकता सत्ता है या मोदी?
बैंगलोर। नरेन्द्र मोदी जब से प्रधानमंत्री की रेस में शामिल हुए है तब से हंगामा सा बरपा हुआ है। हैरानी की बात तो यह है कि यह हंगामा न केवल पार्टी के बाहर है बल्कि भाजपा के अंदर भी है। हालात कुछ इस कदर गरमाएँ हुए हैं कि अब तो शंका होने लगी है कि कहीं भाजपा जो कि कांग्रेस मुक्त भारत का मिशन चला रही है वो मोदी के कारण भाजपा मुक्त भारत में न तब्दील हो जाए।
अभी तक अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी त्रिमूर्ति की तरह भाजपा का प्रतिनिधित्व करते आए हैं पर मौजुदा हालात में जो भाजपा की छवि है वो ऐसी लगती है जैसे भाजपा मतलब नरेन्द्र मोदी. आज पार्टी के अदंर बड़़ा बदलाव देखने को मिल रहा है कुछ ऐसा जिसने त्रिमूर्ति की अहमियत को कम कर दिया है।
आखिर बीजेपी को क्यों नहीं दिख रहे हैं आडवाणी, जोशी, टंडन और जसवंत के आंसू?
खैर अटल जी तो पहले ही इस चुनावी रेस से बाहर है पर आडवाणी जी, जोशी जी या फिर बात हम जसवंत जी की ही क्यों न करें इनकी अहमियत में कमी साफ दिख रही है।
अगर ऐसा न होता तो जसवंत सिंह जो कि अटल जी के शासन काल में एक कुशाग्र राजनेता के रुप में उभरे, जिन्होंने वाजपेयी युग में विदेश नीति और अर्थशास्त्र की नसों को बखुबी नियंत्रित किया, जिन्होंने अपने आप को भाजपा को पूर्ण रुप से समर्पित किया आज स्थिति ऐसी है कि उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट के लिए रोना पड़ रहा है।
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भाजपा का चुनावी एजेण्डा बदलता ही रहा
यूं तो सदा से ही भाजपा का चुनावी एजेण्डा बदलता ही रहा यदि एक नज़र पार्टी के इतिहास पर डाले तो 1984 में जब पार्टी दो सीट पर विजय पाने के साथ ही सत्ता में अवतरित हुई और लोकप्रियता इतनी बढी की 1989 में भाजपा 88 सीट पर विजयी हुई।
उस समय भाजपा के विकास का मंत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा चला भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन था जिससे भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ भव्य गठबंधन हासिल किया।

भाजपा का कमंडल आंदोलन
परंतु अयोध्या में विवादित ढांचे की लड़ाई के साथ खत्म हुआ भाजपा का कमंडल आंदोलन इसके लिए विभेदक साबित हुआ। इस आंदोलन ने भाजपा को हिंदुत्ववादी छवि के रुप में उभारा।

अयोध्या मंदिरन
इसके बाद जब अटल जी के सत्ता में आने के बाद अयोध्या मंदिर का मुददा भाजपा के राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया जिसके कारण पार्टी में अंतर्कलह भी हुआ।
और अटल जी के शासन के अंत आते- आते अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता और अयोध्या विवाद पर बहस पार्टी का नयी विचारधारा के रुप में उभरी।
न राष्ट्रवाद न ही अयोध्या विवाद
इस तरह देखें तो भाजपा की विचारधारा में समय के साथ हमेशा ही परिवर्तन आता रहा है पर कोई भी परिवर्तन इतना घातक नहीं हुआ कि पार्टी के अस्तित्व के लिये खतरा बने पर आज मोदी के कारण जिस नई विचारधारा का उदय भाजपा में हुआ है उसने भाजपा की परिभाषा को ही बदल दिया है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि मोदी ने अपने वर्तमान और भाजपा के भविष्य के लिए भाजपा के अतीत को और उससे जुडे़ पार्टी का शीर्ष सदस्यों को पछाड़ दिया है। आज भाजपा के लिए न तो राष्ट्रवाद चुनावी मुददा है न ही अयोध्या विवाद।

बदल गयी है भाजपा की दशा और दिशा
जसंवत सिंह का अपमान, जोशी की दुर्दशा और मोदी के नेतृत्व पर आडवाणी की यात्रा भाजपा की दशा और दिशा को क्या नया रुख देगी यह अभी चिंतन का मुददा है।
पर यह निश्चित है कि अभी भाजपा का बागडौर केवल मोदी को हाथ में है जो वो कहते हैं और जो वो करते हैं केवल वही तार्किक है बांकि अतार्किक। आज हालात यह है कि मोदी का विरोधी देश का विरोधी समझा जा रहा है।












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