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त्योहारों से पहले ही बिहार से वापस लौटने लगे हैं प्रवासी, चुनावों में किसको नुकसान

नई दिल्ली- एक तरफ चुनाव आयोग 20 साल बाद कोरोना के बावजूद बिहार में भारी मतदान की उम्मीद जता रहा है, दूसरी तरफ चुनाव और त्योहारों के बावजूद प्रवासी कामगारों का बिहार छोड़कर देश के बड़े शहरों की ओर पलायन तेजी से शुरू हो गया है। बड़ी बात ये है कि बिहार चुनाव में विपक्ष ने प्रवासी कामगारों की लॉकडाउन के दौरान हुई दुर्दशा को चुनावी मुद्दा भी बनाया है, लेकिन ट्रेनों की यात्री सूची से जाहिर होता है कि पिछले चार-पांच महीने से बेरोजगार बैठे प्रवासियों ने अपने-अपने रोजगार वाले स्थानों की ओर लौटने में ही भलाई समझी है और इस बार चुनाव तो क्या दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ पूजा जैसे त्योहारों पर भी अपने गांवों में ठहरना मुनासिब नहीं समझ रहे हैं। बिहार से लौटने वाली तमाम ट्रेनों में क्षमता से ज्यादा पैसेंजर उन्हीं स्टेशनों की ओर वापस लौट रहे हैं, जहां से वह लॉकडाउनके दौरान किसी तरह से भारी मुश्किलों का सामना करते हुए घर लौटे थे।

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    बिहार के विभिन्न स्टेशनों से निकलने वाली ट्रेनों में सीटों की इतनी ज्यादा डिमांड है कि रेलवे की ओर से चलाई जा रही ज्यादातर क्लोन ट्रेनों में क्षमता से 104-134 फीसदी तक ज्यादा भीड़ देखी जा रही है। रेलवे के एक सीनियर अफसर ने कहा है कि 'पहले ऐसा लग रहा था कि जो प्रवासी अपने गांवों की ओर गए हैं, वह शायद छठ तक वहीं रुकेंगे। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि ऐसा नहीं है। वो अपने काम पर वापस लौटने लगे हैं।' रेलवे अभी जो 40 क्लोन ट्रेनें चला रहा है, उनमें से करीब 24 ट्रेनें बिहार की इन्हीं व्यस्त रूटों पर चलाई जा रही हैं। इनके अलावा बिहार से चलने वाली फेस्टिवल स्पेशल ट्रेनों की टिकटें भी धड़ल्ले से बुक हो रही हैं। रेलवे के एक प्रवक्ता के मुताबिक, 'जिन ट्रेनों में लंबी वेट लिस्ट है उनकी 40 क्लोन ट्रेनें चलायी जा रही हैं। पिछले सात दिनों में इन ट्रेनों की औसतन 85 फीसदी सीटें भरी हुई हैं। गौरतलब है कि पिछले महीने ही लंबी वेट लिस्ट वाली ट्रेनों की भीड़ कम करने के लिए उनकी क्लोन ट्रेने चलाने का भी फैसला किया गया है।

    रेलवे अधिकारियों के मुताबिक जब से क्लोन ट्रेनें चलनी शुरू हुई हैं, बिहार के दानापुर, पटना, मुजफ्फरपुर, कटिहार, राजगीर, जयनगर,छपरा, दरभंगा और सहरसा जैसे स्टेशनों से चलने वाली और सूरत, दिल्ली, अहमदाबाद, अमृतसर, बेंगलुरु और सिकंदराबाद जैसे शहरों की ओर जाने वाली ट्रेनों में टिकट की भारी डिमांड है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक बिहार के इन स्टेशनों से बताए गए स्टेशनों की ओर जाने वाली क्लोन ट्रेनों की ऑक्यूपेंसी 104 से 134 फीसदी तक बताई जा रही है। लेकिन, जब इन्हीं ट्रेनों में वापस बिहार लौटने वाली ट्रेनों की ऑक्यूपेंसी देखें तो यह काफी कम है।

    गौरतलब है कि लॉकडाउन के दौरान करीब 18.8 लाख प्रवासी कामगार बिहार लौट आए थे। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को उम्मीद थी कि प्रवासी त्योहारों के चलते अब मतदान करके ही वापस अपने काम पर लौटेंगे। चुनाव आयोग ने इन मजदूरों के नाम मतदाता सूची में शामिल करवाने के लिए स्पेशल ड्राइव भी चलवाया। उसे करीब 3,00,000 प्रवासी कामगारों ने नए वोटर के तौर पर नाम शामिल करवाने में सफलता भी मिली। आयोग को भरोसा था कि इन प्रवासियों की बदौलत वह कोरोना के बावजूद 20 साल बाद एक बार फिर से राज्य विधानसभा चुनाव में 60 फीसदी से ज्यादा वोटिंग करवाने में सफल होगा। लेकिन, जिस तरह से प्रवासियों ने चुनाव तो क्या त्योहारों से पहले ही बड़े शहरों की ओर रुख करना शुरू किया है, उससे चुनाव आयोग के साथ-साथ कई राजनीतिक दलों की उम्मीदों को भी झटका लग सकता है।

    बता दें कि लॉकडाउन के दौरान रेलवे ने सभी यात्री ट्रेनों का परिचालन बंद कर दिया था। लेकिन, आज की तारीख में 668 ट्रेनें पटरी पर लौट आई हैं और कई परंपरागत रूटों पर यात्रियों की भारी भीड़ उमर रही है। इनके अलावा दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के मद्देनजर 412 फेस्टिवल स्पेशल ट्रेनें भी शुरू की गई हैं। लेकिन, लगता है कि उम्मीदों के उलट प्रवासी इस साल रिवर्स डायरेक्शन में ज्यादा सफर कर रहे हैं।

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