राष्ट्रपति के महिला, दलित या आदिवासी होने से ज़मीन पर क्या असर होता है?

द्रौपदी मुर्मू
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द्रौपदी मुर्मू

द्रौपदी मुर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति बन गई हैं. इसी के साथ 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल ख़त्म हो गया है.

इस अवसर पर भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने अंग्रेजी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 'फर्स्ट सिटिज़न एंड द 9%' शीर्षक से एक लेख लिखा है. ज़ाहिर है बीजेपी उनकी आदिवासी पहचान को रेखांकित कर रही है.

इससे पहले रामनाथ कोविंद की दलित पहचान को भी बार-बार उभारा गया था. वैसे ही प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के राष्ट्रपति बनने पर उनकी महिला राष्ट्रपति की पहचान को उनका यूएसपी बताया गया.

शीर्ष पदों पर आसीन लोगों की इस तरह की जातिगत पहचान से क्या ज़मीन पर जनता के लिए क्या कुछ बदलता है.

इसी का विश्लेषण करती है ये रिपोर्ट.

भारत में राष्ट्रपति को पहले नागरिक का दर्जा प्राप्त है. भारत के राष्ट्रपति के पास बहुत अधिकार नहीं होते हैं. इसीलिए इस पद को भारत के लोकतंत्र में रबर स्टांप भी कह जात है. लेकिन कुछ औपचारिकाताओं के लिए राष्ट्रपति की ज़रूरत पड़ती है.

कोई भी अधिनियम उनकी मंज़ूरी के बिना पारित नहीं हो सकता. वो वित्त बिल को छोड़कर किसी भी बिल को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं लेकिन ऐसा कम ही होता है.

अपने पाँच साल के कार्यकाल में रामनाथ कोविंद ने कोई भी बिल सरकार को नहीं लौटाया. इनमें बहुचर्चित कृषि बिल भी शामिल है.

दलितों के लिए बीजेपी का काम

लाल सिंह आर्य, बीजेपी के एससी मोर्चा के अध्यक्ष हैं.

भारत में पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनने से क्या कुछ बदलने वाला है, इसको लेकर कई तरह के लेख लिखे गए हैं. लेकिन दलित राष्ट्रपति के बाद भारत में दलितों के लिए क्या कुछ बदला ये सवाल बीबीसी ने बीजेपी के एससी मोर्चा के अध्यक्ष लाल सिंह आर्य से पूछा कि बीते पांच सालों में दलितों के लिए भारत में क्या बदला?

दलित, आदिवासी या फिर महिला- जब इन तबकों से जुड़े लोग शीर्ष पदों पर पहुँचते हैं तो इसका जनता पर असर होता है या पार्टी पर?

जवाब में लाल सिंह आर्य एक पूरी लिस्ट गिनाते हैं.

"सबसे पहले तो दलितों में आत्मविश्वास बढ़ा है.''

''दलितों को सरकारी योजनाओं का लाभ आज से पहले इतना कभी नहीं मिला. आज सरकारी योजनाओं का लाभ 30-35 फ़ीसदी दलितों को मिल रहा है. ये लाभ पहले मिले होते तो मोदी सरकार को शौचालय योजना, आवास योजनाएं, आयुष्मान योजना जैसे कार्यक्रम चलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.''

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''मोदी सरकार में 12 दलित मंत्री हैं. इससे पहले दलितों को ये सम्मान किसी सरकार में नहीं मिला. अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में छह दलित मंत्री बने थे.''

बीजेपी में 2018-19 में चार दलित सांसदों को राज्यसभा भेजा, इसके अलावा इस बार मनोनीत चार सांसदों में से एक अनुसूचित जाति से है.

बीजेपी अकेली ऐसी पार्टी है, जहाँ संगठन में दलितों के लिए पद आरक्षित है. दलित बहुल ज़िले में तीन में से एक महामंत्री दलित बनता है.

वह कहते हैं, ''दलितों के सबसे बड़े नेता भीमराव आंबेडकर का बीजेपी ने एक नहीं पाँच-पाँच राष्ट्रीय स्मारक बनाया. कांग्रेस ने एक भी नहीं बनाया. पहला स्मारक मऊ, इंदौर में बनाया जो आंबेडकर का जन्म स्थान है. दूसरा दिल्ली के 26 अलीपुर रोड में बनाया. तीसरा दीक्षा भूमि नागपुर, चौथा चैत्र भूमि मुंबई में और पांचवां लंदन में, जहाँ अंबेडकर पढ़ने गए थे. जहाँ वो रहते थे, उसे ख़रीद कर शिक्षा भूमि बनाने का काम हमारी सरकार ने किया."

लाल सिंह ये भी कहते हैं कि ऊपर गिनाए गए क़दम प्रतीकात्मक नहीं हैं. प्रतीकात्मक तब होते जब बीजेपी केवल घोषणाएं करती और उन पर अमल नहीं करती. लेकिन हमने घोषणाएं करने के साथ-साथ उनको सम्मान देने का काम भी किया.

लेकिन इन क़दमों का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है या राष्ट्रपति को?

इस पर लाल सिंह आर्य कहते हैं, "राष्ट्रपति सरकार के मुखिया हैं, तो ये सारे काम उन्हीं के नेतृत्व में हुए ना. संसद में इन कामों की चर्चा करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हमेशा कहते थे, 'मेरी सरकार ने ऐसा किया'. तो हम कैसे कहें कि वो हमसे अलग थे."

भारत में दलितों की स्थिति

बीजेपी के दावे अपनी जगह हैं. नीचे दिए कुछ आंकड़ों के ज़रिए आप भारत में दलितों की स्थिति के बारे में बेहतर समझ पैदा कर सकते हैं. भारत में दलितों की आबादी 16.6 फ़ीसदी है.

पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में दलितों की आबादी 20 फ़ीसदी से ऊपर है.

जहां तक दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध की बात है, तो एनसीआरबी के आँकडों के मुताबिक़ पिछले पाँच सालों में केवल 2018 में कमी देखी गई थी.

दलितों के रोज़गार और शिक्षा के आँकड़े भी पिछले पांच सालों में बहुत नहीं बदले हैं. लेकिन पांच सालों में इसके वोटिंग पैटर्न में बदलाव देखने को मिला है.

दलित आबादी
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पाँच साल में दलितों में बीजेपी की पैठ

दलितों की राजनीति करने वाली पार्टी बहुजन समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में केवल एक विधायक ही इस बार जीत कर आ सका. कभी राज्य में उनकी सरकार थी.

देश भर में अनुसूचित जाति के लिए 84 लोकसभा सीटें आरक्षित है. 2014 में बीजेपी को इसमें से 40 सीटों पर जीत मिली थी.

2019 में बीजेपी ने इसमें 5 सीटें और जोड़ी और ये आंकड़ा 45 पहुँच गया.

दलित सांसद
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पहचान की राजनीति में कांग्रेस पीछे नहीं

ऐसी ही प्रतीकों की राजनीति कांग्रेस ने भी की. जब प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया गया.

कांग्रेस ने उनके महिला होने की पहचान को ख़ूब भुनाया. लेकिन महिलाओं के हक़ की अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई- महिला आरक्षण बिल पास कराने में नाकामयाब रही.

हालांकि कुछ जानकार मानते हैं कि यूपीए आँकड़ों के खेल में मात खा गई.

वहीं बीजेपी भी महिलाओं के लिए पार्टी और सरकार की तरफ़ से किए गए काम की लिस्ट गिनाने से नहीं थकती. फिर चाहे उज्ज्वला योजना का लाभ हो या फिर आवास योजना में घर महिलाओं के नाम करने की बात हो.

आज बीजेपी अपने अकेले के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है. बावजूद इसके महिलाओं की बरसों पुरानी 33 फीसदी आरक्षण की मांग को क़ानूनी जामा नहीं पहनाया गया है.

लाल सिंह आर्य कहते हैं, "बहुत सारी चीज़ों के लिए राजनीतिक माहौल भी तैयार करना पड़ता है. सारे दलों को विश्वास में भी लेना पड़ता है. हमने उस दिशा में काम करना प्रारंभ किया है."


प्रतीकों की राजनीति पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे का विश्लेषण


प्रतीकों की राजनीति से आम तौर पर फ़ायदा नहीं होता. आम तौर पर समझ यही है और ये समझ ग़लत भी नहीं है.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि प्रतीक हमेशा निरर्थक नहीं होते. उनका अपना एक अर्थ होता है, उनकी अपनी पहचान होती है.

विडंबना ये है ठोस, ज़मीनी बदलाव केवल प्रतीकों से नहीं आते. कभी-कभी इन प्रतीकों के अभाव में भी आ जाते हैं, कभी इनके ना रहने पर भी आ जाते हैं. ज़मीनी बदलाव के लिए ज़मीनी हालात ज़िम्मेदार होते हैं.

मेरी समझ से, जहाँ तक राष्ट्रपति पद पर प्रतीकों की बात है, उन पर प्रतीकों के आने से कोई बदलाव नहीं आया है.

प्रतीकों की राजनीति को देखने का ये एक नज़रिया हो सकता है. एक दूसरा नज़रिया भी है.

फ़िलहाल देश में जो हिंदुत्व की राजनीति चली है, उसमें जातिगत पहचान की एक महत्वपूर्ण भूमिका है. हालांकि इस जातिगत पहचान को हर समय उभारा नहीं जाता, कुछ चुने हुए मौक़ों पर इन्हें उभारा जाता है, लेकिन मेरे हिसाब से जाति का सवाल हिंदुत्व की राजनीति के लिए केंद्रीय चुनौती है.

वो इसलिए क्योंकि मैं अमुक जाति का हूँ. तो मेरी ख़ुद की अस्मिता इस बात पर निर्भर रहती है कि कौन मुझे से सामाजिक स्तर पर ऊपर है और कौन मुझसे नीचे है. मेरा 'स्व' इस पर निर्भर करता है कि मैं अपने से जिनको बेहतर मानता हूँ वो मुझसे कितनी दूरी पर हैं- सामाजिक स्तर पर, हैसियत की स्तर पर, परिस्थिति के स्तर पर.

अगर ये दूरी घटने लगती है तो मेरी अस्मिता डगमगाने लगती है.

इस वजह से हिंदुत्व की राजनीति करने वाले चाहते हैं कि सभी हिंदू अपने आपको केवल हिंदू कहें. हिंदू ख़ास तौर पर मंझली और ऊंची जाति वालों से ये पूछा जा रहा है कि क्या केवल हिंदू होना आपको स्वीकार है, आज की परिस्थिति में ज़्यादातर मंझली और ऊंची जाति के हिंदू ये बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे. और इस वजह से जातिगत पहचान, हिंदुत्व की राजनीति में बाधा है.

दलित आबादी
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दलित या आदिवासी शीर्ष पदों पर बिठा कर या फिर किसी जाति विशेष के त्योहार को राष्ट्रीय छुट्टी घोषित करके- ऐसे प्रतीकात्मक हस्तक्षेप के ज़रिए पार्टियां चाहती हैं कि कथित तौर पर पिछड़ी और निचली जातियों को हिंदुत्व की राजनीति के साथ जुड़ने का न्योता भेज सकें और वो इससे जुड़ें.

और ये पहले से ज़्यादा करना पड़ रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि ज़मीनी स्तर पर परिस्थितियों में ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ है.

इस वजह से अमित शाह को लेख लिखने की ज़रूरत पड़ रही है. ये हाथ की सफ़ाई जैसा है कि हमने आदिवासी को शीर्ष पद पर बिठाया और हम आपकी जाति का भला कर रहे हैं.

'पहचान की राजनीति' में महिलाओं की स्थिति और ज़्यादा जटिल है. महिलाओं का अपना अलग समाज नहीं बन पाता क्योंकि जो अलग-अलग समाज पहले से हमारे देश में हैं. उनका अपना अलग-अलग वर्चस्व है और वो उस वर्चस्व बनाए रखना चाहता है.

दलित आबादी
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प्रतीक की राजनीति शाश्वत राजनीति नहीं है. उसका असर हमेशा एक सा नहीं रहेगा. कई बार इससे फ़र्क भी पड़ता है. जैसे पंचायत चुनाव में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण वाली राजनीति हमने देखी. पंच पति वाले कॉन्सेप्ट के बारे में भी हमने देखा लेकिन कई जगह महिलाओं सरपंच ने अच्छा काम भी किया.

जिन मानकों पर दलितों आदिवासियों के पिछड़ेपन को मापा जाता था, उन्हीं मानकों पर हमें उनकी ख़ुशहाली को आंकना पड़ेगा, तभी पता चल पाएगा कि दलित, महिला या आदिवासी राष्ट्रपति होने से क्या कुछ फ़र्क आया.

मान लीजिए कि बदलाव आ भी गया, तो प्रतीकों की वजह से ही बदलाव आया है, ये कहना सही नहीं होगा. दलित राष्ट्रपति की वजह से दलितों की स्थिति बेहतर हुई ये साबित कर पाना नामुमकिन है.

उसी तरह अगर बदलाव नहीं तो ये कह देना कि राष्ट्रपति दलित नहीं हुए इस वजह से दलितों की स्थिति में बदलाव नहीं आया, ये समाज विज्ञान पद्धति से सही नहीं है.

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