CAA पर विपक्ष की बैठक से कन्नी काटने के बाद मायावती ने पार्टी के मुस्लिम चेहरे से क्यों किया किनारा? जानिए

नई दिल्ली- जब सीएए,एपीआर और एनआरसी जैसे मुद्दों पर तमाम विपक्षी पार्टियां हंगामा बरपा रही हैं, ऐसे में बीएसपी अध्यक्ष मायावती का लोकसभा में अपनी पार्टी के मुस्लिम चेहरे को किनारे करने की उनकी रणनीति को समझना बेहद दिलचस्प हो गया है। खासकर इसलिए भी कि उन्होंने एक मुसलमान नेता से ये पद छीनकर एक ब्राह्मण नेता पर भरोसा जताया है। सबसे बड़ी बात ये है कि ये कदम उस समय उठाया गया जब उनकी पार्टी सीएए पर कांग्रेस की अगुवाई में बुलाई गई विपक्षी पार्टियों की बैठक में भी शामिल नहीं हुई। आइए समझते हैं कि बीएसपी अध्यक्ष ने अपने फैसले के लिए दलील क्या दी है, तथ्य क्या बता रहे हैं और इसके पीछे की असल वजह क्या हो सकती है?

सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बदला-मायावती

सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बदला-मायावती

जेडीएस से बीएसपी में आए बड़े मुस्लिम चेहरे दानिश अली को लोकसभा में पार्टी के नेता पद से हटाने को लेकर मायावती ने दलील ये दी है कि ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि पार्टी सामाजिक संतुलन बनाए रखना चाहती है। मतलब, लोकसभा में पार्टी के नेता दानिश अली और यूपी में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली दोनों मुस्लिम समुदाय से ही थे, इसलिए उन्होंने इस स्थिति में फेरबदल का फैसला किया। इस बदलाव की कड़ी में उन्होंने दानिश की जगह अंबेडकर नगर से पार्टी सांसद रितेश पांडे को लोकसभा का नेता बनाया है, जो कि ब्राह्मण हैं। उनके अलावा बहनजी ने मलूक नागर को सदन का उपनेता नियुक्त किया है।

तथ्य क्या बता रहे हैं?

तथ्य क्या बता रहे हैं?

बीएसपी सुप्रीमो की दलील के मुताबिक उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में पार्टी के नेता दोनों मुस्लिम थे, इसलिए उन्होंने अमरोहा के सांसद से उनकी जिम्मेदारी छीन ली। जबकि, सच्चाई ये है कि सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने ब्राह्मण नेता को दानिश की जगह कमान दी है तो राज्यसभा में पार्टी के नेता सतीश मिश्रा भी तो ब्राह्मण समुदाय से ही आते हैं। यानि, बहनजी की सामाजिक संतुलन वाली दलील उतनी जम नहीं रही है। जहां तक दानिश अली की बात है तो उनके साथ पिछले कुछ महीनों में ही ऐसा दो बार हो चुका है। पहले मायावती ने उन्हें जून में लोकसभा में पार्टी का नेता बनाकर अगस्त में हटा दिया था; और फिर नवंबर में एक बार वही जिम्मेदारी सौंपकर दो महीने बाद फिर से उन्हें किनारे कर दिया।

मायावती को दानिश का दबाव मंजूर नहीं था?

मायावती को दानिश का दबाव मंजूर नहीं था?

सूत्रों की मानें तो बहुजन समाज पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। मसलन, दानिश अली तो जेडीएस के नेता थे, जो अपने पार्टी छोड़कर बसपा की हाथी पर सवार हुए हैं। दरअसल, सोमवार को कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जो बैठक बुलाई थी, वह उस बैठक में पार्टी के शामिल होने की वकालत कर रहे थे। लेकिन, बसपा उसमें शामिल नहीं हुई। खबरें ये भी है कि पार्टी बुधवार को अपनी अध्यक्ष का 64वां जन्मदिन भव्य तरीके से मनाने की तैयारियों में जुटी हुई है। लेकिन, अली का कहना है कि सीएए और एनआरसी के खिलाफ जारी विरोध के मद्देनजर ऐसे समारोहों से पार्टी को बचना चाहिए। लेकिन, जानकारी के मुताबिक बीएसपी अध्यक्ष उनकी बातों से सहमत नहीं हुईं, इसलिए जन्मदिन समारोह में नहीं शामिल होना पड़े, इसलिए वे लंदन रवाना हो गए हैं।

फिर चलेंगी ब्राह्मण-दलित कार्ड?

फिर चलेंगी ब्राह्मण-दलित कार्ड?

जानकारी ये भी है कि बसपा प्रमुख को लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का बीजेपी से मोह भंग हो रहा है। उन्हें यह भी लग रहा है कि सीएए-एनआरसी के बहाने कांग्रेस अभी पूरी तरह मुस्लिमों को रिझाने में लगी हुई है, ऐसे में ब्राह्मण चेहरों को आगे करके वह अपना पुराना ब्राह्मण-दलित कार्ड एक बार फिर चल सकती हैं। यह समीकरण 2007 में उन्हें प्रदेश की सत्ता तक पहुंचा चुका है। वैसे भी रामवीर उपाध्याय के बगावती तेवरों के बाद उन्हें किसी युवा ब्राह्मण चेहरे को आगे करना था और इसमें उनके विचार में रितेश पांडे की दावेदारी सबसे सटीक बैठी और उन्होंने उनपर 2022 के लिए दांव लगा दिया है।

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