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Manmohan Singh Memorial: BJP ने मनमोहन से पहले किस विपक्षी नेता पर दिखाया बड़ा दिल, कांग्रेस ने क्या किया?

Manmohan Singh Memorial: पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता डॉ. मनमोहन सिंह की अंत्येष्टि दिल्ली के निगम बोध घाट पर करवाए जाने को लेकर विपक्षी नेता मोदी सरकार को घेरने में लगे हुए हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसी सरकार ने उनकी याद में खुद उन्हीं की सरकार के फैसलों को पलटकर मेमोरियल के लिए जगह के अनुरोध को स्वीकार भी किया है और इसकी सूचना उनके परिवार को भी दी है।

टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने डॉ मनमोहन सिंह के परिवार को यह सूचना दे दी गई है कि मेमोरियल के लिए स्थान आवंटन का उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया गया है।

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Manmohan Singh Memorial: मोदी सरकार ने विपक्षी दल के नेता के लिए भी मेमोरियल की दी इजाजत

मोदी सरकार ने पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के स्मारक के लिए जगह देने पर तब भी हामी भरी है, जब 2013 में खुद मनमोहन सिंह की सरकार ने ही यह फैसला किया था कि अब किसी का मेमोरियल बनाने के लिए सरकार कोई जगह नहीं देगी। इस तरह से पीएम मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ऐसी पहली सरकार हो गई है, जिसने विपक्ष के किसी नेता के लिए इस तरह के अनुरोध को स्वीकार किया हो।

Manmohan Singh Memorial: कांग्रेस की सरकार के दौरान किसे मिली मेमोरियल की अनुमति?

ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक जितनी भी सरकारें हुई हैं, वह अक्सर अपनी ही पार्टी या उनसे जुड़े लोगों के लिए इस तरह से मेमोरियल की अनुमति देती आई हैं; या फिर राजनीतिक लाभ के लिए एक तरह से इसका सियासी सौदा किया गया है या फिर राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करने के बाद कोई कदम उठाया गया है।

Manmohan Singh Memorial: जब मेमोरियल के लिए राजनीतिक फायदे को दी गई प्राथमिकता

2012 की बात है। केंद्र में डॉ मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-2 की सरकार थी, जो एक के बाद एक घोटालों के खुलासे से हिली हुई थी। इसी दौरान बसपा सुप्रीमो मायावती को गुरुद्वारा रकाबगंज रोड के बंगला नंबर 12, 14 और 16 को मिलाकर कांशी राम की स्मारक बनाने की इजाजत दी गई।

4 दिसंबर, 2012 को मायावती ने बंगलों में कुछ और तकनीकी बदलाव के लिए शहरी विकास मंत्रालय को लिखा, उसी दिन उन्हें उसकी अनुमति मिल गई। 5 दिसंबर को रिटेल में एफडीआई पर लोकसभा में वोटिंग होनी थी। ममता बनर्जी की टीएमसी इसी मामले पर यूपीए से निकल गई थीं।

वोटिंग के दौरान बीएसपी के सांसद लोकसभा से अनुपस्थित हो गए, जिससे विधेयक पास हो गया और सरकार को एक तरह का जीवन दान भी मिल गया। राज्यसभा में जरूरत पड़ने पर तो बीएसपी ने सरकार के पक्ष में मतदान भी कर दिया। तर्क दिया गया कि 'सांप्रदायिक ताकतों' को दूर रखने के लिए यह कदम उठाया गया।

Manmohan Singh Memorial: अपने पार्टी के नेताओं पर जब दिखी मेहरबानी!

एक साल बाद कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने फिर से इसी तरह का फैसला लिया। उसने पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को 6 कृष्णा मार्ग वाले बंगले को उनके पिता बाबू जगजीवन राम के मेमोरियल में तब्दील करने की इजाजत दी। मीरा कुमार कांग्रेस की दिग्गज नेता रही हैं।

Manmohan Singh Memorial: लुटियंस जोन के प्रमुख मेमोरियल

नई दिल्ली के लुटियंस जोन में 8 ट्रस्ट हैं, जो अलग-अलग स्मारकों को संचालित कर रहे हैं। इनमें इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स, लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल, राजीव गांधी फाउंडेशन और प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय शामिल हैं।

Manmohan Singh Memorial: मनमोहन सिंह से पहले मोदी सरकार ने नरसिम्हा राव को भी दिया सम्मान

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के निधन के बाद उनके अपमान को लेकर कांग्रेस का गांधी-नेहरू परिवार हमेशा से आरोपों के घेरे में रहा है। इस मुद्दे पर बीजेपी उसपर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ती है।

नरसिम्हा राव को अपनी ही (कांग्रेस) पार्टी ने भले ही नजरअंदाज किया था। लेकिन, 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने 2015 में उनके लिए भी एक स्मारक का रास्ता साफ किया। मतलब, उन्हें उनके निधन के एक दशक बाद यह सम्मान मिल पाया।

Manmohan Singh Memorial: बंगले को स्मारक बनाने को लेकर आज क्या है स्थिति?

वर्ष 2000 में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने माना कि लुटियंस जोन में बंगलों की बहुत ही ज्यादा कमी हो रही है, इसलिए उन्हें मेमोरियल के रूप में बदलने से परहेज आवश्यक है। पहले परंपरा यह थी कि किसी नेता के निधन होने के बाद उनके नाम पर ट्रस्ट को कुछ सालों के लिए इसे लीज पर दिया जाता था।

2013 में मनमोहन सरकार ने फैसला किया कि राजघाट के पास एक स्मृति स्थल विकसित किया जाएगा, जहां पूर्व प्रधानमंत्री और अन्य विशिष्ट लोगों के लिए स्मारक विकसित किए जा सकते हैं। क्योंकि, 245 एकड़ वीवीआईपी समाधि के नाम पर जा चुके हैं और अब कोई जगह नहीं बची। जब बीजेपी की सरकार 2014 में आई तो इसने फैसला किया कि किसी भी बंगले को स्मारक में तब्दील नहीं किया जाएगा।

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