Manipur news:'दोषपूर्ण राजनीति की पैदाइश': मणिपुर की जातीय हिंसा पर हिमंत बिस्वा सरमा का गंभीर आरोप

मणिपुर में जारी जातीय हिंसा को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पर बहुत गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि मणिपुर में जो भी जातीय संघर्ष चल रहा है, वह राज्य की पिछली कांग्रेस सरकारों की 'दोषपूर्ण राजनीति की पैदाइश' है।

उन्होंने कांग्रेस पर 'दोहरा चरित्र' अपनाने का आरोप लगाते हुए यह भी कहा है कि जब कांग्रेस की राज्य और केंद्र में सरकारें थीं, तब उत्तरपूर्व के इस राज्य में अशांति पर उनके नेताओं ने एक शब्द नहीं कहा था।

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कांग्रेस सरकारों की दोषपूर्ण राजनीति की पैदाइश- हिमंत बिस्वा सरमा
सरमा ने शनिवार को कई ट्वीट के माध्यम से आरोप लगाया कि 'मणिपुर में बहु-जातीय हिंसा की वजह से जो दर्द पैदा हुआ है, वह राज्य के प्रारंभिक वर्षों के दौरान कांग्रेस सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों की वजह से हुआ है। 7 दशकों के कुशासन से पैदा हुई समस्याओं को ठीक करने में वक्त लगेगा।'

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'नाकाबंदी की राजधानी बन गया था मणिपुर'
उन्होंने लिखा, 'कांग्रेस ने अचानक मणिपुर के प्रति बहुत अधिक लगाव दिखाना शुरू कर दिया है। थोड़ा पीछे मुड़कर प्रदेश में इसी तरह की समस्याओं पर पीएम मनमोहन सिंह की अपनी प्रतिक्रिया को देखना महत्वपूर्ण है। पार्टी का कपट बहुत चिंताजनक है। ' उन्होंने दावा किया कि यूपीए के कार्यकाल के दौरान मणिपुर 'नाकाबंदी की राजधानी' बन गया था। उनके मुताबिक 2010 से 2017 तक जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, हर साल 30 दिनों से लेकर 139 दिनों तक नाकेबंदी की गई थी।

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'मणिपुर जल रहा था और एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला था'
वो बोले कि '2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री और यूपीए चेयरपर्सन ने तब एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला था, जब मणिपुर जल रहा था। वे निजी कंपनियों को उबारने में लगे हुए थे।' उनके मुताबिक तब नाकेबंदी के चलते पेट्रोल की कीमत 240 रुपए और एलपीजी गैस के दाम 1,900 रुपए तक चले गए थे और पूरी तरह से मानवीय संकट की स्थिति पैदा हो गई थी।

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'यूपीए सरकार के दौरान 991 से ज्यादा लोग मारे गए थे'
सरमा ने कहा, 'तथ्य ये है कि 2004 से 2014 के दौरान जब कांग्रेस देश में और राज्य में सत्ता में थी, मणिपुर में 991 से ज्यादा नागरिक और सुरक्षा बल मारे गए थे। मई 2014 के बाद से अब तक त्रासदी के इस दुखद आंकड़े में 80 प्रतिशत की कमी आयी है।' यह आर्थिक नाकेबंदी विरोधी कुकी और नागा गुटों की ओर से अपनी मांगों के समर्थन में लगाई जाती थी, लेकिन इसकी वजह से राज्य का पूरा सप्लाई चेन टूट जाता था।

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3 मई से मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जारी है हिंसा
इस साल 3 मई से मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़की हुई है। हिंसा की शुरुआत मैतेई समुदाय की ओर से उन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की मांग के खिलाफ कुकी समर्थक गुटों की ओर से मार्च आयोजित करने के साथ हुई थी।

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160 से ज्यादा लोगों की जा चुकी है जान
इस जातीय हिंसा मे अबतक 160 से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं और कई लोग जख्मी हुए हैं। राज्य में मैतेई समुदाय की जनसंख्या करीब 53 फीसदी है, जो मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहते हैं। जबकि, नागा और कुकी जैसी जनजातियों की आबादी लगभग 40 फीसदी है, जो आमतौर पर पहाड़ी जिलों में रहते हैं।

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हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया है कि 2014 के बाद से 'मणिपुर के सामाजिक ताने-बाने में जबर्दस्त सुधार हुआ है।' उन्होंने यह भी कहा कि 'दशकों पुराने जातीय संघर्ष को दूर करने की प्रक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में पूर्णता के साथ पूरी होगी।' (इनपुट-पीटीआई)

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