मणिपुर में कांग्रेस ने पहले गंवाई सत्ता, अब मुख्य विपक्षी दल का भी दर्जा छिना
नई दिल्ली, 10 मार्च। पिछले कई दशक तक कांग्रेस पार्टी पूरे देश में मुख्य सत्ताधारी दल रही। तकरीबन हर राज्य में कांग्रेस की सरकार रही, लेकिन पिछले तकरीबन एक दशक से अधिक समय से कांग्रेस का लगातार पतन जारी है। एक के बाद एक अहम राज्य में कांग्रेस लगातार चुनाव हारती जा रही है। लेकिन अब पार्टी की हालत यह हो गई है कि सत्ता में वापसी तो दूर अब वह कई राज्यों में मुख्य विपक्षी दल भी नहीं रही। पांच राज्यों के चुनाव के आज नतीजे सामने आ रहे हैं जिसमे सभी पांचों राज्यों में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा है। मणिपुर में पहले कांग्रेस के हाथ से सत्ता गई और मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। ऐसे में इस चुनाव में कांग्रेस प्रदेश में विपक्षी दल की भूमिका से भी बाहर हो गई है।

मणिपुर में विधानसभा की 60 सीटों में 23 से अधिक सीटों पर आगे चल रही है जबकि कांग्रेस सिर्फ 3 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। वहीं एनपीपी की बात करें तो यह 6 से अधिक सीटों पर आगे चल रही है। इन आंकड़ों से साफ जाहिर है कि कांग्रेस मणिपुर में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका भी खो रही है। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं के सामने एक बार फिर से बड़ी चुनौती है कि आखिर किस तरह से पार्टी को एक बार फिर से जिंदा किया जाए और मतदाताओं में पार्टी के लिए विश्वास पैदा किया जाए।
मणिपुर में वोट प्रतिशत की बात करें तो निसंदेह कांग्रेस पार्टी के लिए यह निराशाजनक है। भारतीय जनता पार्टी की तुलना में कांग्रेस का वोट फीसदी तकरीबन आधा है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 37.31 फीसदी वोट हासिल किए हैं जबकि कांग्रेस 16.55 फीसदी वोट ही हासिल कर सकी है। जबकि एनपीईपी ने 16.27 फीसदी वोट हासिल किए हैं। लिहाजा साफ है कि ना सिर्फ कांग्रेस को सीटों का नुकसान हो रहा है बल्कि वोटर्स भी पार्टी से दूर जा रहे हैं। जिस तरह से एनपीईपी प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल के रूप में सामने आई है उससे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को जरूर आत्ममंथन करने पर विचार करना होगा।












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