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स्वतंत्रता आंदोलन के पहले क्रांतिकारी मंगल पांडे से डर गए थे अंग्रेज,18 अप्रैल को था तय, पर 8 को दी गई फांसी

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मंगल पांडे बलिदान दिवस: आज का दिन भारतीय इतिहास में बहुत अहम है। आज ही के दिन 08 अप्रैल 1857 को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पहले क्रांतिकारी मंगल पांडे को फांसी दी गई थी। आज के दिन को पूरे देशभर में बलिदान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। मंगल पांडे, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया। मंगल पांडे का यूं तो फांसी देने की तारीख 18 अप्रैल 1857 तय की गई थी। लेकिन अंग्रेजी शासनों को इस बात का डर सताने लगा कि अगर मंगल पांडे को फांसी नहीं दी गई तो लगाई स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी पूरे भारत में फैल जाएगी। इसी वजह से डर से अंग्रेजो ने 18 अप्रैल की जगह मंगल पांडे को 8 अप्रैल को ही फांसी दे दी थी। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में मंगल पांडे को फांसी दी गई थी। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मान देने के लिए भारत सरकार द्वारा उनके लिए 1984 में एक डाक टिकट जारी किया गया था।

Mangal Pandey

मंगल पाडें का जन्म भारत में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा नामक गांव में 19 जूलाई 1827 को हुआ था। हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मंगल पाडें का जन्म फैजाबाद के गांव अकबरपुर में हुआ था। लेकिन मंगल पांडे मूल रूप से यूपी के बलिया जिले के नगवा गांव के निवाली थे। मंगल पांडे का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था। मंगल पांडे ने 18 साल की उम्र में ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इंफेन्ट्री में एक सैनिक के तौर पर शामिल हुए थे।

    Rebellion of 1857: 18 April के बजाय 8 अप्रैल को क्यों Mangal Pandey दी गई थी फांसी? | वनइंडिया हिंदी

    जानें 1857 के विद्रोह के बारे में और मंगल पांडे को क्यों दी गई फांसी?

    1857 के विद्रोह की शुरुआत अंग्रेजी शासक द्वारा अपने सैनिकों को दिए जा रहे एक एक बंदूक की वजह से हुई थी। इतिहासकारों के मुताबिक 1850 के दशक के उत्तरार्ध में सिपाहियों के लिए नई इनफील्ड राइफल लाई गई थी। नई राइफल में गोली दागने के लिए प्रिकशन कैप का उपयोग किया गया था। लेकिन राइफल में गोली भरने के लिए वहीं पुरानी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता था। जिसमें बंदूक भरने के लिए कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था। नई राइफल आने के बाद सिपाहियों में ये खबर तेजी से फैली गई कि कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी मिली हुई है। ऐसे में इन कारतूसों को मुंह से खोलकर राइफल में लोड करना हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिमों को भी गवारा नहीं था। इसको लेकर धीरे-धीरे बगावत होने लगी और 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने इसको लेकर विद्रोह कर दिया।

    बंगाल की बैरकपुर छावनी में तैनात मंगल पांडे ने कारतूस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया और अपने सभी साथी सिपाहियों को इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। मंगल पांडे ने ''फिरंगी मारो'' का नारा भी दिया। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने दो ब्रिटिश अफसरों पर हमला किया। जिसके बाज मंगल पांडे पर मुकदमा चलाया गया। जिसके बाद 6 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को कोर्ट मार्शल कर दिया गया और उन्हें 8 अप्रैल को फांसी दी गई। हालांकि कोर्ट ने फांसी देने की तारीख 18 अप्रैल 1857 तय की थी।

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    English summary
    mangal pandey balidan diwas Mangal Pandey bio in hindi 1857 war of independence
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