Mallikarjun Kharge: कर्नाटक से निकलकर कांग्रेस अध्यक्ष बनने तक कैसा रहा खड़गे का सफर ? जानिए

मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष का कार्यभार संभाल लिया है। 24 साल बाद गांधी परिवार से अलग व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष का पद मिला है। गांधी परिवार के 'आशीर्वाद' से 20 साल से भी ज्यादा समय बाद हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में उन्हें 7,897 वोट मिले थे। जबकि, उनके मुकाबले में चुनाव लड़े शशि थरूर सिर्फ 1,072 वोट ही जुटा सके थे। इससे पहले खड़गे का केंद्र की राजनीति में आने के बाद कांग्रेस के अंदर कद तेजी से बढ़ा था। इसकी वजह ये मानी जाती है कि उन्होंने अपने सियासी करियर के शुरुआती दिनों से ही गांधी परिवार के साथ वफादारी निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। यहां तक कि कम से कम तीन बार ऐसा लगा कि वे कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद के बहुत करीब पहुंच गए हैं, लेकिन आलाकमान के प्रति समर्पण ऐसा कि कभी उसके लिए परेशानी का कारण बनने की नहीं सोची। लिहाजा, सीएम की कुर्सी तो नहीं मिली, लेकिन आलाकमान के दिल में विश्वास जमाते रहे और अध्यक्ष पद पर विराजमान हो गए। 21 जुलाई,1942 को कर्नाटक के बीदर जिले के वारावट्टी गांव में एक सामान्य परिवार में जन्मे खड़गे पेशे से वकील रहे हैं और समाजिक कार्यों में भी इनकी काफी रुचि रही है।

कांग्रेस में आलाकमान की वफादारी का फल मिला

कांग्रेस में आलाकमान की वफादारी का फल मिला

कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से पहले तक मल्लिकार्जुन खड़गे राज्यसभा में विरोधी दल के नेता थे। इस कार्यकाल से पहले दो-दो बार (2009 और 2014) कर्नाटक की गुलबर्गा (सुरक्षित) सीट से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अपने पहले कार्यकाल में उन्हें मनमोहन सिंह सरकार में श्रम और रोजगार मंत्रालय और रेलवे मंत्रालय के अलावा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का भी अतिरिक्त प्रभार संभालने का मौका मिला। 2014 में जब मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए दो की सरकार मोदी लहर में गिर गई तो भी कांग्रेस के इस दलित नेता ने अपनी सुरक्षित सीट बरकरार रखी। इस वजह से पार्टी आलाकमान ने बड़ा फैसला किया और लोकसभा में उन्हें कांग्रेस संसदीय दल का नेता नियुक्त कर दिया। इस पद पर वे 2019 तक रहे और विपक्ष के प्रमुख चेहरे के तौर पर उभर कर आए। लेकिन, 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की तरह यह भी अपना चुनाव हार गए। खड़गे ने अपने जीवन में कुल 12 चुनाव लड़ा है, लेकि यही पहला चुनाव था, जिसमें उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। हालांकि, पार्टी हाईकमान की नजरों में उनकी जगह फिर भी ऊंची रही। इसी का परिणाम हुआ कि पार्टी ने 2020 में उन्हें राज्यसभा में भेज दिया। जब गुलाम नबी आजाद का राज्यसभा से कार्यकाल खत्म हो गया तो उनकी जगह कांग्रेस नेतृत्व ने 16 फरवरी, 2021 को इनकी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर ताजपोशी करा दी। लेकिन,अक्टूबर में कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया और वापस संगठन की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हो गए।

कर्नाटक में खड़गे की राजनीति

कर्नाटक में खड़गे की राजनीति

कांग्रेस के 80 साल के इस दलित नेता ने अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी। उनकी छात्र राजनिति 1964 में गुलबर्गा के गवर्नमेंट आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज के महासचिव बनने से शुरू हुई थी। 1966-67 में वे लॉ कॉलेज गुलबर्गा में छात्र संघ के उपाध्यक्ष चुने गए। फिर उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए औपचारिक राजनीति शुरू कर दी। 1969 में पहली बार अपने होम टाउन गुलबर्गा सिटी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए। तीन साल बाद 1972 में ही उन्होंने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और 2009 तक 9 बार एमएलए चुने गए। 9 में से 8 बार Gurmatkal विधानसभा से चुनाव जीते (जब तक यह अनुसूचित जाति के लिए रजर्व थी) और एकबार चित्तपुर विधानसभा सीट से सफलता हासिल की।

तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनने से चूक गए खड़गे

तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनने से चूक गए खड़गे

1976 से वे कर्नाटक में कांग्रेस की हर सरकारों में कैबिनेट का हिस्सा रहे; और जब भी पार्टी राज्य में सत्ता से बेदखल हुई, खड़गे ने पार्टी संगठन में अलग-अलग, लेकिन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। 1996 से लेकर 99 तक वे विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता और नेता प्रतिपक्ष रहे। 2005 में पार्टी ने उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। 2008 से 2009 तक वे फिर से एक बार विधानसभा में कांग्रेस के नेता और नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में रहे। कर्नाटक की राजनीति में 1999, 2004 और 2013 ऐसे वर्ष थे, जब राज्य के मुख्यमंत्री की रेस में मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम भी आया। लेकिन,हर बार उनकी किस्मत ने धोखा दिया और क्रमश: एमसएम कृष्णा,धरम सिंह और सिद्दारमैया जैसे नेताओं के नाम को हाईकमान से हरी झंडी मिली।

सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे हैं खड़गे

सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे हैं खड़गे

मल्लिकार्जुन खड़गे सक्रिय राजनीति के अलावा सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने गुलबर्गा (कलबुर्गी) में एमएसके मिल में कर्मचारी ट्रेड यूनियन को संगठित किया और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उन्होंने कई सामाजिक संगठनों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई है और उससे जुड़े कार्यों में सक्रिय योगदान देते रहे हैं। वे सिद्धार्थ एजुकेशन सोसाइटी-टुमकुर और श्री सिद्धार्थ मेडिकल कॉलेज और सिद्धार्थ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के भी प्रेसिडेंट रह चुके हैं। खड़गे बेंगलुरु स्थित बीआर अंबेडकर कॉलेज और अंबेडकर इस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं।

मल्लिकार्जुन खड़गे की शिक्षा

मल्लिकार्जुन खड़गे की शिक्षा

मल्लिकार्जुन खड़गे की राजनीति के अलावा कबड्डी, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेलों में काफी दिलचस्पी रही है। उन्होंने बीए, एलएलबी की शिक्षा अपने होम टाउन गुलबर्गा (कलबुर्गी) के ही गवर्नमेंट आर्ट्स एंड सांइस कॉलेज से ले हुई है। वकालत में आगे की पढ़ाई उन्होंने धारवाड़ के गुलबर्गा (कलबुर्गी) कर्नाटक यूनिवर्सिटी के सेठ शंकरलाल लाहोटी लॉ कॉलेज से पूरी की है। इससे पहले अपनी स्कूली शिक्षा इन्होंने नूतन विद्यालय गुलबर्गा से ही पूरी की थी। उन्होंने अपने जीवन में किताबें पढ़ना अपना शौक बनाया और तर्कसंगत विचार पर मंथन और अंधविश्वासों और रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाने में दिलचस्पी रखी है।

खड़गे का परिवार और उनके व्यक्तित्व पर असर

खड़गे का परिवार और उनके व्यक्तित्व पर असर

मापनन्ना खड़गे और साईबाव्वा खड़गे के बेटे मल्लिकार्जुन खड़गे ने राधाबाई खड़गे के साथ 13 मई, 1968 को शादी रचाई थी। दोनों के तीन बेटे और दो बेटियां हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-प्रियांक,राहुल और मिलिंद। प्रियदर्शनी और जयश्री। कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों के नाम भी गांधी-नेहरू परिवार से प्रभावित होकर रखे हैं। खड़गे परिवार मूल रूप से बीदर के वारावट्टी का रहने वाला है, जो पहले हैदराबाद-कर्नाटक का क्षेत्र था, जिसपर निजामों का शासन था। जब खड़गे सिर्फ सात साल के थे तो सांप्रदायिक हिंसा की वजह से उनके परिवार को मजबूरन गुलबर्गा (कलबुर्गी) शिफ्ट करना पड़ा था। उस हिंसा में इनके परिवार के कई सदस्यों की जानें चली गई थीं, जिसमें उनकी मां भी शामिल थीं। खड़गे के व्यक्तित्व पर इसका बहुत असर पड़ा है और कहते हैं कि उनकी कठोर 'धर्मनिरपेक्षता' में उसका बहुत ही गहरा प्रभाव है।

मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़े रोचक तथ्य

मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़े रोचक तथ्य

मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियंक खड़गे ही राजनीति में हैं और कांग्रेस के एमएलए और कर्नाटक पूर्व मंत्री हैं। बाकी सदस्यों को राजनीति से कोई रिश्ता नहीं है। 2019 में खड़गे की जब गुलबर्गा लोकसभा सीट से पहली हार मिली थी तो उसमें उनके पूर्व इलेक्शन एजेंट ने ही उनकी चुनावी बत्ती गुल की थी। बीजेपी राज्य की 28 में से 25 सीटें जीत गई थी औ उसके उम्मीदवार उमेश जाधव ने अपने पूर्व नेता खड़गे को मात दी थी। खड़गे खुद को भगवान बुद्ध और डॉक्टर अंबेडकर के अनुयायी बताते हैं।

मल्लिकार्जुन खड़गे की संपत्ति

मल्लिकार्जुन खड़गे की संपत्ति

2020 के राज्यसभा चुनाव में मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव आयोग में अपनी संपत्ति का जो ब्योरा दिया था, उसके मुताबिक कुल 20 करोड़ रुपए मूल्य की चल-अचल संपत्ति थी। तब उन्होंने खुद पर 23 लाख रुपए की देनदारी भी दिखाई थी। हालांकि, उनके मुताबिक उन्होंने अपने नाम पर कोई गाड़ी नहीं खरीद रखी है।

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