राज्यसभा में जीएसटी पर बहस, जानिए किसने क्या कहा

कई सालों की खींचतान और कांग्रेस पार्टी का विरोध खत्म होने के बाद जीएसटी बिल राज्यसभा में पेश किया गया। इस पर बहस में कई नेताओं ने अपना पक्ष रखा। आइए जानते हैं किसने क्या कहा।

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बीएमसी की चुंगी है कई राज्यों के बजट से अधिक

एनसीपी के सांसद प्रफुल पटेल ने कहा कि जीएसटी को राज्य और केन्द्र दोनों की स्तरों पर लागू करना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। वे बोले कि जीएसटी को लागू करते समय हमें समानता का ध्यान रखना होगा। उन्होंने बीएमसी का उदाहरण देते हुए कहा कि बीएमसी की सिर्फ चुंगी से होने वाली आय इतनी है, कि इसके सामने देश के कई छोटे राज्यों के साल भर के बजट भी कम पड़ जाएं। प्रफुल पटेल ने भी कहा कि जीएसटी बिल को फाइनेंस बिल की तरह ही पेश किया जाना चाहिए, न कि मनी बिल की तरह।

24 फीसदी जीएसटी दर विकलांग बना देगी

सीपीएम के नेता सीताराम येच्युरी ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि भारत राज्यों का एक संगठन है और राज्यों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्या हम राज्यों के हाथ में कटोरा थमा कर उन्हें केन्द्र से पैसों की भीख मांगने के लिए कह रहे हैं? हम राज्यों के अधिकारों की सुरक्षा कैसे करेंगे? राज्यसभा राज्यों की काउंसिल है। उन्होंने वित्त मंत्री से इस मुद्दे पर ध्यान देने का अनुरोध भी किया। उन्होंने कहा कि अगर जीएसटी दर 24 प्रतिशत रखी गई तो फिर ये देश के अधिकतर लोगों को विकलांग जैसा बना देगा।

भ्रष्टाचार में आएगी कमी

जदयू नेता शरद यादव ने कहा कि जीएसटी बिल को मनी बिल की तरह पास नहीं करना चाहिए, बल्कि एक फाइनेंस बिल की तरह पास करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस बिल को पास करते समय राज्यों की आय को भी ध्यान में रखना चाहिए। शरद यादव बोले कि उन्हें उम्मीद है कि जीएसटी बिल से देश में हो रहे भ्रष्टाचार में कमी आएगी।

गिरगिट समझौता टैक्स है जीएसटी

पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के नेता डीरेक ओब्रायन ने कहा कि वह भी इस बिल के आइडिया को पसंद करते हैं, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर कांग्रेस इस बिल का समर्थन कर रही है या फिर इसका विरोध कर रही है। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि जीएसटी टैक्स को गिरगिट समझौता टैक्स भी कहा जा सकता है। यह एक ट्रेजरी और अपोजिशन टैक्स के बीच में एक पिंग-पॉन्ग मैच जैसा हो गया है।

ओब्रायन ने चिदंबरम पर निशाना साधते हुए कहा कि सिर्फ जीएसटी का आइडिया होना ही काफी नहीं है, इसे लागू करना भी जरूरी है। उन्होंने उन देशों के नाम भी गिनाए जहां पर सरकारों ने सत्ता में आने के बाद जीएसटी लागू तो किया, लेकिन उसकी वजह से हार का मुंह देखना पड़ा। वो बोले कि जीएसटी सत्ता के लिहाज से 50-50 का मामला है।

न चाहते हुए भी हम कर रहे हैं जीएसटी बिल का समर्थन

समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल ने कहा कि हम न चाहते हुए भी इस बिल का समर्थन कर रहे हैं, ताकि ये न लगे कि इस बिल सिर्फ समाजवादी पार्टी रोड़ा बन रही है। भाजपा पर निशाना साधते हुए वे बोले कि आप जब भी बिल लाते हैं तो जनता को ऐसा आइना दिखाते हैं, जिससे लगता है कि एक बड़ी क्रांति आ जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होता।

राज्य और केन्द्र का कुल टैक्स मिलाकर 32-34 प्रतिशत पड़ रहा है, लेकिन अब टैक्स 14-15 प्रतिशत रखने की उम्मीद की जा रही है, ऐसे में आमदनी कैसे बढ़ेगी। राज्यों को यह भी भय है कि आखिर राज्यों की आमदनी का क्या होगा? हालांकि, केन्द्र कहता है कि वह राज्य को उनका हिस्सा देंगे, लेकिन इस तरह से भी राज्यों की आमदनी पर काफी असर पड़ जाएगा, जिसके चलते राज्य सरकारों में भय है।

नरेश अग्रवाल ने जीएसटी बिल के लागू होने के मुद्दे पर भी सवाल उठाया। वे बोले कि वित्त मंत्री कहते हैं कि 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी बिल लागू किया जाएगा, लेकिन ऐसा कैसे होगा? अभी राज्यसभा से बिल पास होने के बाद राज्यों के पास जाएगा वहां से फिर वापस लोक सभा और राज्य सभा से पास होगा और फिर उसके बाद राज्यों के पास जाएगा। ऐसे में 1 अप्रैल 2017 से इसे लागू करना संभव नहीं लगता।

10 लाख तक के कारोबारियों को जीएसटी से छूट दिए जाने का पक्ष भी नरेश अग्रवाल ने रखा, ताकि छोटे कारोबारियों का नुकसान न हो। उन्होंने कहा कि यह भी अभी बताया जाना चाहिए कि क्या खाद्य पदार्थों पर भी जीएसटी लगेगा? क्योंकि अगर खाद्य पदार्थों पर जीएसटी लगेगा तो इससे महंगाई काफी अधिक बढ़ जाएगी।

कांग्रेस ने कभी जीएसटी का विरोध नहीं किया

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि जो भी लोग जीएसटी विरोध कर रहे थे, पिछले तीन-चार हफ्तों में उनका नजरिया बदल चुका है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि कांग्रेस कभी भी जीएसटी बिल के आइडिया का विरोध नहीं कर रही थी। कांग्रेस ने 2014 में जीएसटी बिल का विरोध किया था, न कि जीएसटी बिल के आइडिया का। उस विरोध का कारण यह था ताकि जीएसटी बिल को और अधिक बेहतर बनाया जाए।

हमने भी विपक्षी पार्टियों की सहमति से जीएसटी बिल को पास कराने की कोशिश की थी, लेकिन हम ऐसा करने में असफल रहे थे। इस बिल में बहुत सी कमियां हैं, जिन्हें सुधार की जरूरत थी, यही कारण है कि हम इस बिल का समर्थन नहीं कर रहे थे। पिछले 18 महीनों में सरकार ने जीएसटी बिल को बिना मुख्य विपक्ष के समर्थन के ही पास कराने की कोशिश की और मुझे खुशी है कि आप भी असफल रहे।

अगर आज इस बिल को पास किया जाता है तो यह एक गंभीर चर्चा और डिबेट के बाद होगा। हमें उम्मीद है कि वित्त मंत्री इस बिल को सभी की राय को ध्यान में रखकर ही पास करेंगे। इस बिल की एक कमी यह है कि आखिर कुछ राज्यों को 1 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? अगर ऐसा होता है तो देश भर में समान टैक्स की बात गलत साबित हो जाएगी और राज्यों में अलग-अलग टैक्स लगेगा।

यह सिर्फ केन्द्रीय वित्त मंत्री और राज्य वित्त मंत्रियों के बीच की बात नहीं है, बल्कि जीएसटी जनता के लिए लाया जा रहा है। इस बिल का मुख्य मुद्दा यह है कि आखिर टैक्स रेट क्या होगा? हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अप्रत्यक्ष करों का मुद्दा सुलझाना चाहते हैं। जीएसटी का रेट 18 प्रतिशत होना चाहिए जो कि जनता को भी स्वीकार होगा। साथ ही इस टैक्स में बदलाव सिर्फ संसद की अनुमति के बाद ही होना चाहिए।

जीएसटी देश के बाजार को एकीकृत कर देगा

बहस को शुरू करते हुए अरुण जेटली ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपनी बात रखी। अरुण जेटली ने कहा कि जीएसटी की मंजूरी के लिए दो तिहाई वोटिंग का अधिकार राज्यों के पास हैं, जबकि एक तिहाई वोटिंग का अधिकार केन्द्र के पास है। जेटली बोले कि जीएसटी के जरिए देश का बाजार एकीकृत हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जीएसटी बिल राज्यों को काफी अधिक फायदा पहुंचाएगा। इससे राज्यों की आय में तो इजाफा होगा ही साथ ही केन्द्र की आय में भी इजाफा होगा। पूरे देश में समान टैक्स रेट होने की वजह से टैक्स चोरी पर भी नजर रखना आसान हो जाएगा।

कबसे चल रहा है जीएसटी का मामला

आपको बता दें कि करीब 16 साल पहले 2000 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने जीएसटी की नींव रखी थी। तभी से बहुमत न मिल पाने के कारण यह लगातार टलता रहा है। इसके बाद 2009 में दोबारा इसे लागू करने की कोशिशें की गईं, लेकिन उस समय अधिकतर राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें थीं, जिसके चलते जीएसटी का विरोध होता रहा। सभी गैर कांग्रेसी सरकारें नुकसान की भरपाई की मांग कर रही थीं।

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