Maharashtra Politics: शिवसेना की लड़ाई में एकनाथ शिंदे से 'तीसरी' हार, आगे और कमजोर क्यों पड़ेंगे उद्धव ठाकरे?

Maharashtra speaker verdict on Shiv Sena MLAs disqualification: महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर ने शिवसेना के 16 विधायकों को अयोग्य ठहराने की उद्धव ठाकरे गुट की याचिका को ठुकरा दिया है।

स्पीकर राहुल नार्वेकर ने यह भी साफ किया है कि शिवसेना के संविधान के मुताबिक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी ही असली शिवसेना है और वही इसके प्रमुख हैं।

uddhav thackeray vs eknath shinde

शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता की याचिका पर उद्धव का बड़ा झटका
महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर का फैसला उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका है।

स्पीकर का फैसला ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं और साल के आखिर में महाराष्ट्र विधानसभा के भी चुनाव होने वाले हैं।

शिवसेना पर सीएम शिंदे से लड़ाई में उद्धव की लगातार 'तीसरी' हार
दरअसल, शिवसेना पार्टी पर दावे की लड़ाई में उद्धव ठाकरे की यह लगातार 'तीसरी' हार है। पहले चुनाव आयोग ने सीएम शिंदे गुट की पार्टी को असली शिवसेना माना था और उसे पार्टी का आधिकारिक चुनाव निशान भी आवंटित कर दिया था।

उद्धव को दूसरा झटका तब लगा था, जब सुप्रीम कोर्ट ने सीएम एकनाथ शिंदे की सरकार को संवैधानिक करार दिया था। अब स्पीकर ने यह कहकर कि एकनाथ शिंदे को विधायक दल के नेता पद से हटाने का अधिकार उद्धव के पास नहीं था और उनके गुट के 16 विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, तो यह उनकी तीसरी हार है।

स्पीकर ने उद्धव गुट की याचिका ठुकराई
राहुल नार्वेकर ने साफ किया है कि शिंदे को नेता पद से हटाने का फैसला शिवसेना की तत्कालीन 'पार्टी कार्यकारिणी कर सकती थी।' उनके फैसले में कहा गया है कि पाटी टूटने के समय शिंदे के पास 37 विधायकों का बहुमत था, इसलिए उनकी पार्टी ही असली शिवसेना है। स्पीकर ने उद्धव गुट की दलील खारिज करते हुए शिंदे गुट के 16 विधायकों को अयोग्य करार देने से भी इनकार कर दिया है।

आगे और कमजोर क्यों पड़ेंगे उद्धव ठाकरे?
इस फैसले का उद्धव ठाकरे के राजनीतिक करियर पर फिलहाल बड़ा असर पड़ सकता है। अभी इंडिया अलायंस में उनकी पार्टी शिवसेना (यूबीटी) महाराष्ट्र की 48 में से 23 सीटें लड़ने का दावा कर रही है।

कांग्रेस पहले ही कह रही थी कि आपकी पार्टी टूट चुकी है। अब उद्धव का गठबंधन में सीटों पर सौदेबाजी करने की हैसियत और कम हो सकती है।

एकनाथ शिंदे का मनोबल और बढ़ेगा
यही नहीं, एकनाथ शिंदे गुट का मनोबल भी बढ़ सकता है। क्योंकि, उसके पास यह दलील देने की पुख्ता वजहें मौजूद हैं कि तीन-तीन संवैधानिक संस्थाओं ने शिवसेना में उनके फैसलों पर मुहर लगाई है, क्योंकि उद्धव के दावों का आधार ही गलत रहा है।

शिवसैनिकों की भी सहानुभूति घटने की आशंका
अभी तक यही माना जा रहा था कि शिंदे गुट के साथ सिर्फ पार्टी के विधायक और सांसद जुड़े हैं। लेकिन, अब उन्हें शिवसैनिकों में भी यह संदेश पहुंचाने का मौका मिला है कि पार्टी संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना को उद्धव ठाकरे मनमर्जी से चला रहे थे। शिवसेना संस्थापक ने पार्टी का जो संविधान बनाया था, उसका उल्लंघन किया जा रहा था।

इस फैसले के बाद जो नेता और जन-प्रतिनिधि अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ बने हुए हैं, उनके भी टूटकर शिंदे सेना के साथ जुड़ने की आशंका बढ़ सकती है। यानी उद्धव को अपनी पार्टी को बचाए रखने की भी चुनौती मिल सकती है।

उद्धव गुट वैसे इस फैसले को लेकर पहले से ही आशंकित था और उसे महसूस हो चुका था कि स्पीकर के दरबार में आसानी से दाल गलने वाली नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी पहले से ही की गई थी।

स्पीकर ने अपने फैसले को पूरी तरह से चुनाव आयोग के फैसले पर ही आधारित करने की कोशिश की है। इसलिए फिलहाल उद्धव इस लड़ाई में काफी पिछड़ते नजर आ रहे हैं।

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