Maharashtra Politics: 'शिवसेना ऐसे खत्म नहीं होगी', उद्धव की पार्टी को कहां से मिल रही है इतनी सियासी ऊर्जा?

Maharashtra speaker verdict news on Shiv Sena: महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने शिवसेना के 16 विधायकों को अयोग्य ठहराने की उद्धव ठाकरे गुट की याचिका ठुकरा कर उन्हें बहुत बड़ा सियासी झटका दिया है। लेकिन, शिवसेना (यूबीटी) के हौसले अभी भी बुलंद हैं।

उद्धव के बेहद खास और शिवसेना (यूबीटी) के बड़े नेता संजय राउत ने महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर के फैसले पर बहुत ही तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना ऐसे खत्म नहीं होगी।

uddhav thackeray and shiv sena

शिवसेना जनता में है...संजय राउत
राउत ने स्पीकर के फैसले के बाद कहा, 'भारतीय जनता पार्टी का यह बहुत बड़ा षड़यंत्र रहा, बहुत बड़ा पुराना सपना रहा था कि एक दिन हम बालासाहेब की शिवसेना को खत्म कर देंगे। लेकिन, शिवसेना ऐसे खत्म नहीं होगी...आपके एक निर्णय से..आपके एक कागज से.....शिवसेना जनता में है.....शिवसेना महाराष्ट्र के रगों-रगों में है।'

उद्धव ठाकरे की शिवसेना की सियासी ताकत क्या है?
पिछले दो वर्षों में उद्धव ठाकरे को शिवसेना की लड़ाई में कई झटके लग चुके हैं। लेकिन, शिवसेना (यूबीटी) के नेता अभी भी सामने से बहुत ही
बुलंद दिखने की कोशिश करते हैं। सवाल है कि उनकी पार्टी को इस तरह की राजनीतिक ऊर्जा मिल कहां से रही है?

बालासाहेब की शिवसेना का आधार रहे हैं 'शाखा'
असल में उद्धव के पिता बालासाहेब ठाकरे ने जो शिवसेना स्थापित की थी, उसकी कमान उन्होंने अपने पास जरूर रखी थी, लेकिन शाखा के तौर पर जमीनी स्तर पर पार्टी का एक बहुत ही मजबूत संगठन खड़ा किया था। यही वो शाखा थे, जिनके दम पर बालासाहेब के एक इशारे में 'अक्खा मुंबई' ठप कर दी जाती थी।

शिवसेना में शाखा वह जमीनी संगठन है, जो शीर्ष नेतृत्व के आदेश के अनुसार स्थानीय शिवसैनिकों को गोलबंद करता है और पार्टी के लिए बूथों तक मतदाताओं का पहुंचना सुनिश्चित करवाता है।

शिवसेना (यूबीटी) को अभी भी शाखा पर दबदबे का भरोसा
शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं को अभी भी उम्मीद है कि शाखा के माध्यम से पार्टी के मूल कार्यकर्ता या शिवसैनिक उसी के साथ जुड़े हुए हैं और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना में केवल नेताओं, विधायकों का जमावड़ा हुआ है।

शिवसेना में शाखा प्रमुख का रोल अहम रहा है
जहां तक शिवसेना के शाखा की बात है तो जैसे बीएमसी में कुल 227 वॉर्ड हैं। तो इन सबके लिए एक-एक शाखा गठित है, जिसका नेता शाखा प्रमुख कहलाता है। यही शाखा प्रमुख पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आम कार्यकर्ताओं के बीच लिंक का काम करती है।

शाखाओं से मिलती थी शिवसेना संस्थापक को ताकत
शाखा की खासियत यह है कि यह जमीनी स्तर पर लोगों के साथ जुड़ी रहती है। उनके हर प्रयोजनों में शिवसैनिक उनके साथ होते हैं। कुल मिलाकर यह जन-संपर्क बनाए रखने का बालासाहेब की पार्टी का ठोस आधार हुआ करती थी और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी थी।

पिता की सियासी विरासत के भरोसे उद्धव
शिवसैनिक, शाखा और शिवसेना प्रमुख के बीच बालासाहेब ठाकरे के समय राजनीतिक रिश्ते से कहीं ज्यादा भावनात्मक नाता मजबूत था। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं को लगता है कि उनके बेटे होने की वजह से यह भावनात्मक नाता स्वाभाविक तौर पर उद्धव से जुड़ा हुआ है।

कहा तो यहां तक जाता है कि शाखाओं पर सीएम शिंदे की उतनी पकड़ आज भी नहीं बन पाई है, जितनी उद्धव ठाकरे की है। मुंबई में तो इसकी एक वजह ये हो सकती है कि देश के कई छोटे राज्यों से बड़ी बजट वाली भारत की सबसे अमीर नगर निकाय बीएमसी आज भी उद्धव गुट के कब्जे में है।

शिवसेना पर एकनाथ शिंदे गुट का कानूनी अधिकार बार-बार स्थापित हो चुका है। लेकिन, वह शिवसैनिकों का कितना भरोसा जीत पाए हैं, यह तभी स्पष्ट हो सकता है, जब लोकसभा, विधानसभा या बीएमसी का चुनाव हो।

दो चुनाव तो इस साल होने तय हैं और लोकसभा चुनावों के बाद बीएमसी चुनाव की भी संभावनाएं बढ़ सकती हैं। कम से कम तबतक उद्धव गुट यह मानकर चलने के लिए स्वतंत्र है कि पार्टी का कार्यकर्ता और जनाधार उसके साथ आज भी बालासाहेब के जमाने की तरह ही बना हुआ है।

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