ISIS आतंकियों के लड़कियां अरेंज करता था माजिद
मुंबई। महाराष्ट्र के आरिफ माजिद की वापसी निश्चित तौर पर उन भारतीय एजेंसी के लिए एक अहम मोड़ की तरह है जो देश में आईएसआईएस के खतरे से निबटने की तैयारी कर रही है। माजिद की वापसी उन तमाम मुसलमान युवकों के लिए एक संदेश की तरह है जो समझते हैं कि आईएसआईएस काफी कूल संगठन है।

अगर वह इसमें शामिल होंगे और लड़ाई करेंगे तो उन्हें जन्नत नसीब होगी। माजिद ने जो भी कहानी बयां की है, उससे तो यही लगता है कि भारत से गए लोग आईएसआईएस के लिए नौकरों से ज्यादा नहीं हैं।
टूट गईं माजिद की उम्मीदें
माजिद को जब आईएसआईएस में शामिल किया गया था जो उसे उम्मीद नहीं थी कि वह सिर्फ एक निचले स्तर का कर्मी या फिर उस इंसान में तब्दील होकर रह जाएगा जो आईएसआईएस के बाकी लोगों के महिलाओं का इंतजाम करेगा। आपको बता दें कि माजिद पेशे से एक इंजीनियर है और उसके बाकी साथी भी काफी पढ़े-लिखे हैं।
माजिद की ही तरह कई भारतीय युवा आईएसआईएस में शामिल होने की ख्वाहिश रखते हैं। लेकिन इसके साथ ही इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें संगठन की ओर से लड़ाई में उतारा जाए क्योंकि यह युवा लड़ाई में उस तरह से सक्षम नहीं है जितने कि उसके बाकी लड़ाके हैं।
आरिफ माजिद और उसके चार साथियों का आईएसआईएस तक का सफर एक जैसा ही है। कल्याण के रहने वाले इन चारों युवाओं ने बहुत ही उम्मीदों के साथ देश छोड़ा था। इन्हें लगा कि आईएसआईएस को एक ग्लोबल काउंसिल के लिए उनकी जरूरत है।
माजिद लड़ाई करना चाहता था जबकि उसका साथही शाहीन टांकी और बाकी लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए संगठन को मदद करने के बारे में सोचा।
आईबी और एनआईए को जो भी जानकारियां हासिल लगी हैं उसके मुताबिक संगठन उनके लिए जल्द ही एक बड़ी नाउम्मीदी में तब्दील हो गया। यह चारों लड़ाई करना चाहते थे जबकि आईएसआईएस ने इन्हें ऐसे काम दे दिए जो इन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। इन्हें सफाई और पानी लाने जैसे काम सौंपे गए।
ISIS के हिंद के लोग
जैसे ही कोई भी भारतीय सीरिया या इराक में पहुंचता इनके लिए एक कैंप बना होता। भारत से आने वाले लोगों को हिंद के लोग कहकर पहचाना जाता। बाकी लोगों की तरह भारतीयों को लड़ाई के लिए नहीं ले जाया जाता था।
हाजा फखरुद्दीन ही एक अपवाद है जो आईएसआईएस के लिए लड़ते हुए सीरिया में मारा गया था। माजिद और बाकी लोगों को जो काम आईएसआईएस ने दिया था वह इनके लिए तुच्छ था और किसी बड़े झटके से कम नहीं था।












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