ओबीसी जातियों का नया मोर्चा, छगन भुजबल ही कर रहे लीड, नई पार्टी या नया मोर्चा
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के विरोध में जिस तरह से 17 नवंबर को जालना में ओबीसी रैली हुई है, उससे प्रदेश की राजनीति में वर्षों से शांत पड़ी ओबीसी राजनीति को फिर से जगा दिया गया है।
मराठा आरक्षण आंदोलन को टक्कर देने के लिए जो ओबीसी रैली आयोजित हुई थी, उसके पीछे राज्य के कैबिनेट मंत्री और अजित पवार गुट की एनसीपी के नेता छगन भुजबल की सोच ने मुख्य रूप से काम किया है। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी समर्थित सरकार ही प्रदेश का माहौल खराब करने का काम कर रही है।

ओबीसी एकता के नाम पर भुजबल ने सभी दलों के नेताओं को जुटाया
भुजबल के नजरिए से उनकी कामयाबी ये रही कि उन्होंने ओबीसी एकता के नाम पर यहां अलग-अलग दलों के ओबीसी नेताओं को एकजुट कर लिया।
भुजबल के मंच पर पहुंचने वाला सबसे चौंकाने वाला नाम विजय वडेट्टीवार का था, जिन्होंने वहां यह तक कह दिया कि अगर भुजबल कोई राजनीतिक बैनर खड़ा करेंगे तो वह कांग्रेस छोड़कर भी उनके साथ आने के लिए तैयार हैं।
ओबीसी रैली में जुटे नेताओं ने भुजबल को सीएम चेहरे के तौर पर पेश किया
हालांकि, भुजबल ने यहां खुद से अलग राजनीतिक पार्टी को लेकर अपने पत्ते तो नहीं खोले, लेकिन इस मंच पर पहुंचे कई ओबीसी नेताओं ने साफ तौर पर उन्हें ओबीसी समाज के सीएम के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया।
मसलन, बंजारा समुदाय के नेता और पूर्व विधायक नारायण मुंडे ने कहा, 'ओबीसी को जो मौजूदा हालात का सामना करना पड़ रहा है, इसकी वजह ये है कि हम सत्ता में नहीं हैं। इसलिए भुजबल साहेब हम चाहते हैं कि आप हमारे जनरल बनें। आपको मुख्यमंत्री बनना चाहिए। हम सब यही चाहते हैं। ओबीसी वोटर आपके साथ है। आप मुख्यमंत्री बनने की तैयारी कीजिए।'
हालांकि, भुजबल ने ओबीसी नेताओं की मांग पर सीधी टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन उन्होंने यह संकेत जरूर दे दिया कि उन्हें अपनी राजनीति नए सिरे से आगे बढ़ाने का रास्ता दिख चुका है।
ओबीसी-आधारित पार्टी बनाने का दिया संकेत
उन्होंने कहा, 'बीजेपी के नेता भी यहां उपस्थित हैं और मैं उनसे कुछ कहना चाहता हूं। यह कहा जाता है कि 60% ओबीसी बीजेपी को वोट देते हैं, लेकिन अगर कल मतदाताओं को लगता है कि उनका आरक्षण प्रभावित होने जा रहा है तो वे क्या करेंगे?' वह मराठाओं को आरक्षण देने की स्थिति को लेकर बात कर रहे थे।
भुजबल की इन बातों में सिर्फ मराठा आरक्षण देने की संभावनाओं के खिलाफ बीजेपी के लिए चुनौती ही नहीं थी, खुद ओबीसी आधारित वोट बैंक के दम पर अपने अलग राजनीतिक दल बनाने का संकेत भी साफ था। क्योंकि, ओबीसी, दलित और मुसलमानों को लेकर अलग पार्टी बनाने का उनका विचार कोई नया नहीं है।
2014 के चुनावों से पहले ऐसी चर्चाएं थीं कि भुजबल दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे के साथ मिलकर एक नया राजनीतिक मंच बनाना चाहते हैं। लेकिन, मुंडे के निधन के बाद भुजबल कानूनी उलझनों में फंस गए और उनके मंसूबे धरे रह गए।
भुजबल के सियासी मंसूबे को लगा पहला झटका
हालांकि, भुजबल ने जिस ओबीसी राजनीति को महाराष्ट्र में अपने लिए शायद सीएम की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता समझा है,उसकी शुरुआत ही बड़े झटके के साथ शुरू हुई है। जिस कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र विधानसभा में विरोधी दल के नेता विजय वडेट्टीवार ने ओबीसी रैली में भुजबल के मंसूबे के समर्थन में कांग्रेस छोड़ने तक की बात कही थी, उनका रुख अब अचानक बदल गया है। उन्हें अब लग रहा है कि भुजबल के स्टैंड से महाराष्ट्र में मराठा बनाम ओबीसी का माहौल बन रहा है।
अब उन्होंने अपने बदले हुए सुर में भुजबल पर निशाना साधते हुए महाराष्ट्र की महायुती सरकार पर हमला किया है। उन्होंने कहा है, 'समस्याओं का हल निकालना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके बजाए जो सत्ता में हैं वही समस्याएं पैदा कर रहे हैं, तब उन लोगों को हट जाना चाहिए।'












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