'हो सकता है कि वह बाघ आदमखोर ना हो'- मद्रास HC की इस टिप्पणी के मायने समझिए

चेन्नई, 5 अक्टूबर: तमिलनाडु में एक बाघ को कैसे काबू में किया जाए, इसको लेकर वहां का वन विभाग मंथन की दौर से गुजर रहा है। मामला मद्रास हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है और खुद चीफ जस्टिस को इस मामले में दखल देनी पड़ी है। अदालत ने वन विभाग के अधिकारियों से कहा है कि हो सकता है कि उस बाघ को लेकर कुछ गलतफहमियां हो रही हों। हो सकता है कि वह आदमखोर ना हो। इसलिए तुरंत मारने की कोशिश ना किया जाए। अदालत ने देश में बाघों की कम संख्या की वजह से यह चिंता जताई है। आइए जानते हैं कि कैसे भारत में बाघों का संरक्षण सिर्फ वन्यजीवों को बचाने के लिए जरूर नहीं है। इसका सीधा नाता पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

तुरंत मारने की कोशिश ना करें- हाई कोर्ट

तुरंत मारने की कोशिश ना करें- हाई कोर्ट

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु वन विभाग से कहा है कि बाघ को तुरंत न मारें, क्योंकि हो सकता है कि वह आदमखोर ना हो। अदालत ने यह टिप्पणी देश में बाघों की संख्या पर चिंता जताते हुए की हैं और कहा है कि भारत में बहुत ही कम बाघ बच गए हैं। कोर्ट ने वन विभाग से साफ कहा है, 'तुरंत मारने की कोशिश ना करें, हो सकता है कि वह आदमखोर नहीं हो। हो सकता है कि गलतफहमी हो गई हो।' दरअसल, वन विभाग मुदुमलाई इलाके में टाइगर टी-23 को पकड़ने की कोशिश कर रहा है। मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीब बनर्जी ने टाइगर टी-23 को पकड़ने के तमिलनाडु के प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की है।

टाइगर टी-23 को मारने की योजना नहीं- वन विभाग

टाइगर टी-23 को मारने की योजना नहीं- वन विभाग

इसपर वन विभाग ने भी चीफ जस्टिस के सामने कहा कि बाघ को मारने की उसकी योजना नहीं है और वे उसे जिंदा पकड़ने की तैयारी कर रहे हैं। खबरें हैं कि टाइगर रिजर्व के नजदीक उस जंगली जानवर ने तीन लोगों को मार डाला है। उसी के बाद से टाइगर टी-23 को पकड़ने का फैसला किया गया है। लेकिन, इस आशंका में कि बाघ को मार न दिया जाए, पीपुल फॉर कैटल इन इंडिया की ओर से जनहित याचिका देकर उसे जिंदा पकड़ने की गुहार लगाई गई है। सुनवाई के दौरान प्रधान मुख्य वन संरक्षक की ओर से सरकारी वकील पी मुथुकुमार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि उस जंगली जानवर को मारने की कोई योजना नहीं है।

बाघों को लेकर क्यों चिंतित है अदालत ?

बाघों को लेकर क्यों चिंतित है अदालत ?

मद्रास हाई कोर्ट की चिंता की वजह समझिए। इस समय देश में करीब 2,967 बाघ बचे हुए हैं। जबकि, आपको हैरानी होगी कि यह संख्या दुनिया में बाघों की संख्या का 75% है। वैसे 2002 से 2006 के बीच देश में बाघों की संख्या में बड़ी गिरावट के बाद पिछले डेढ़ दशकों में इसमें धीरे-धीरे इजाफा हो रहा है। जबकि, भारत में बाघों के संरक्षण का काम 1973 से ही चल रहा है। अब सरकार ने अगले एक दशक में इसकी संख्या में 35% इजाफा करके बाघों की तादाद 4,000 तक ले जाने का लक्ष्य तय किया है।

बाघों का संरक्षण क्यों है जरूरी ?

बाघों का संरक्षण क्यों है जरूरी ?

कुछ समय पहले प्रोजेक्ट टाइगर के एडिश्नल डायरेक्टर जनरल एसपी यादव ने कहा था कि 'टाइगर रिजर्व से समाज, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को फायदा मिलता है।' वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के मुताबिक अगर एक बाघ का सफलतापूर्वक संरक्षण होता है तो लगभग 25,000 एकड़ जंगल सुरक्षित हो जाता है। इसका मतलब बाघों के संरक्षण का लक्ष्य पूरा होता है तो देश में 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में जंगल का विस्तार होगा और यह बढ़कर 81 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा हो जाएगा। इस दौरान देश में टाइगर रिजर्व की संख्या भी बढ़ेगी, जो कि मौजूदा वक्त में 51 है।

बाघों के संरक्षण से देश को कितना आर्थिक लाभ ?

बाघों के संरक्षण से देश को कितना आर्थिक लाभ ?

वहीं बाघों के संरक्षण से आर्थिक फायदे की बात करें तो ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक नई दिल्ली स्थित वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की चीफ इकोनॉमिस्ट मधु वर्मा ने कहा है कि अगर टाइगर रिजर्व पर एक रुपये का निवेश होता है तो एक साल में देश को उससे 243 से 7,488 गुना ज्यादा फायदा मिलता है। 2019 में प्रकाशित उनकी एक स्टडी से पता चलता है कि 10 टाइगर रिजर्व से साल में देश को 5,100 करोड़ रुपये से लेकर 16,200 करोड़ रुपय तक का सीधा या परोक्ष लाभ मिलता है।

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