कोर्ट में दावे, बोर्डरूम में चुप्पी- आखिर क्या छुपा रहा है L&T? MMRDA तक नहीं पहुंचे दस्तावेज़
देश की अग्रणी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने जवाबदेही के बजाय चुप्पी का रास्ता चुना है। मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA) के दो प्रमुख प्रकल्पों की निविदाओं में अयोग्यता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत वित्तीय दावे करने वाली एल एंड टी ने अब तक मुंबई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (MMRDA) के औपचारिक पत्र का कोई जवाब नहीं दिया है, जिसमें इन दावों से संबंधित दस्तावेज़ों की मांग की गई थी।

MMRDA ने 10 जून को एल एंड टी को एक पत्र भेजा था जिसमें कंपनी से अदालत में प्रस्तुत किए गए लागत का वर्गीकरण, मूल्य निर्धारण और उसका स्पष्टीकरण और अन्य सहायक दस्तावेज़ मांगे गए थे। एजेंसी ने इसके लिए सात कार्य दिवस की समय-सीमा दी थी। यह समय-सीमा अब समाप्त हो चुकी है और प्राधिकरण के अनुसार, एल एंड टी की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। एल एंड टी की यह चुप्पी इस बात को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है कि क्या सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किए गए आंकड़े वस्तुतः प्रमाणिक थे या सिर्फ न्यायालय और MMRDA पर दबाव बनाने की एक रणनीति?
क्या थे सुप्रीम कोर्ट में किए गए दावे?
एल एंड टी ने दावा किया था कि:
• गायमुख से फाउंटन होटल जंक्शन के बीच भूमिगत टनल परियोजना के लिए उसने ₹6,498 करोड़ की बोली लगाई थी।
• वहीं, फाउंटन जंक्शन से भायंदर तक के एलिवेटेड कॉरिडोर के लिए ₹5,554 करोड़ की बोली प्रस्तुत की थी।
ये आंकड़े कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी अयोग्यता को चुनौती देते हुए दाखिल याचिका के दौरान प्रस्तुत किए थे। हालांकि, बाद में जब MMRDA ने इन दोनों परियोजनाओं को सार्वजनिक हित में निरस्त कर फिर से निविदा निकालने का निर्णय लिया, तब अदालत ने याचिका को "निरर्थक" घोषित करते हुए खारिज कर दिया।
कुछ नया नहीं मांग रहा MMRDA
एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने बताया, "मुंबई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (MMRDA) केवल वही दस्तावेज़ मांग रहा है जो एल एंड टी ने खुद अदालत में दिए थे। अगर वही आंकड़े दोबारा मांगे जा रहे हैं, तो उन्हें साझा करने में समस्या क्या है?" उन्होंने कहा, "अगर कोई कंपनी सर्वोच्च न्यायालय में अपनी रक्षा के लिए जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा करती है और वही कागज़ात सार्वजनिक एजेंसी को देने से इंकार करती है, तो यह उसकी मंशा और आंकड़ों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।"
एक अन्य सूत्र के अनुसार, एल एंड टी की अयोग्यता कोई मनमाना निर्णय नहीं था, बल्कि इसके पीछे गंभीर चूकें थीं - जैसे कि तेलंगाना के मेडीगड्डा बैराज के ढहने की जानकारी छिपाना (जिसे आईआईटी बॉम्बे और तेलंगाना सरकार ने सत्यापित किया), बोली प्रक्रिया के दौरान अनिवार्य दस्तावेज़ न सौंपना और तकनीकी रूप से गैर-जवाबदेह बोली दाखिल करना। ये सभी आधार बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी स्वीकार किए गए।
दस्तावेज़ नहीं, तो विश्वास नहीं
जब MMRDA से पूछा गया कि वह इन दस्तावेज़ों पर इतना ज़ोर क्यों दे रहा है, तो एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "हम 10 जून को भेजे गए पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उत्तर मिलते ही विशेषज्ञों के साथ मिलकर आंकड़ों का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा। हमारा उद्देश्य पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देना है।"
एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा, "अगर एल एंड टी ने वास्तव में सबसे सस्ती और उपयुक्त बोली लगाई थी, जैसा कि उन्होंने अदालत में कहा, तो फिर उन दावों को प्रमाणित करने से हिचक क्यों?" विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि MMRDA इन आंकड़ों के आधार पर पुनर्निविदा की कीमत तय करने का प्रयास कर रहा है और इसके लिए अदालत में दिए गए किसी भी आंकड़े को बिना सत्यापन के स्वीकार नहीं किया जा सकता। हमें दस्तावेज़ चाहिए, दावे नहीं"।
एक वरिष्ठ निदेशक ने कहा, "अगर कोई कंपनी खुद को देश की सबसे विश्वसनीय इन्फ्रास्ट्रक्चर एजेंसी के रूप में प्रस्तुत करती है, तो उसे जवाबदेही के उच्चतम मानदंडों पर भी खरा उतरना चाहिए। यह वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य है।"
केवल टेंडर की बात नहीं, सत्य का सवाल है
एक ऑब्जर्वर ने अंतिम टिप्पणी में कहा, "यह मामला सिर्फ निविदा का नहीं ह, यह सत्य का मामला है। यह तय करेगा कि क्या कोई निजी ठेकेदार अदालत में अपनी सुविधा के अनुसार बयान देकर बाद में सार्वजनिक जवाबदेही से बच सकता है? अगर एल एंड टी के आंकड़े सही थे, तो अब तक दस्तावेज़ सौंप दिए गए होते।"
MMRDA अब ₹12,000 करोड़ की इन परियोजनाओं के लिए 'महाटेंडर' प्रक्रिया के तहत पुनर्निविदा आमंत्रित करने की तैयारी में है और उसने पारदर्शिता व प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है। लेकिन जब तक एल एंड टी खुद के द्वारा अदालत में प्रस्तुत दस्तावेज़ नहीं सौंपती, उसकी विश्वसनीयता पर संदेह बना रहेगा।
संचालन में लगातार लापरवाही?
जानकारों ने यह भी बताया कि एल एंड टी के प्रोजेक्ट्स में बीते कई महीनों में सुरक्षा से जुड़ी कई घटनाएं सामने आई हैं जो इसे महज इत्तफाक नहीं बल्कि एक व्यवस्थात्मक कमजोरी के रूप में रेखांकित करती हैं कई अखबारो में छपे रिपोर्ट के अनुसार:
• 12 जून 2025: चेन्नई मेट्रो साइट पर दो गर्डर गिरने से एक व्यक्ति की मौत
• 3 जून 2025: हुबली साइट पर मिट्टी धंसने से सुपरवाइज़र की मौत
• 6 नवंबर 2024: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में तीन श्रमिकों की मौत
• 2023: कोयंबटूर बायपास रोड परियोजना में 120 से अधिक मौतें दर्ज
एक प्रमुख कंस्ट्रक्शन कंपनी के सुरक्षा अधिकारी ने कहा, "ये घटनाएं महज संयोग नहीं हैं, बल्कि गंभीर प्रणालीगत विफलताओं का परिणाम हैं।"












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