BJP के ताबड़तोड़ प्रचार पर क्यों भारी पड़ सकती है सपा-बसपा की खामोशी, समझिए गणित

क्या वजह है कि यूपी में भाजपा के ताबड़तोड़ प्रचार के बावजदू अखिलेश यादव और मायावती ने अभी तक कोई रैली नहीं की है। जानिए अंदर की वजह।

नई दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2019) में पहले चरण के तहत होने वाले मतदान में पश्चिमी यूपी की आठ सीटों पर भी चुनाव होना है। इन आठों सीटों पर पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीत का परचम लहराया था। पहले चरण का चुनाव प्रचार थमने में महज पांच दिन शेष बचे हैं और भाजपा के दिग्गज नेताओं के अलावा इन आठों सीटों में से किसी भी सीट पर अभी तक सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) या बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) ने कोई रैली नहीं की है। अभी तक आए अलग-अलग सर्वे में यूपी के अंदर महागठबंधन को 30 से 40 सीटें मिलती हुईं नजर आ रही हैं। यानि महागठबंधन से भाजपा को नुकसान हो रहा है। तो आखिर क्या वजह है कि भाजपा के ताबड़तोड़ प्रचार के बावजदू उसके ऊपर बढ़त बनाने वाले सपा-बसपा के खेमे में खामोशी है। जिन आठ सीटों पर प्रचार में केवल कुछ ही दिन बचे हैं, वहां किस रणनीति के तहत अखिलेश और मायावती ने अब तक कोई रैली नहीं की?

ये है सपा-बसपा की रणनीति

ये है सपा-बसपा की रणनीति

पहले चरण में गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, मेरठ, बिजनौर, कैराना, सहारनपुर, बागपत और मुजफ्फरनगर में मतदान होना है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर अगर नजर डालें तो पता चलता है कि इन आठों सीटों पर भाजपा ने भारी अंतर के साथ जीत हासिल की थी। फिर चाहे वो गाजियाबाद में 5 लाख 67 हजार वोटों के अंतर से केंद्रीय मंत्री वीके सिंह की जीत हो या फिर मुजफ्फरनगर सीट पर 4 लाख वोटों के साथ संजीव बालियान की जीत। सियासी जानकारों के मुताबिक साल 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद जो माहौल बदला, उसमें भाजपा को फायदा हुआ और उसने सपा-बसपा और आरएलडी का सफाया कर दिया। पहले चरण की इन आठों सीटों पर महागठबंधन की खामोशी की सबसे बड़ी वजह यही है। दरअसल अखिलेश यादव और मायावती नहीं चाहते कि पश्चिमी यूपी में एक बार फिर से वोटों का ध्रुवीकरण हो और भाजपा को इसका लाभ मिले।

पढ़ें- यूपी पर लोकसभा चुनाव की विशेष कवरेज

विपक्ष के दांव के इंतजार में भाजपा

विपक्ष के दांव के इंतजार में भाजपा

अगर गहराई से समझा जाए तो वेस्ट यूपी को लेकर अखिलेश यादव और मायावती एक बड़ी रणनीति पर काम कर रहे हैं। अखिलेश और मायावती की पूरी कोशिश है कि वेस्ट यूपी में भाजपा को वोटों के ध्रुवीकरण का कोई मौका ना दिया जाए। एक तरह से देखें तो अभी तक इन आठ सीटों के सियासी अखाड़े में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ अकेले ही उतरे हुए हैं और विपक्ष की तरफ से दांव चल जाने के इंतजार में हैं। मायावती और अखिलेश बखूबी इस बात को समझते हैं और फिलहाल दूर-दूर रहकर ही माहौल पर नजर जमाए हुए हैं। सपा और बसपा के ये दोनों नेता नहीं चाहते कि वो अभी मैदान में उतरें और भाजपा को ध्रुवीकरण के जरिए अपने मुफीद माहौल बनाने का मौका मिले। अखिलेश यादव और मायावती फिलहाल स्थानीय स्तर के मुद्दों और स्थानीय नेताओं के आधार पर ही चुनाव प्रचार को रफ्तार दे रहे हैं। महागठबंधन के तीनों नेता अखिलेश यादव, मायावती और जयंत चौधरी 7 अप्रैल को पश्चिमी यूपी के देवबंद में संयुक्त चुनावी रैली करेंगे।

कैराना में सफल रही थी सपा-बसपा की रणनीति

कैराना में सफल रही थी सपा-बसपा की रणनीति

हालांकि हाल की परिस्थितियों को देखें तो सपा-बसपा और आरएलडी के साथ आने से इन सभी सीटों पर समीकरण काफी हद तक बदल चुके हैं। सपा-बसपा के साथ आने से दलित और मुस्लिम वोट महागठबंधन को मजबूत बना रहे हैं। कुछ सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को लेकर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में नाराजगी भी देखने को मिल रही है। फिर भी...अखिलेश यादव और मायावती कोई रिस्क नहीं लेना चाहते और इन आठों सीटों के मुकाबले को कैराना की तर्ज पर लड़ना चाहते हैं। कैराना में 2018 में हुए उपचुनाव में अखिलेश यादव या मायावती ने किसी तरह की कोई रैली या जनसभा नहीं की थी। लखनऊ से ही दोनों नेताओं ने कैराना का सियासी माहौल भांपा और स्थानीय मुद्दों के आधार पर अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए। हालांकि आरएलडी के नेता जयंत चौधरी ने कैराना सीट पर जरूर मेहनत की थी, लेकिन यहां मिली जीत के पीछे मायावती और अखिलेश यादव की रणनीति का भी अहम रोल था।

'अंतिम दिनों का प्रचार ज्यादा कारगर'

'अंतिम दिनों का प्रचार ज्यादा कारगर'

हालांकि, इस बारे में बहुजन समाज पार्टी के नेता सिकंदर यादव का कहना है कि अंतिम दिनों का चुनाव प्रचार ही ज्यादा कारगर सिद्ध होता है और इसीलिए महागठबंधन के सभी नेताओं ने 7 अप्रैल को पहली संयुक्त रैली रखी है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी यूपी की सभी सीटों पर भाजपा ने अपने पुराने उम्मीदवारों को ही टिकट दिया है, जिनका स्थानीय स्तर पर काफी विरोध है। सिकंदर यादव आरोप लगाते हैं कि पांच साल के कार्यकाल में भाजपा के सांसदों ने विकास का कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके आधार पर वो जनता के बीच जा सकें। उन्होंने कहा कि भाजपा की नीतियों को लेकर आम जनता के बीच काफी नाराजगी है।

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