मध्यप्रदेश: झाबुआ-रतलाम में भाजपा से ज्यादा अपनों से डरे कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया

नई दिल्ली। कांतिलाल भूरिया मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं। केंद्र में मंत्री भी रहे, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में दिलीप सिंह भूरिया से हार गए। दुर्भाग्य से एक साल बाद ही दिलीप सिंह भूरिया की ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हो गई। उपचुनाव हुए, जिसमें कांतिलाल भूरिया फिर खड़े हुए और करीब 88 हजार वोटों से जीते। उपचुनाव में भूरिया को जिताने के लिए कांग्रेस पार्टी ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को क्षेत्र में भेजा था। अब कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं और कांतिलाल भूरिया वापस अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं।

विधानसभा में बेटे की हार के बाद सतर्क

विधानसभा में बेटे की हार के बाद सतर्क

कांतिलाल भूरिया 1998, 1999, 2004 और 2009 में लोकसभा चुनाव चुनाव जीत चुके हैं। 2015 के उपचुनाव में उनकी जीत के पीछे भाजपा की अंदरूनी कलह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। विधानसभा चुनाव में उनके बेटे डॉ. विक्रांत भूरिया की हार से सतर्क कांतिलाल भूरिया लोकसभा चुनाव में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। उन्हें विरोधी भाजपा की तुलना में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से ज्यादा भय सता रहा है। इसीलिए भूरिया संसदीय क्षेत्र की हर विधानसभा सीट का दौरा कर रहे हैं और अपने कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं।

कांतिलाल भूरिया के बेटे डॉ. विक्रांत भूरिया ने झाबुआ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, जहां उनकी टक्कर भाजपा के गुमान सिंह डामोर से हुई थी। उस चुनाव में कांग्रेस के बागी जेवियर मेड़ा भी खड़े हो गए और भाजपा प्रत्याशी जीत गया। रतलाम में भी कांग्रेस का विधानसभा प्रत्याशी हार गया था। अब भूरिया झाबुआ के साथ रतलाम में भी मोहल्ले-मोहल्ले घूम रहे है और कोशिश कर रहे है कि मतदाताओं से सीधा संपर्क हो। रतलाम ग्रामीण क्षेत्र में यह कार्य उनके बेटे विक्रांत भूरिया ने संभाल रखा है।

कांग्रेस में बने हुए हैं कई गुट

कांग्रेस में बने हुए हैं कई गुट

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बागी जेवियर मेड़ा को मुख्यमंत्री भोपाल में समझाइश दे चुके हैं कि वे लोकसभा चुनाव में पार्टी का साथ दें। इसके बावजूद भूरिया को समर्थकों को जेवियर मेड़ा पर भरोसा नहीं है। जेवियर मेड़ा के समर्थकों का कहना है कि जब तक इस संसदीय क्षेत्र में कांतिलाल भूरिया को वर्चस्व बना है, तब तक दूसरे उम्मीदवारों के आगे आने का मार्ग अवरूद्ध है। विधानसभा चुनाव में मेड़ा को 30 हजार से ज्यादा वोट मिले थे और वे निर्णायक साबित हुए।

कांतिलाल भूरिया ने विरोधी गुट के महेश पटेल को आलीराजपुर जिले का पार्टी अध्यक्ष बनाकर उन्हें अपने पाले में ले लिया है। कांतिलाल भूरिया की भतीजी कलावती जोबट से चुनाव जीती थीं और वे भूरिया की मदद करने में आगे है। पेटलावद के विधायक वेलसिंह भूरिया और थांदला के विधायक वीरसिंह भूरिया भी कांतिलाल भूरिया के साथ है। कांतिलाल भूरिया ने कभी भी इन दोनों विधायकों को पसंद नहीं किया। वीरसिंह और वेलसिंह से उनके रिश्ते इतने बिगड़ गए थे कि वीरसिंह को एक बार टिकट से भी हाथ धोना पड़ा।

भाजपा ने विधायक गुमान सिंह डामोर पर डाली बड़ी जिम्मेदारी

भाजपा ने विधायक गुमान सिंह डामोर पर डाली बड़ी जिम्मेदारी

भारतीय जनता पार्टी यहां अपने विधायक गुमान सिंह डामोर पर भारी जिम्मेदारी डाल रही है। हाल ही में भाजपा में शामिल हुए गुमान सिंह लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में चीफ इंजीनियर थे। वे संघ की गतिविधियों में बहुत सक्रिय है और आरएसएस उन्हें पूरा समर्थन दे रहा है। लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी कोई भी हो, गुमान सिंह डामोर की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

इलाके के लोगों का कहना है कि पहले यहां कांतिलाल और दिलीप सिंह भूरिया का वर्चस्व था। इसके अलावा निर्मला भूरिया और कलावती भूरिया विधानसभा में सक्रिय रहती थी। वेलसिंह भूरिया और वीरसिंह भूरिया विधायक हैं। डॉ. विक्रांत भूरिया अगर चुनाव नहीं हारते, तो वे भी विधायक होते। यहां भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस पार्टी, दोनों ही पार्टियों में भूरिया परिवारों का जबरदस्त वर्चस्व है।

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