लोकसभा चुनाव 2019: हरियाणा में जाट बनाम ग़ैर-जाट मुद्दा है या सिर्फ़ शोर?
हरियाणा में 12 मई को लोकसभा का चुनाव सम्पन्न हो जाएगा लेकिन इस समय हर किसी को यह जानने की उत्सुकता है कि क्या हरियाणा में जाट बनाम ग़ैर-जाट का मुद्दा हक़ीक़त में मतदाताओं के सिर पर तारी है या फिर ये सिर्फ़ एक जुमला है.
फ़रवरी 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के अचानक हिंसक हो जाने के बाद प्रदेश के कुछ ज़िलों में ख़ासकर जाट बहुलता वाले इलाक़ों में व्यापक पैमाने पर आगज़नी व लूटपाट की घटनाएं हुई थीं और बड़ी तादाद में सरकारी और निजी सम्पत्तियां आग के हवाले कर दी गई थीं.
करोड़ों-अरबों रुपये का नुक़सान प्रदेश को झेलना पड़ा था. तक़रीबन 32 लोग हिंसा में मारे गये थे.
हिंसा व आगज़नी के लिए जाट समुदाय के लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था और खट्टर सरकार के कई मंत्रियों ने तो बार-बार इसको लेकर पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के दिग्गज नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा को दोषी ठहराया.
हालांकि राज्य सरकार के गठित किए गए प्रकाश जांच आयोग और सीबीआई ने इस मामले में हुड्डा के ख़िलाफ़ कोई तथ्य या सबूत नहीं पाया लेकिन अपने मंत्रियों के साथ-साथ ख़ुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी हुड्डा पर लगातार हमले करते रहे.
हरियाणा की राजनीति पर तीन किताबें लिख चुके राजनीतिक विश्लेषक पवन कुमार बंसल बताते हैं कि इन लोकसभा चुनावों में रोहतक और सोनीपत में 2016 में हुई हिंसा एक प्रमुख मुद्दा है. इन दोनों क्षेत्रों के इलाक़ों में उस वक़्त काफ़ी हिंसा और आगज़नी हुई थी.
रोहतक से बीजेपी उम्मीदवार अरविंद शर्मा और सोनीपत से बीजेपी उम्मीदवार रमेश कौशिक इसी मुद्दे पर वोट माँग रहे हैं. इन दोनों सीटों पर कांग्रेस से पिता-पुत्र भूपेन्द्र हुड्डा और दीपेन्द्र हुड्डा खड़े हैं. मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर कह चुके हैं कि आरक्षण आंदोलन के दौरान प्रदेश जलाने वालों के ख़िलाफ़ बीजेपी को वोट दीजिए.
पवन कुमार बंसल कहते हैं कि बीजेपी सरकार हिंसा रोकने में असफल रही लेकिन लोगों की शिकायत ये भी है कि उस वक़्त भूपेन्द्र हुड्डा और दीपेन्द्र हुड्डा दिल्ली में बैठे रहे. बाद में जब भूपेन्द्र हुड्डा रोहतक आए तो लोगों ने उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की थी.
"इस मुद्दे पर बीजेपी को ग़ैर-जाट वोट लेने में कामयाबी मिलती दिखाई दे रही है."
दरअसल, बीजेपी फ़ोकस कर रही है जाट बेल्ट कि चार सीटों - रोहतक, सोनीपत, भिवानी-महेंद्रगढ़ व हिसार पर जहाँ जाट समुदाय के काफ़ी वोट हैं.
हरियाणा में तक़रीबन 30 फ़ीसदी जाट समुदाय के लोग हैं.
हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार सतीश त्यागी कहते हैं कि देखा जाए तो ग़ैर-जाट वोट मुद्दे जैसी कोई चीज़ है नहीं लेकिन ये एक रणनीति के तहत जाट वोट के बरक्स कुछ खड़ा कर ध्रुवीकरण करने के लिए किया गया.
"जैसे हरियाणा की 90 सीटों में से अहीरवाल बेल्ट में तो यादव ही विधायक चुने जाते रहे हैं. 5-6 ऐसी सीट हैं जहाँ गुर्जर विधायक बनते रहे हैं. 17-18 सीटें ऐसी हैं जहाँ जाट विधायक नहीं चुने जाते. तो सारा मामला कुछ 30 सीटों का है जिसको लेकर ये जाट-ग़ैर जाट का मुद्दा बनाया गया है."
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के हरियाणा प्रदेश के अध्यक्ष हैं हवा सिंह सांगवान. उनका कहना है कि कांग्रेस हो या अन्य पार्टियाँ, वे बीजेपी की इस जातिवादी रणनीति से गंभीरता से लड़ नहीं रहे हैं क्योंकि वो भी ऐसा ही चाहते हैं.
"मैं ख़ुद सीआरपीएफ़ में कमांडेंट था. मैंने देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा देखी है. ऐसी हिंसा के बाद लोगों के दिमाग़ पर संप्रदाय हावी हो ही जाता है. 2016 में जो हुआ उसका असर इस बार चुनावों में दिखाई देगा."
"लेकिन मेरा सवाल ये है कि हरियाणा में हरियाणवी बनाम ग़ैर-हरियाणवी का मुद्दा क्यों नहीं उठाया जाता"
2016 की हिंसा को लेकर विवादित रहे थे तत्कालीन बीजेपी नेता और सांसद राजकुमार सैनी. उन्होंने तब जाट समुदाय और कांग्रेस नेताओं पर जमकर हमला बोला था. लेकिन बाद में बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बना ली.
उन्होंने कहा कि 2014 में हम सभी लोगों ने मोदी को पिछड़ा समझ कर प्रधानमंत्री बनाया था. लेकिन जिन लोगों ने आरक्षण आंदोलन में तांडव किया, बीजेपी सरकार ने उन्हें मुआवज़े दिए, नौकरियाँ दीं.
मोदी के बाद उन्होंने फिर से कांग्रेस पर निशाना साधा.
"भाईचारे को हमने नहीं, भूपेन्द्र हुड्डा ने ख़त्म किया. 90 फ़ीसदी आबादी को चारा बना कर रखा था. जाट एकता के नारे दिए जाते थे."
रोहतक से उम्मीदवार और तीन बार सांसद रहे दीपेन्द्र हुड्डा से जब हमने इंटरव्यू में उनकी जाट राजनीति करने पर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि उनकी सरकार हरियाणा में दस साल रही लेकिन कभी जातियों के बीच भाईचारे पर कोई आँच नहीं आई लेकिन बीजेपी की सरकार ने भाईचारे को नुक़सान पहुँचाने का काम किया है.
हरियाणा में जाट-ग़ैर जाट का मुद्दा पहले भी उठा है. जब हरियाणा के बड़े जाट नेता चौधरी छोटूराम के सामने थे पंडित श्रीराम शर्मा. 1962 में उस वक़्त के झज्जर लोकसभा क्षेत्र से पंडित भगवत दयाल शर्मा एक हज़ार वोटों से जीते थे और उस वक़्त जाट-ग़ैर जाट का ध्रुवीकरण चरम पर था.
वरिष्ठ पत्रकार सतीश त्यागी कहते हैं कि उस वक़्त झज्जर में जो ध्रुवीकरण दिखा, वो आज जैसा नंगा प्रदर्शन नहीं था.
"बीजेपी की ये रणनीति अब ग्रामीण इलाक़ों में भी अपनी जगह बना चुकी है. ये हाल ही में जींद उपचुनाव और नगर निगम चुनावों के नतीजे में भी देखने को मिला. इसका असर कितना गहरा हुआ, वो लोकसभा चुनावों के नतीजों से और साफ़ हो जाएगा. धरातल पर नफ़रत दिखाई दे रही है."
हालाँकि गाँवों में लोगों से बातचीत के दौरान जाट समुदाय के लोग कहते हैं कि उनके लिए जाट बनाम ग़ैर जाट कोई मुद्दा नहीं है और गाँवों में भाईचारा अब भी बना हुआ है.
लेकिन रोहतक शहर में कई जगह जाट बनाम ग़ैर जाट की बातें ज़रूर सुनाई पड़ी.
रोहतक के माडल टाउन इलाक़े में दुकान चला रहे पंजाबी समुदाय के एक दुकानदार ने नाम ना उजागर करने की शर्त पर बताया कि 2016 में जाटों की भीड़ ने तमाम दुकानों को आग के हवाले कर हमें उजाड़ने की कोशिश की तो कैसे हम जाट उम्मीदवारों को वोट दे सकते हैं.
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