गोरखपुर: योगी और बीजेपी दोनों के लिए क्यों है अहम?

नई दिल्ली। गोरखपुर हमेशा चर्चित रहा है और उतनी ही चर्चित और महत्वपूर्ण है गोरखपुर की लोकसभा सीट। यहाँ बाबा गोरखनाथ का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है, इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मभूमि और तपोभूमि माना जाता है। यहाँ पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय है और यहाँ सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भारतीय वायुसेना का एयरफोर्स स्टेशन भी है। वैसे तो गोरखपुर कई बाहुबली और माफिया डॉन की रणभूमि भी रहा है लेकिन आज बात सिर्फ यहाँ के राजनीतिक महासंग्राम की। लम्बे समय से गोरखपुर संसदीय क्षेत्र को भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है लेकिन 2018 में इस लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के सहयोग से बीजेपी के इस किले में बड़ा सा सुराख कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी इस सुराख को भरने की कोशिश में है। इस कोशिश में सबसे पहले बीजेपी ने उपचुनाव जीतने वाले रणबांकुरे प्रवीण निषाद को तोड़ लिया। फिर यहाँ से लोकप्रिय फिल्म कलाकार रवि किशन को पार्टी प्रत्याशी बनाया। लेकिन सपा-बसपा गठबंधन बीजेपी के इस दुर्ग को पूरी तरह ध्वस्त करने की पुरजोर कोशिश में है। बीजेपी के दांव को कमजोर करने के लिए सपा-बसपा गठबंधन ने रामभुआल निषाद को मैदान में उतारा है। रामभुआल को सपा में निषाद समुदाय के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कुल मिलाकर यहाँ के राजनीतिक महासंग्राम में मुकाबला जोरदार होने का अनुमान है।

योगी के राजनितिक करियर की दिशा तय करेंगे नतीजे

योगी के राजनितिक करियर की दिशा तय करेंगे नतीजे

बीजेपी के लिए गोरखपुर सीट महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए है। ऐसा माना जा रहा है कि गोरखपुर सीट के साथ ही पूरे उत्तर प्रदेश में बीजेपी का प्रदर्शन, योगी आदित्यनाथ के राजनितिक करियर की दिशा तय करेगा। अगर बीजेपी गोरखपुर जीत लेती है लेकिन प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तो इसका असर योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य पर पड़ेगा। अगर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा लेकिन बीजेपी लगातार दूसरी बार गोरखपुर किला फतह करने में विफल रही तो इसे गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में योगी आदित्यनाथ की कमजोर होती पकड़ के तौर पर लिया जा सकता है। और अगर गोरखपुर हारने के साथ ही बीजेपी उत्तर प्रदेश में भी खराब प्रदर्शन करती है तो पराजय का सारा ठीकरा योगी आदित्यनाथ के सर पर फूटेगा। उस स्थिति में बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व योगी आदित्यनाथ को लेकर कोई बड़ा फैसला भी कर सकता है। कुल मिला कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने अपनी और पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने के लिए एक ही एक ही रास्ता बचा है कि बीजेपी गोरखपुर जीतने के साथ ही प्रदेश में भी संतोषजनक प्रदर्शन करे।

तो क्या मठ की पकड़ ढीली हो रही!

तो क्या मठ की पकड़ ढीली हो रही!

गोरखपुर लोकसभा सीट को पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता है। इसमें गोरखनाथ मठ और हिंदुत्व का बोलबाला रहा। 1952 से लेकर 2014 तक के लोकसभा चुनाव में दस बार मिली जीत में मठ की भूमिका अहम रही है। 1969 में सबसे पहले गोरखनाथ मठ के महंत दिग्विजयनाथ ने निर्दलीय के रूप में यह सीट जीती थी। उन्हें हिन्दू महासभा के एक प्रखर हिन्दू राष्ट्रवादी नेता के रूप में भी जाना जाता जाता है। उसके बाद महंत दिग्विजयनाथ के उत्तराधिकारी महंत अवेद्यनाथ ने भी 1970 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गोरखपुर से जीत हासिल की। महंत अवेद्यनाथ भी हिन्दू महासभा के नेता थे। 1989 का लोकसभा चुनाव उन्होंने हिन्दू महासभा के बैनर पर लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद 91 और 96 का चुनाव उन्होंने बीजेपी के प्रत्याशी के रूप में लड़ा और जीत हासिल की। कुल मिला कर महंत अवेद्यनाथ ने चार बार लोकसभा में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व किया। उनका यह रिकार्ड उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ ने तोडा जिन्होंने 1998 से 2014 तक लगातार पांच बार गोरखपुर संसदीय सीट पर जीत हसिल की।

क्लिक कर पढ़ें, गोरखपुर लोकसभा सीट के चुनावी इतिहास के बारे में सबकुछ

मार्जिन छोटा लेकिन हार का सन्देश बड़ा

मार्जिन छोटा लेकिन हार का सन्देश बड़ा

2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने या सीट छोड़ दी। बस यहीं से मठ की पकड़ गोरखपुर सीट पर ढीली पड़ने लगी और 2018 के लोकसभा उपचुनाव में सपा ने यह सीट बीजेपी से हड़प ली। हालाँकि जीत का मार्जिन 22881 वोट ही था। मार्जिन छोटा लेकिन हार का सन्देश बड़ा था। इसके पहले 1999 में योगी आदित्यनाथ मात्र 7339 वोटों के अंतर से जीते थे और 1998 में 26206 मतों के अन्तर से जीते थे। तब खासबात यह थी दोनों बार योगी को कड़ी टक्कर समाजवादी पार्टी के जमुना प्रसाद निषाद ने दी थी। ध्यान देने की बात है कि 2018 में बीजेपी के किले में छेद निषाद समुदाय के प्रत्याशी ने ही किया। हालांकि बीजेपी ने उस योद्धा को अपने पाले में कर लिया लेकिन अब गठबंधन ने निषाद समुदाय से ही एक नया लड़ाका बीजेपी के अभिनेता प्रत्याशी के सामने खड़ा कर दिया है। गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में सबसे अधिक वोटर निषाद समुदाय के हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहां 19.5 लाख वोटर हैं, जिनमें से सबसे अधिक 3.5 लाख वोटर निषाद जाति के हैं। उसके बाद यादव और दलित की संख्या है। ब्राह्मण मतदाता की संख्या दो लाख के आसपास है।

कांग्रेस गंभीर नहीं

कांग्रेस गंभीर नहीं

गोरखपुर में चुनाव 19 मई यानी सातवें चरण में होना है। 22 अप्रेल से इस सीट के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई लेकिन इसके पहले कांग्रेस ने यहाँ से न तो अपना प्रत्याशी घोषित किया था न ही पार्टी का गोरखपुर में कोई कार्यालय है। इससे लग जाता है कि कांग्रेस इस सीट पर गंभीरता से चुनाव लड़ने के मूड में नहीं है। 1984 के बाद कांग्रेस यहाँ से कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीत सकी है। यहाँ कांग्रेस को अपनी कमजोर स्थिति का आभास है और परोक्ष रूप से कांग्रेस भी चाहती है कि वह नहीं तो गठबंधन के बहाने ही सही, लगातार दूसरी बार बीजेपी और मठ को गोरखपुर में हार का सामना करना पड़े । गोरखपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत पांच विधानसभा सीट आती हैं। कैम्पियरगंज, पिपराईच, गोरखपुर नगरीय, गोरखपुर ग्रामीण, सहजनवा. इन पांचों विधानसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है। यही वजह है कि बीजेपी को लगता है उसका फिल्म अभिनेता से नेता बना प्रत्याशी असली चुनावी संग्राम में जीत हासिल करेगा।

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