तेजस्वी की ढीली कप्तानी से राजद में बिखराव, दोस्ताना संघर्ष के मूड में कांग्रेस
नई दिल्ली। सियासत के दरिया में राजद की कश्ती तूफान में फंस गयी है। पतवार थामने वाला मजबूत मांझी जेल में है। कश्ती डगमगा रही है। मौजूदा खेवनहार कुछ कर नहीं पा रहे हैं। अनुभव की कमी उनकी राह का रोड़ा बन गयी है। अब तक के चुनावी इतिहास में राजद ने कभी इतना बुरा वक्त नहीं देखा। लालू के बिना राजद लाचार दिख रहा है। पूर्व सांसद, विधान पार्षद पार्टी छोड़ रहे हैं। कांग्रेस अब कुछ सीटों पर फ्रैंडली मैच खेलने की तैयारी में है। तेजप्रताप के व्यक्तिगत हमलों से पार्टी के कई बड़े नेता गुस्से में हैं। तेजस्वी सेनापति तो बनाये गये हैं लेकिन वे सैनिकों पर काबू नहीं रख पा रहे। अब तो चुनावी सभाओं में तेजस्वी यादव का विरोध भी होने लगा है। अररिया की सभा में तेजस्वी को काला झंडा दिखाया गया है।

कांग्रेस कुछ सीटों पर फ्रैंडली मैच की तैयारी में
सीट बंटवारे का पुराना दर्द अब कांग्रेस नेताओं के लिए दबाना मुश्किल हो गया है। ऐन चुनाव के समय यह दर्द छलक कर बाहर आ गया है। कांग्रेस के कुछ नेता गठबंधन में ही फ्रैंडली मैच खेलने के लिए माहौल तैयार कर रहे हैं। मधुबनी से पार्टी के पूर्व सांसद रहे शकील अहमद ने तो अपने नाम से नाजिर रशीद भी कटवा ली है। किसी भी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के लिए पहले नाजिर रशीद कटानी पड़ती है। माना जा रहा है कि वो जल्द ही अपना नामांकन दाखिल करेंगे। कांग्रेस की विधायक भावना झा ने भी दोस्ताना संघर्ष का समर्थन किया है। यहां वीआइपी के बद्री प्रसाद पूर्वे महागठबंधन के उम्मीदवार हैं। इसी तरह शिवहर सीट पर कांग्रेस विधायक अमित कुमार टुन्ना ने भी कहा है कि अगर पार्टी मंजूरी दे तो वे शिवहर से फ्रैंडली फाइट के लिए तैयार हैं। एक तो कांग्रेस को 9 सीटें दी गयी ऊपर से उसकी पसंद का भी ख्याल नहीं रखा गया। तेजस्वी यादव कांग्रेस से टकराव को टालने में नाकाम रहे हैं। उनकी अनुभवहीनता अब दिखने लगी है। 2014 के चुनाव में लालू यादव ने कांग्रेस से तालमेल को बनाये रखा था।

हालात को संभाल नहीं पा रहे तेजस्वी
लालू यादव के जेल में रहने से राजद में अराजकता फैल गयी है। पारिवारिक कलह ने पार्टी को कमजोर करना शुरू कर दिया है। तेजप्रताप के मसले को ठीक से नहीं सुलझाया गया। ऐसा नहीं है कि लालू परिवार में पहली बार राजनीतिक अधिकार के लिए लड़ाई हो रही है। इसके पहले परिवार की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए लालू यादव ने मीसा भारती की बात मान ली थी। 2014 में मीसा पाटलिपुत्र सीट पर चुनाव लड़ने की जिद पकड़े बैठीं थीं। लालू ने मीसा भारती के लिए अपने भरोसेमंद सहयोगी रामकृपाल यादव को कुर्बान कर दिया था। इतना ही नहीं 2016 में मीसा भारती फिर राज्यसभा में जाने के लिए अड़ गयीं। लालू ने फिर मीसा भारती की जिद पूरी की और राज्यसभा सांसद बनाया। बड़ों से देख कर ही छोटे सीखते हैं। तेजप्रताप ने भी अपने राजनीतिक अधिकारों की पूर्ति के लिए दो लोकसभा सीटें मांगी थी। लेकिन तेजस्वी ने नहीं दी। लालू और तेजस्वी में यही फर्क है। लालू बात बिगड़ने नहीं देते थे। तेजस्वी हालात संभाल नहीं पा रहे।

राजद में अराजक स्थिति
तेजप्रताप का मसला इतना गंभीर हो चुका है कि पार्टी में खलबली मच गयी है। तेजप्रताप की पार्टी के उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी, विधायक भाई वीरेन्द्र और प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे से बिल्कुल ठन गयी है। तेज प्रताप ने शिवानंद को हेलीकॉप्टर वाले बाबा कहा और प्रोपर्टी खड़ा करने का आरोप भी लगाया है। विधायक भाई वीरेन्द्र तेजस्वी के करीबी हैं। वे भी पाटलिपुत्र सीट पर चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन तेजप्रताप मीसा भारती के पक्ष में मजबूती से खड़े रहे। भाई वीरेन्द्र और तेजप्रताप में झंझट शुरू हो गया। जब भाई वीरेन्द्र ने तेजप्रताप के लालू-राबड़ी मोर्चा का मजाक उड़ाया तो तेज आगबबूला हो गये।

तेज ने राजद विधायक को पहचानने से इंकार किया
हाल ही में जब तेजप्रताप मीसा भारती के चुनाव प्रचार के लिए मनेर गये तो उन्होंने कहा कि ये भाई वीरेन्द्र कौन हैं, मैं नहीं जानता। वीरेन्द्र मनेर से ही विधायक हैं जो पाटलिपुत्र सीट का हिस्सा है। शिवानंद तिवारी, पूर्वे और वीरेन्द्र, तेजप्रताप पर कार्रवाई के लिए माहौल तैयार कर रहे हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि लालू परिवार का कोई व्यक्ति पार्टी में टारगेट बन गया है। लालू यादव होते तो इसकी नौबत नहीं आती। न तेजप्रताप इतना आगे बढ़ते न कोई दूसरा नेता जुबान खोलने की हिम्मत जुटाता। पूर्व सांसद मंगनी लाल मंडल, पूर्व विधान पार्षद रामबदन राय ने चुनाव के दरम्यान ही राजद को छेड़ दिया। तेजस्वी बड़े नेताओं के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं। लालू नाराज नेताओं को समझा कर या हड़का कर मना लेते थे। हेडमास्टर स्कूल में नहीं है तो विद्यार्थी शोरगुल मचा रहे हैं। तेजस्वी यादव पर लालू ने कुछ ज्यादा भरोसा कर लिया था।












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