ओडिसा में फिर चलेगा नवीन पटनायक का जादू: सर्वे

पर पटनायक इस बार निर्विवाद रूप से दोनों ही मतदान जीतने की बात कैसे करते हैं? इसपर विशेषज्ञों की अलग अलग राय है। वरिष्ठ पत्रकार स्वपन दासगुप्ता मानते हैं कि इस बात के बावजूद कि वह मीडिया से और अपने विधायकों से भी अलग थलग रहते हैं, ज़मीनी तौर पर ओडिसा के मुख्य मंत्री द्वारा चलायी गयी योजनाएं कारगर सिद्ध हुई हैं। दूसरी वरिष्ठ पत्रकार सुनंदा के दत्ता का कहना है कि पटनायक अपने प्रसिद्द पिता बीजू पटनायक की तरह ओडिसा के सामंतवादी समाज का नेतृत्व करते हैं और उनको इस बात के लिए पूजा जाता ही कि वह राजनैतिक चूहे बिल्ली वाली दौड़ में शामिल नहीं होते।
नवीन पटनायक को मीडिया बहुत पसंद नहीं करता पर यह अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ करते आये हैं। अपनी साफ छवि के लिए जाने गए पटनायक ने भ्रष्ट नेताओं और वरिष्ठ सहकार्यकर्ताओं जैसे प्यारीमोहन महापात्र को ज़रुरत पड़ने पर पार्टी से निकालने में समय नहीं लिया। इतना ही नहीं 2009 लोक सभा मतदान के पहले एंटी-ईसाई दंगों की वजह से बीजेपी को भी छोड़ दिया और इन सोचे समझे कदमों की वजह से उनकी छवि हमेशा अच्छी बनी रही। उनकी नेतृतव क्षमता तब उभर कर आयी जब पिछले साल ओडिसा में फैलिन नाम का चक्रवात आया। यह उन्हें आने वाले इलेक्शन में वोट मिलने में मदद करेगा।
पर क्या पटनायक की एक नेता के रूप में साफ छवि ही एक कारण है जिससे बीजू जनता दल ने सालों साल से सफलता के परचम लहराये हैं? मानिनी चट्टर्जी जो कि वरिष्ठ पत्रकार हैं कहती हैं कि इसका कारण है कि कांग्रेस पार्टी मुख्य प्रतिरोधी पार्टी है और वह ओडिसा में असमर्थ और कमज़ोर साबित हुई है। हाल ही में बीजेडी ने कोस्टल बेल्ट के अलावा पश्चिमी और और दक्षिणी ज़िलों पर तो कब्ज़ा किया ही साथ ही स्थानीय शहरी समूह पर भी कब्ज़ा कर लिया।
ऐसा माना जा रहा है कि बीजेडी की असेंबली सीटों की संख्या में कांग्रेस और बीजेपी की लागत पर और बढोत्तरी होगी( वर्तमान में इसके पास 130 में से 91 सीटें हैं)।
ओडिसा में विरोधी पार्टी परेशानी में क्यों है?
ऐसा माना जाता है कि बीजेडी भ्रस्ट और गलत तरीके से चुनाव जीत जाती है, फिर भी ना तो कांग्रेस ना ही बीजेपी 14 साल से चले आ रहे पटनायक की इस सरकार को हारने की चाहत रखती है। ऐसा क्यों है?
ओडिसा कांग्रेस नेतृत्व के मुताबिक़ कांग्रेस पार्टी की यह क्षमता नहीं है कि वह बीजेडी सरकार को चुनौती दे सके और कुछ कांग्रेस के नेता अगर एमएलए बनने की चाहत रखते हैं तो उन्हें लगता है कि बीजेडी को चुनना उनके लिए ज़्यादा लाभदायक होगा। वह भले ही कितने भी लोकप्रिय हों, इस समय बीजेडी का ओडिसा में कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
पर क्या कांग्रेस पार्टी पुनर्जागरण के बारे में नहीं सोच सकती? ऐसा होना सम्भव नहीं दिखता। पार्टी के अंदर ही पटनायक और जेना के बीच आपसी मनमुटाव ने कुछ सालों से पार्टी को कमज़ोर बना दिया है, और लगातार हार ने भी इन्हें कुछ नहीं सिखाया है। हाल ही में कांग्रेस की तकदीर बदलने की नियत से जयदेव जेना को ओडिसा में कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। पर अभी हुए नगर सम्बन्धी चुनाव ने साबित कर दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। स्थिति इतनी ख़राब थी कि यूएलबी चुनाव में कई कांग्रेस उम्मीदवार ने बीजेडी के खिलाफ नामांकन भरने से मना कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेडी 50 सीटों से भी ज़यादा से निर्विरोध जीत गयी।
कांग्रेस की इस हालत का ज़िम्मेदार है: ऊपर से आये निर्णय का आरोपण। ओडिसा प्रदेश कांग्रेस समिति में 400 से भी ज्यादा सदस्य हैं पर पर यह कोई फैसला नहीं ले सकती। ऐआईसीसी सारे प्रदेश के फैसले लेती है और असलियत में काफी कम मदद करती है। स्थानीय कांग्रेस स्त्रोतों के अनुसार पार्टी के वरिष्ठ नेता यह चाहते हैं कि बीजेडी उनके साथ गठबंधन कर ले। पर पटनायक का अकेले चलने वाले विचार का साथ देना और यह उनकी ताकत होना इस बात का सबूत है कि कांग्रेस का यह सपना साकार होना मुश्किल है। अब स्थानीय कांग्रेस के सदस्यों के लिए उम्मीद की एक ही किरण है कि अगर केंद्र के नेता यूपीए सरकार के पक्ष में और बीजेडी के खिलाफ एक बड़ी मुहीम चलाये, पर यह कहना भी मुश्किल है कि यह कितना कारगर साबित होगा।
राज्य में बीजेपी की हालत भी उतनी ही खराब है और कई लोग इसका ज़िम्मेदार बीजेपी राज्य पार्टी प्रमुख के.वी. सिंहदेव को मानते हैं। हालांकि, मतदान से पहले के सर्वे से यह सामने आया है कि बीजेपी को इस बार 8 प्रतिशत ज़यादा सीटें मिलने कि उम्मीद है पर यह मुख्य रूप से कांग्रेस की लागत पर होगा।












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