Lok Sabha Chunav 2024: कटिहार, किशनगंज की रेस में आगे कौन, JDU या कांग्रेस?
Bihar Lok Sabha Chunav 2024: बिहार के सीमांचल इलाके में मुस्लिम आबादी कई सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की ताकत रखती है। कटिहार और किशनगंज लोकसभा सीटें उन्हीं चुनाव क्षेत्रों में शामिल हैं। इन दोनों सीटों पर इस बार जेडीयू और कांग्रेस उम्मीदवारों में सीधा मुकाबला है।
2019 में एकमात्र किशनगंज सीट ही थी, जहां कांग्रेस प्रत्याशी ने महागठबंधन की तरफ से जीत दर्ज की थी। राज्य की बाकी 39 सीटें सत्ताधारी एनडीए के खाते में गई थीं। कांग्रेस इस बार किशनगंज के साथ-साथ इंडिया ब्लॉक के लिए कटिहार भी जीतने के लिए जोर लगा रही है।

कटिहार में तारिक अनवर पलट सकेंगे बाजी?
2019 में जेडीयू से दुलाल चंद्र गोस्वामी पहली बार कटिहार से चुनाव जीते थे। उन्होंने कांग्रेसी दिग्गज तारिक अनवर को हराया था, जो 5 बार यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अनवर 2014 में भी यहां जीते थे, लेकिन तब वह एनसीपी उम्मीदवार थे। कांग्रेस से वह 1999 में आखिरी बार जीते थे।
2019 में जेडीयू ने अनवर को 57,000 वोटों से हराया था। 2020 के विधानसभा चुनाव में कटिहार की 6 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस, बीजेपी 2-2 सीटों पर जीती थी और जेडीयू, सीपीआई (एमएल) को 1-1 सीट मिली थी। इस हिसाब से दोनों गठबंधनों के पास बराबर सीटें गई थीं।
कटिहार का जातीय समीकरण
कटिहार में सबसे ज्यादा करीब 40% मुस्लिम मतदाता हैं। ओबीसी वोटरों की जनसंख्या भी लगभग 40% है। इनके अलावा करीब 11% दलित और बाकी सवर्ण जातियों का वोट है।
जेडीयू को भी मुस्लिम वोट मिलने की उम्मीद
कटिहार के बारे में कहा जाता है कि यहां जाति और धर्म दोनों फैक्टर किसी भी समय हवा का रुख बदल सकते हैं। हालांकि, कोई भी पार्टी यहां धार्मिक भावना पर मतदाताओं को गोलबंद करने की कोशिश करती नहीं दिखी है। जेडीयू को भी उम्मीद है कि उसे भी मुस्लिम वोट का कुछ हिस्सा जरूर मिलेगा।
मोदी फैक्टर भी कर रहा है जदयू के पक्ष में काम
दिलचस्प बात ये है कि शनिवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी अपनी जनसभा में सीएए और अयोध्या में राम मंदिर जैसे मुद्दों का जिक्र नहीं किया। अलबत्ता उन्होंने आरजेडी के शासनकाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति की याद दिलाने की कोशिश जरूर की।
जहां तक एनडीए और खासकर भाजपा समर्थकों की बात है तो उनमें जेडीयू प्रत्याशी से नाराजगी जरूर है, लेकिन जब बात पीएम मोदी की आती है तो उनकी नाराजगी दूर हो जाती है।
मसलन, मनिहारी ब्लॉक के नया टोला गांव के सत्येंद्र महतो गोस्वामी से नाखुश हैं। उन्होंने ईटी से कहा है, 'अगर मुझे किसी एक उम्मीदवार को वोट करना पड़े तो मैं नोटा को दूंगा। लेकिन, मैं मोदी को वोट दे रहा हूं।'
इसी तरह सूरजपुर गांव के शंभू चौधरी कहते हैं, 'अमित शाह ने यहां एक रैली की है, उसके बाद बहुत सारे बीजेपी वोटर जो कि गोस्वामी को समर्थन देने के लिए तैयार नहीं थे, उन्होंने उनको वोट देना तय किया है। अगली बार यहां से बीजेपी को लड़ना चाहिए।'
मुसलमानों में कांग्रेस अब भी फेवरेट
लेकिन, बरारी नगर पंचायत के मोहम्मद उस्मान को लगता है कि सिर्फ राहुल गांधी ही देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बचा सकते हैं, इसलिए वह कांग्रेस को वोट करेंगे। वैसे कटिहार में पिछली बार भी नोटा को लोगों ने अपना विकल्प बनाया था और 20,584 मतदाताओं ने इसपर वोट दिया था।
किशनगंज में मुस्लिम मतदाताओं के हाथों में ही बाजी
किशनगंज में कटिहार से सबसे बड़ा फर्क ये है कि यहां 67% आबादी मुस्लिम है। यह कांग्रेस का गढ़ बन चुका है और 2009 से वह यहां से जीत रही है। कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद यहां से दूसरी बार भी अपनी जीत पक्की मान रहे हैं। जेडीयू ने यहां मुजाहिद आलम और एआईएमआईएम ने अख्तरुल इमाम को उतारा है।
किशनगंज सीट को लेकर कांग्रेस के हौसले जरूर बुलंद हैं, लेकिन पिछली बार वह यहां से सिर्फ 34,000 वोटों (33%) से जीती थी। जबकि, जेडीयू को 30% और एआईएमआईएम को 27% वोट मिले थे।
किशनगंज में जेडीयू को एआईएमआईएम से उम्मीद
जेडीयू की उम्मीद एआईएमआईएम के प्रदर्शन पर टिकी है। 1999 के चुनाव में ऐसा हो चुका है, जब आरजेडी और एनसीपी अलग-अलग चुनाव लड़ी थी तो भाजपा के शाहनवाज हुसैन महज 8,600 वोट से जीत गए थे।
विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम का शानदार प्रदर्शन
नीतीश कुमार की पार्टी की उम्मीद को 2020 के विधानसभा चुनावों के परिणाम से हौसला मिल रहा है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी किशनगंज की 6 में से 4 विधानसभा में चुनाव जीत गई थी। हालांकि, बाद में इनमें से 3 विधायक आरजेडी में चले गए थे। (कुल में से 4 गए थे)
ओवैसी में कांग्रेस के प्रति अब दिख रही है नरमी!
ओवैसी भी अपने प्रत्याशी इमाम के पक्ष में यहां पर सभा कर चुके हैं। लेकिन, बायसी के रहने वाले मोहम्मद जबी हसन का कहना है, 'हमने एआईएमआईएम को विधानसभा में वोट दिया और उसके कैंडिडेट को जिताया। लेकिन, वह आरजेडी में चले गए। उन्हें वोट देने का कोई मतलब नहीं है और इससे अच्छा है कि कांग्रेस को वोट दें।'
दूसरी बात ये है कि ओवैसी भी अब कांग्रेस के प्रति सॉफ्ट नजर आने लगे हैं और यह मुद्दा तेलंगाना से लेकर यूपी की राजनीति तक में छाया हुआ है।
जेडीयू ने रणनीति के तहत किया है प्रचार
हालांकि, जहां तक जेडीयू के पक्ष में भाजपा की ओर से प्रचार की बात है तो सिर्फ शाहनवाज हुसैन ही बड़े नेता के तौर पर नजर आए हैं। रणनीति के तहत जेडीयू यहां खुद ही आगे से मोर्चा संभाले हुए है और नीतीश कुमार को ही प्रमुख चेहरे और उनकी सरकार में हुए काम को ही पेश करने की कोशिश की गई है।












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