Lok Sabha Chunav: किरण खेर की जगह चंडीगढ़ में बीजेपी ने स्थानीय चेहरे को क्यों चुना, AAP या कोई और वजह?
Chandigarh Lok Sabha Election 2024: पिछले दो बार से चंडीगढ़ लोकसभा में भाजपा की चेहरा रहीं किरण खेर को इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया है। उनकी जगह चंडीगढ़ के पूर्व बीजेपी अध्यक्ष संजय टंडन को उतारा गया है। किरण खेर एक मुखर वक्ता रही हैं और उनकी पहचान देशव्यापी है। फिर पार्टी ने पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री बलराम दास टंडन के बेटे को टिकट दिया है तो इसकी खास वजहें होंगी।
नगर निगम चुनाव में 'आप' को बढ़त
पिछले कुछ समय में चंडीगढ़ इलाके में भाजपा के मुकाबले आम आदमी पार्टी की पकड़ मजबूत होती नजर आई है। मसलन, दिसंबर 2021 में जो चंडीगढ़ नगर निगम के चुनाव हुए थे, उसमें 'आप' को भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा सीटें मिलीं। 2016 में बीजेपी के 20 पार्षद चुने गए थे, जिनकी संख्या 2021 में घटकर 12 रह गई। वहीं 'आप' के 14 पार्षद चुने गए।

चंडीगढ़ मेयर चुनाव में फजीहत
फरवरी में हुए चंडीगढ़ मेयर चुनाव में पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह की हरकतों की वजह से भाजपा की काफी किरकिरी हुई, जिससे उसकी छवि पर भी असर पड़ा है। मसीह का आम आदमी पार्टी और कांग्रेस पार्षदों के मतों को अमान्य करने वाली हरकत सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो गई थी। इसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव नतीजा ही पलट दिया।
यह विवाद लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ ही समय पहले हुआ था। हो सकता है कि पार्टी लोकसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बदलकर उस नुकसान की भरपाई करना चाह रही हो। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में स्थानीय सांसद भी मतदाता होता है।
'बाहरी' की जगह स्थानीय की मांग
किरण खेर ने लगातार 10 वर्षों तक लोकसभा में चंडीगढ़ का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन बाहरी होने का ठप्पा वह पूरी तरह से दूर नहीं कर पाईं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले महीने ही उन्होंने कहा था कि 'मैंने चंडीगढ़ में रहने और यहां पर काम करने के लिए अपना परिवार और पेशे तक को छोड़ दिया।' लेकिन, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना था कि स्थानीय प्रत्याशी के लिए सोचना चाहिए।
स्थानीय चयन समिति की ओर से केंद्रीय नेतृत्व को जो चार नाम भेजे गए थे, उसमें भी खेर का नाम नहीं था। उनका तर्क था कि इस बार चंडीगढ़ के लोगों को 'स्थानीय' उम्मीदवार की जरूरत है।
चंडीगढ़ लोकसभा में दो चुवावों के परिणाम
अगर पिछले दो चुनावों के आंकड़े देखें तो किरण खेर चंडीगढ़ में भाजपा के लिए प्रभावशाली उम्मीदवार साबित हुई हैं। मसलन, 2014 में इस सीट पर उन्हें 42.20% वोट मिले थे। वहीं उनके मुकाबले में उतरे तब कांग्रेस के दिग्गज पवन कुमार बंसल को 26.84% वोट आए थे। तब पहली बार चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी ने अभिनेत्री गुल पनाग को टिकट दिया था, जिन्हें 23.97% वोट आए थे।
लेकिन, 2019 में खेर की सफलता का ग्राफ और बढ़ गया और उन्हें 50.63% वोट प्राप्त हुए। इस बार आम आदमी पार्टी को चंडीगढ़ के वोटरों ने गहरी चोट दी और उसके उम्मीदवार हरमोहन धवन को महज 3.02% वोट आए। कांग्रेस ने फिर से बंसल पर दांव लगाया था और उन्हें 40.34% वोट आए थे।
संजय टंडन को क्यों मिला बीजेपी से टिकट?
संजय टंडन 2010 से लेकर 2019 तक लगातार और सबसे अधिक समय तक चंडीगढ़ भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। पार्टी ने उन्हीं के कार्यकाल में लगातार दो लोकसभा चुनाव और नगर निगम चुनाव जीते हैं। इसके बाद ही उन्हें हिमाचल प्रदेश में भाजपा का सह-प्रभारी बनाया गया।
टंडन के पिता आजीवन आरएसएस के स्वयं सेवक रहे। उन्हें 1969 से 1970 के बीच पंजाब के उपमुख्यमंत्री और 2014 और 2018 के बीच छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बनने का मौका मिला।
स्थानीय होने की वजह से संजय टंडन की उपलब्धता यहां खेर के मुकाबले ज्यादा रहती है। हालांकि, किरण खेर ने अपने अस्वस्थ रहने की बात करके भी उनके लिए पहले से ही रास्ता तैयार कर रखा था। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि उनके खिलाफ अंदरूनी एंटी-इंकंबेंसी भी हावी थी।
एक सीनियर बीजेपी नेता ने कहा, 'अगर खेर को दूसरा मौका मिला तो सिर्फ मोदी की लहर के चलते। 2019 में जब पीएम मोदी ने यहां रैली की थी तो उन्होंने लोगों से कहा था कि उन्हें वोट दें....उन्होंने खेर का एक बार भी जिक्र नहीं किया।'
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