भारत में लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी अधिकार क्या हैं ? Shraddha Walkar की वजह से हो रही है चर्चा

Live-in relationship in India and legal rights: दिल्ली में श्रद्धा वाकर की हत्या जिस तरह से उसके लिव-इन पार्टनर आफताब पूनावाला ने की है, उससे इस तरह की रिलेशनलशिप पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। श्रद्धा वाकर अपने माता-पिता का घर छोड़ आई थी। लेकिन, खबरों के मुताबिक आफताब उसकी हत्या से पहले भी उसे काफी टॉर्चर कर रहा था। वह चाहती तो उसके पास सारे कानून अधिकार थे। वह अपने पार्टनर के खिलाफ कानून की चौखट तक जा सकती थी। लेकिन, उसने अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया, इसका जवाब देने के लिए वह आज नहीं है। इसलिए भविष्य में किसी श्रद्धा के साथ कोई आफताब इस तरह की बेरहमी ना कर सके, इसके लिए इन कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने की बहुत ज्यादा जरूरत है।

श्रद्धा हत्याकांड की वजह से चर्चा में लिव-इन रिलेशनशिप

श्रद्धा हत्याकांड की वजह से चर्चा में लिव-इन रिलेशनशिप

दिल्ली के मेहरौली इलाके में हुए श्रद्धा वाकर हत्याकांड को लेकर रोज हो रहे खुलासे की वजह से देश में लिव-इन रिलेशनशिप और इससे जुड़े कानूनी अधिकारों के लेकर फिर से बहस छिड़ चुकी है। श्रद्धा वाकर के साथ ना केवल उसके पार्टनर ने बेरहमी की, बल्कि निर्मम हत्या के खुलासे के बाद से समाज का एक तबका भी उसी पर सवाल उठा रहा है। सवाल है कि ऐसे संबंधों को भारत में कानून किस नजरिए से देखता है। देश के युवाओं के एक वर्ग में खासकर बड़े शहरों में लिव-इन रिलेशनशिप का प्रचलन बढ़ा है।

लिव-इन रिलेशनशिप क्या है ?

लिव-इन रिलेशनशिप क्या है ?

अगर सामान्य शब्दों में समझने की कोशिश करें तो इसमें अलग-अलग लिंग के दो व्यस्क लोग बिना वैवाहिक बंधन में बंधे साथ में रहते हैं और एक-दूसरे से रोमांटिक तौर पर और यौन संबंधों के जरिए एकसाथ जीवन बिताते हैं। यह एक ऐसा बंधन है, जिसमें ना तो कोई सामाजिक बंधन होता है और ना ही कोई विशेष कानूनी बंधन। इसलिए जब भी अलग होना हो दोनों बिना किसी औपचारिकता के फिर से अलग रहने या किसी दूसरे संबंधों की शुरुआत करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। लेकिन, इसके बावजूद ऐसे संबंध कानूनी बाध्यताओं से परे नहीं हैं।

देश की अदालतों का नजरिया क्या है ?

देश की अदालतों का नजरिया क्या है ?

लीगल सर्विसेज इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लिव-इन रिलेशनशिप अभी भी सामाजिक रूप से पूरी तरह से स्वीकार्य नहीं है। यही नहीं, किसी कानून के तहत इनपर किसी तरह का मुकदमा भी नहीं चलाया गया है। हालांकि, न्यायपालिका ने कई बार ऐसे संबंधों में दखल दिया है और स्वतंत्रता के अधिकार के तहत लिव-इन पार्टनरों को राहत देने का काम किया है। सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू वी कानियम्मल के मामले में लिव-इन रिलेशनशिप को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत इसे जीने के अधिकार के दायरे में बताया है। एक ब्लॉग साइट iPleaders की एक रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप की अनुमति है और दो व्यस्कों के साथ रहने को गैर-कानूनी नहीं ठहराया जा सकता। इसी नजरिए को दोहराते हुए इंद्रा सरमा बनाम वीकेवी सरमा केस में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप के लिए ऐसी शर्तें रखीं हैं, जिसके अनुसार इसे शादी का दर्जा दिया जा सके। इसी तरह मदन मोहन सिंह बनाम रजनी कांत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर लिव-इन रिलेशनशिप लंबे समय तक रहे तो उसे दोनों के बीच शादी की तरह समझा जाना चाहिए। एक तरह से ऐसा लगता है कि अदालत शादी की तरह इस तरह के दीर्घकालिक संबंधों के पक्ष में लग रहा है (रात गई-बात गई टाइप नहीं)। पिछले दो दशकों में विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों के जरिए यह स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप के मामले में 2005 का कानून लागू होता है।

महिला पार्टनर को मेंटेनेंस पाने का हक

महिला पार्टनर को मेंटेनेंस पाने का हक

क्रिमिनल प्रोसेड्योर कोड की धारा 125 के तहत शादी या शादी के बाहर दोनों स्थिति में महिला पार्टनर को मेंटेनेंस का अधिकार मिलता है। वह घरेलू हिंसा संरक्षणअधिनियम 2005 की धारा 20(3) के तहत भी मेंटेनेंस मांग सकती है। यानि एक महिला अपने लिव-इन पार्टनर के खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा सकती है और आपराधिक या सिविल कानूनों के तहत कानूनी उपचार की गुहार लगा सकती है।

लिव-इन रिलेशनशिप में हुए बच्चे का अधिकार

लिव-इन रिलेशनशिप में हुए बच्चे का अधिकार

जिस तरह से लिव-इन रिलेशनशिप में रही महिला को अपने पुरुष पार्टनर से मेंटेनेंस लेने का अधिकार है, उसी तरह से इस संबंध की वजह से पैदा हुआ संतान भी वैध माने जाते हैं और वह भी अपने जैविक पिता से मेंटेनेंस लेने का हकदार होता है। 2010 से पहले लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा हुए बच्चे कानूनी प्रक्रियाओं के लिए 'नाजायज' माने जाते थे। यदि महिला लिव-इन रिलेशनशिप से निकलकर किसी दूसरे पुरुष से शादी करती है, तो भी पिता के द्वारा बच्चे का मेंटेंनेस जारी रहता है।

संपत्ति में अधिकार

संपत्ति में अधिकार

हालांकि, लिव-इन पार्टनरों को सेंट्रल अडप्शन रिसोर्स अथॉरिटी की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के तहत बच्चे गोद लेने की अनुमति नहीं है। लेकिन, हिंदू विवाह कानून 1955 की धारा 16 में बच्चों के उत्तराधिकार की जो बात , वह इन संबंधों से पैदा बुए बच्चों पर भी लागू है। यह उत्तराधिकार सभी बच्चों को प्राप्त है (चाहे शादी से हो या लिव-इन संबंधों से)। इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुआ बच्चे को पैतृक या खुद खरीदी गई संपत्ति दोनों पर अधिकार प्राप्त है।

जागरूकता की आवश्यकता

जागरूकता की आवश्यकता

यानि भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को कानून खारिज नहीं करता। लेकिन, इस तरह के संबंधों को लेकर जागरूकता का बहुत ही ज्यादा अभाव है। खासकर पीड़ितों के खिलाफ होने वाली हिंसा से उन्हें सुरक्षित बचाने के लिए और उन्हें परिवार को छोड़कर निकलने के मनोवैज्ञानिक दबाव से उबारने के लिए यह बताना जरूरी है कि कानून उनके साथ है। कानून उनके संबंधों को नाजायज नहीं मानता और उन्हें हर तरह से वह कानूनी सहायता मिल सकती है, जो किसी भी शादीशुदा महिला को मिलती है।

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