धारा 377 की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट, सरकार को भेजा नोटिस
नई दिल्ली। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वो धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार और जांच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने LGBT समुदाय के पांच सदस्यों द्वारा दायर एक याचिका पर प्रतिक्रिया मांगने के लिए केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया है कि वे अपने प्राकृतिक यौन वरीयताओं के कारण पुलिसिया डर के साए में रहते हैं। आज मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ,न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट दिसंबर 2013 के फैसले से धारा 377 की वैधता को बरकरार रखा जा रहा है - जो कहता है कि समान लिंग के वयस्कों के बीच संभोग एक अपराध है।

निजता के अधिकार के बाद आई याचिका
गौरतलब है कि अगस्त में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि गोपनीयता का अधिकार मौलिक अधिकार है, इसके बाद LGBTQ समुदाय के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता और वकीलों ने यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए एक मजबूत मामला बनाया।

नई याचिका पर सुनवाई कर रही थी पीठ
पीठ नवतेज सिंह जोहर द्वारा दायर की गई एक नई याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें धारा 377 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। बता दें कि इस धारा में वयस्कों पर मुकदमा चलाने का भी प्रावधान है। जोहर की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातर ने कहा कि दंड संबंधी प्रावधान असंवैधानिक है जो इस तरह का सेक्स कर रहे हैं।

जेल में दो वयस्कों को नहीं डाल सकते
दातार ने कहा कि आप जेल में दो वयस्कों को नहीं डाल सकते हैं जो अप्राकृतिक यौन संबंधों में शामिल हैं। हाल ही में नौ न्यायाधीशों की ओर से राइट टू प्राइवेसी मामले में कहा गया था कि यौन साथी चुनने का अधिकार मौलिक का हिस्सा है। उन्होंने 2009 के उच्च न्यायालय के फैसले को भी एनजीओ 'नाज फाउंडेशन' की याचिका का हवाला दिया जिसमें प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया गया था।












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