विधि आयोग ने राजद्रोह कानून को बताया जरूरी, कुछ अहम संशोधन की कर दी सिफारिशें
राजद्रोह कानून को लेकर विधि आयोग ने सहमति जताई और कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए संविधान में कायम रखना जरूरी है।

भारत के संविधान में राजद्रोह (Sedition Law) की वैधता पर बल देते हुए कहा कि देश में यह कानून औपनिवेशिक युग यानी अंग्रेजी हुकूमत के काल से है। ऐसे में सिर्फ इस तर्क पर इसे हटाया नहीं जा सकता। विधि आयोग ने कानून मंत्रालय को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे हैं। नागरिकों की स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। ऐसे में इस कानून को निरस्त करने का कोई वैध अधिकार हैं।
ये मामला विधि आयोग के समक्ष तब आया जब भारत संघ ने सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन दिया कि वह धारा 124ए की फिर से जांच कर रहा है। अदालत की ओर से इसको लेकर कहा गया कि कोर्ट अपना बहुमूल्य समय इसमें नहीं लगाएगी।
11 मई को पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को धारा 124ए के संबंध में जारी सभी जांचों को निलंबित करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने या फिर कोई भी कठोर कदम उठाने से परहेज करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने ये भी निर्देश दिया कि सभी लंबित जां और अपील पर कार्रवाई स्थगित की जाय। कोर्ट ने ये आदेश एक याचिका पर सुनाई के बाद के दिया था, जिसमें IPC की धारा 124A की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
मामला जब विधि आयोग पहुंचा तो राजद्रोह कानून का वहां समर्थन किया गया। आयोग ने कहा कि "आंतरिक सुरक्षा खतरों" और राज्य के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए को बनाए रखने की आवश्यकता है। वहीं कोर्ट ने कुछ संशोधन पेश करने के निर्देश दिए। विधि आयोग ने कहा कि सजा के प्रावधान को संशोधित किया जाना चाहिए, जिससे हिंसा की प्रवृत्ति को नियंत्रित किया सके।
आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा कि राजद्रोह के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले पुलिस अधिकारी को साक्ष्य का पता लगाने के लिए एक अनिवार्य प्रारंभिक जांच का आदेश दिया जाना चाहिए। इसके अलावा इसको लेकर केंद्र द्वारा मॉडल दिशानिर्देश की व्यवस्था की जा सकती है।












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