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एक बार फिर दिखी भाईचारगी, अब अंबानी के बाद मित्तल ने भाई को बचाया

नई दिल्ली। 10 दिन के भीतर दो बड़ी ख़बर एक जैसी- भाई ने भाई को जेल जाने से बचाया। दोनों मामलों में भैया का आशीर्वाद सामने आया। अग्रज ने अनुज पर अनुकम्पा की। अनुज सिर झुकाकर अनुग्रहित हुआ। मुकेश अम्बानी ने अपने भाई अनिल अम्बानी के लिए 550 करोड़ रुपये चुकाये, तो स्टीलमैन लक्ष्मी मित्तल ने अपने छोटे भाई प्रमोद मित्तल के लिए 1600 करोड़ रुपये ढीले किए। पहले अनिल जेल जाने से बचे, तो अब प्रमोद के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई ठहर गयी। दोनों ही ख़बरें कानों को सुकून पहुंचाने वाली हैं। रिश्ते का सम्मान दिखता है, भाईचारगी दिखती है और लोहे सी सख्ती वाले व्यक्तित्व में लोच नज़र आता है। एक सम्भावना दिखती है कि अब भाई-भाई में तनातनी नहीं रहेगी। एक-दूसरे को 'देख लेने' या 'दिखा देने' का भाव ख़त्म हो जाएगा। एक ही मां से आशीर्वाद लेते वक्त दो भाई एक-दूसरे से न आंखें फेरेंगे, न आंखें तरेरेंगे। गले मिलने की सम्भावना अधिक रहेगी।

अबकी मित्तल ने अपने भाई को बचाया

अबकी मित्तल ने अपने भाई को बचाया

प्रमोद मित्तल अपने भाई लक्ष्मी मित्तल से 24 साल पहले 1994 में अलग हुए थे, तो अम्बानी भाई एक-दूसरे से 2004 में यानी 15 साल पहले अलग हुए थे। प्रमोद मित्तल ग्लोबल स्टील होल्डिंग्स लिमिटेड (GSHL) और ग्लोबल स्टील फिलीपींस इंक (GSPAI) के मालिक हैं जिन पर स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन (STC) का 2210 करोड़ रुपया बकाया है। वहीं आर कॉम के चेयरमैन अनिल अम्बानी को सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार स्वीडिश कम्पनी एरिक्सन को 458.77 करोड़ रुपये चुकाना था अन्यथा तीन महीने के लिए जेल जाना था।

कभी इतनी रकम पत्नी को गिफ्ट करते थे अनिल अम्बानी

कभी इतनी रकम पत्नी को गिफ्ट करते थे अनिल अम्बानी

एक समय मुकेश अम्बानी ने अपनी पत्नी के लिए 5 करोड़ डॉलर का हवाई जहाज खरीदा था, तो अनिल अम्बानी ने अपनी पत्नी टीना अम्बानी को 8 करोड़ डॉलर का समुद्री नाव गिफ्ट किया था। आज की तारीख में उस गिफ्ट का मूल्य करीब 550 करोड़ रुपया होता है। संयोग देखिए कि यह वही रकम है जो आज मुकेश अम्बानी ने अनिल अम्बानी को जेल जाने से बचाने के लिए दिए हैं। बदली हुई परिस्थिति में इसे गिफ्ट नहीं कहा जा सकता। मगर, इसका दर्जा गिफ्ट से कहीं ऊंचा है।

पीछे पड़े हैं बकाएदार

पीछे पड़े हैं बकाएदार

10 साल पहले मुकेश अम्बानी पर 10 हज़ार करोड़ की मानहानि का मुकदमा अनिल अम्बानी ने दायर किया था। वे अपने बड़े भाई को जेल भेजना चाहते थे। वहीं बड़े भाई की फितरत भी छोटे को हर हाल में कारोबारी नुकसान पहुंचाने की हुआ करती थी। 2007 में यानी 12 साल पहले दोनों भाई एशिया के अमीरों में शुमार थे। बड़े भाई के पास 49 अरब डॉलर और छोटे भाई के पास 45 अरब डॉलर की दौलत थी। मगर, 2019 में परिस्थिति बदल चुकी है। मुकेश अम्बानी के पास 53.6 अरब डॉलर तो अनिल अम्बानी के पास महज 2 अरब डॉलर। मगर, अनिल की देनदारी उनकी दौलत पर भारी पड़ रही है। सवाल ये है कि क्या वास्तव में अनिल अम्बानी 550 करोड़ रुपये चुकाने की स्थिति में नहीं थे या फिर प्रमोद मित्तल के पास 1400 करोड़ रुपये नहीं थे? कारोबार में इससे बुरी बात और कुछ नहीं होती कि आप किसी की देनदारी देने से बचें और अदालत को आदेश देना पड़े। अनिल अम्बानी पर बकाया की लम्बी फेहरिस्त है। अगर एक को देने की स्थिति में वे दिखते हैं तो मांगने वालों की लाइन लग जाती है। उन्हें समय चाहिए। समय बदलने तक का समय। यानी ऐसी स्थिति जब बची हुई दो अरब डॉलर की संपत्ति के बीच राफेल जैसे नये-नये अनुबंध वे ले सकें और पूरे कर सकें।

भाई का सहारा नहीं मिलता तो स्थिति होती खराब

भाई का सहारा नहीं मिलता तो स्थिति होती खराब

अब दूसरे बकाएदार अनिल अम्बानी से पैसे मांग रहे हैं। वे कह सकते हैं कि उनके पास पैसे नहीं हैं। जेल जाने से बचने के लिए तो उनके भाई ने उन्हें बचाया है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह ख़बर भी महत्वपूर्ण है कि रिलायंस कम्युनिकेशन्स इंटरप्राइज ने आरकॉम में अपने 12.5 करोड़ शेयर को गिरवी रख दिया है। दोनों कंपनियां अनिल अम्बानी की हैं। अब तक 49.5 करोड शेयर में करीब 9.5 फीसदी शेयर गिरवी रखे जा चुके हैं। यह स्थिति बयां करती है कि अनिल अम्बानी आर्थिक दबाव में हैं। अब अदालतों का रुख भी अनिल अम्बानी के प्रति नयी परिस्थिति के अनुरूप होगा और बकाएदारों का भी। बड़े भाई की मदद का सबसे बड़ा पहलू यही है। यह मदद 550 करोड़ के मूल्य में न देखकर इसे जेल जाने से बचाने और बाकी परेशान करने वाले आर्थिक हालात से राहत दिलाने के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। लक्ष्मी मित्तल ने भी अपने भाई की ऐसी ही दबावों से रक्षा की है। प्रमोद मित्तल हों या अनिल अम्बानी इन्हें अगर भाई का सहारा नहीं मिलता, तो वे इस स्थिति से नहीं उबर सकते थे।

हर ज़रूरतमंद को मिले भाई

हर ज़रूरतमंद को मिले भाई

आर्थिक समस्याएं हल होने के लिए हमेशा सहयोग मांगती है। बगैर सहयोग के आर्थिक समस्याएं हल नहीं होतीं। यह बात माइक्रो इकॉनोमिक से लेकर मैक्रो इकोनोमिक्स में लागू होती हैं। एक देश जब आर्थिक मुसीबत में होता है तो उसे इंटरनेशनल सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। एक कंपनी जब डूबने लगती है तो उसके लिए बेल आउट पैकेज जरूरी हो जाता है। एक परिवार जब आर्थिक मुसीबत में फंसता है तो रिश्तेदार और उनकी मदद सबसे अहम हो जाती है। छोटे भाइयों को आर्थिक मदद की ये दो घटनाएं यही सबक दे रही हैं कि आर्थिक संकट में फंसे व्यक्ति की मदद के लिए आगे आना जरूरी है। जरूरी ये भी कि इस प्रवृत्ति का विस्तार भाई से आगे हो। रिश्तेदारी का दायरा इंसानियत का बने।

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