Ladakh Protest: लद्दाख में केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग, लेह-कारगिल पूरी तरह बंद, क्या है मांग?
Ladakh Protest Shutdown: केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) लद्दाख में एक बार फिर विरोध की आग सुलग उठी है। लद्दाख को विशेष संवैधानिक सुरक्षा देने के वादे पर केंद्र सरकार की ओर से हो रही देरी के खिलाफ लोगों का गुस्सा सड़कों पर आ गया है।
'लेह एपेक्स बॉडी' (LAB) और 'कारगिल डेमोक्रेटिक एलाइंस' (KDA) के आह्वान पर मंगलवार, 23 जून को लेह और कारगिल दोनों ही जिलों में पूर्ण बंद (Complete Shutdown) रहा। इस बंद का असर बुधवार 24 जून को भी दिखा। लद्दाख में आम जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया।

लेह के मुख्य बाजारों में सन्नाटा पसरा रहा, दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान पूरी तरह बंद रहे। इस शांतिपूर्ण बंद के दौरान लेह में भारी संख्या में लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया और केंद्र सरकार से अपना वादा निभाने की मांग की।
क्यों हो रहा है विरोध?
LAB और KDA का कहना है कि 22 मई को लद्दाख के प्रतिनिधियों और केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) की उपसमिति के बीच हुई बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी थी। इनमें लद्दाख के लिए एक विशेष लोकतांत्रिक ढांचे, विधायी (Legislative), कार्यकारी (Executive) और वित्तीय (Financial) अधिकारों के साथ संवैधानिक सुरक्षा देने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। प्रदर्शनकारी यह भी मांग कर रहे हैं कि लद्दाख को अनुच्छेद 371K जैसे विशेष संवैधानिक प्रावधानों के तहत सुरक्षा दी जाए, जैसा नागालैंड, सिक्किम और मिजोरम जैसे राज्यों को प्राप्त है।
लेह एपेक्स बॉडी LAB ने क्या कहा?
लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लारकुक ने कहा कि 22 मई की बैठक के बाद जब उन्हें कार्यवाही का मसौदा मिला तो उसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन ने डॉक्यूमेंट में सुधार की मांग की थी, लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद 19 जून को LAB और KDA की संयुक्त बैठक हुई, जिसमें विरोध प्रदर्शन और बंद का फैसला लिया गया। चेरिंग दोरजे ने कहा कि लद्दाख के लोगों को दिए गए आश्वासनों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए और केंद्र को अपने वादों पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
आसान भाषा में समझिए: केंद्र vs लद्दाख का आखिर क्या है पूरा मामला?
लद्दाख के लोग इस समय केंद्र सरकार से बेहद नाराज हैं। इस नाराजगी और आंदोलन की मुख्य वजहों को हम आसान भाषा में 3 बड़े बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. 2019 का बदलाव और अधूरी उम्मीदें
साल 2019 में जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से 'अनुच्छेद 370' (Article 370) को हटाया था, तब लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके एक नया केंद्र शासित प्रदेश (UT) बना दिया गया था। जम्मू-कश्मीर को विधानसभा (Legislative Assembly) के साथ UT बनाया गया। लेकिन, लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। यानी यहां सीधे तौर पर दिल्ली (केंद्र सरकार) का शासन लागू हो गया। शुरुआत में लद्दाख के लोग खुश थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगा कि उनकी स्थानीय पहचान, जमीन और नौकरियों पर बाहरी लोगों का नियंत्रण हो सकता है।
2. 'छठी अनुसूची' और पूर्ण राज्य की मांग
लद्दाख की लगभग 90% से ज्यादा आबादी जनजातीय (Tribal) है। अपनी अनूठी संस्कृति, ज़मीन और पर्यावरण को बचाने के लिए लद्दाख के लोग दो प्रमुख मांगें कर रहे हैं:
लद्दाख को पूर्ण राज्य (Full Statehood) का दर्जा मिले ताकि उनकी खुद की चुनी हुई सरकार और विधानसभा हो।
लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, जिससे स्थानीय लोगों को अपनी ज़मीन और संस्कृति की रक्षा के लिए कानून बनाने के विशेष अधिकार मिल सकें।
केंद्र सरकार का क्या है रुख ?
इस पूरे विवाद पर नाम न छापने की शर्त पर सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि गृह मंत्रालय लगातार लद्दाख के लोगों और वहां के प्रतिनिधियों के संपर्क में है और बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। गृह मंत्रालय के अधिकारी के मुताबिक-22 मई को हुई उप-समिति की बैठक के नतीजे बहुत सकारात्मक थे और सभी पक्षों ने इसका स्वागत किया था।
केंद्र सरकार लद्दाख के लोगों को संवैधानिक सुरक्षा देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और लद्दाख की जनता की सलाह से जल्द ही ठोस कदम उठाए जाएंगे।" लद्दाख के लोगों का कहना है कि वे अब सिर्फ कोरे आश्वासनों से मानने वाले नहीं हैं। जब तक सरकार लिखित रूप में उनकी मांगों को पूरा करने का रोडमैप नहीं देती, तब तक उनका यह शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रहेगा।













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