#KulbhushanJadhav: कुलभूषण जाधव और सरबजीत, एक ड्रामा और एक मुलाकात की कहानी
नई दिल्ली। पाकिस्तान और भारत सरकार के बीच चली लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार सोमवार को कुलभूषण जाधव से मां और उनकी पत्नी ने पूरे 22 महीनों बाद मुलाकात की। भारत के सामने ऐसा ही एक मामला आज से 26 साल पहले भी आया था, जब सरबजीत अनजाने में सीमा पर पहुंच गया था, जिसके बाद पाकिस्तान सरकार ने उसे 1991 में फैसलाबाद बम धमाकों का गुनहगार बताकर उसे फांसी की सजा सुना दी थी। आइए हम आपको बताते हैं कि इस्लामाबाद में कुलभूषण जाधव और लाहौर में सरबजीत की मुलाकात में कितना फर्क है।

सरबजीत के परिवार वालों ने जेल में जाकर की मुलाकात
1991 में सरबजीत को गिरफ्तार करने के बाद उनके परिवार वालों को 18 साल बाद पहली बार मुलाकात करने का मौका मिला। 2008 में सरबजीत से मिलने के लिए उनकी पत्नी सुखप्रीत कौर, उनकी दो बेटियां स्वप्नदीप और पूनम, उनकी बहन दलबीर कौर और कौर के पति बलदेव सिंह ने लाहौर जेल में जाकर शाम पांच बजे मुलाकात की थी। भारत से लाहौर मिलने पहुंचे परिवार वालों ने जेल के अंदर जाकर सरबजीत से मुलाकात की।

सरबजीत के लिए बहन 18 राखियां ले गई थी
सरबजीत के परिवार वालों ने मुलाकात के दौरान जेलर से आधा घंटा और देने की बात भी कही थी, जिसके बाद जेलर ने विवकानुसार इस मांग को मान भी मान लिया था। उस दौरान सरबजीत की बहन अपने भाई के लिए साथ में 18 राखियां और घर का खाना भी ले गई थी। सरबजीत के साथ उनके परिवार वालों की यह मुलाकात बहुत ही अहम थी, जिसके उन्होंने पाकिस्तान सरकार का शुक्रिया अदा भी किया था। बता दें कि 2013 में जेल में ही सरबजीत की हत्या कर दी गई थी।

जाधव से मुलाकात सिर्फ ड्रामा था
वहीं, कुलभूषण जाधव और उनके परिवार वालों की यह मुलाकात सरबजीत से बिल्कुल भी अलग थी। पाकिस्तान सरकार ने कुलभूषण जाधव और उनकी मां व पत्नी को 22 महीनों बाद मुलाकात करने की इजाजत दी। यह मुलाकात बिल्कुल ही औपचारिक रूप से दिखाई दे रही थी, जिसमें ना तो एक बेटा अपनी मां के पैर छू पाया और ना ही एक पत्नी अपने पति को निहार पाई। जाधव को पाकिस्तान सरकार ने एक कमरे में बंद किया हुआ था, उनके सामने मां व पत्नी बैठी थी और बीच मुलाकात के दौरान एक पारदर्शी शीशा था।












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