Kolkata Doctor Case: आरजी कर की पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग कैसे बन चुका है बंगाल का जन-आंदोलन?
Kolkata Junior Doctors Protest: कोलकाता में 31 साल की जूनियर डॉक्टर की उसी के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ड्यूटी के दौरान भयानक बलात्कार के बाद बेरहमी से हुई हत्या की वारदात को एक महीने होने को है। लेकिन, उसके लिए न्याय की मांग करने वाले जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी बंगाल के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले जूनियर डॉक्टरों का हौसला कोई नहीं तोड़ पा रहा है तो इसके पीछे है आम जनता का मिल रहा समर्थन।
अपनी होनहार साथी और मां-बाप की इकलौती संतान को न्याय दिलाने के लिए ये डॉक्टर दिन-रात एक करके संगर्ष कर रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि क्या आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल की उस ट्रेनी महिला डॉक्टर को कभी न्याय मिल पाएगा? न्याय मिलेगा भी तो इसमें कितना वक्त लगेगा? क्या उसके असली गुनहगार को ही सजा मिलेगी?

कोलकाता में जूनियर डॉक्टरों का प्रदर्शन बन गया है जन-आंदोलन
इन आंदोलनकारियों को इन सवालों का जवाब नहीं मालूम। लेकिन, फिर भी एक नैतिक ताकत है, जिसकी वजह से महिला हों या पुरुष इन जूनियर डॉक्टरों का हौसला टूट नहीं पा रहा है। पूरे पश्चिम बंगाल और खासकर राजधानी कोलकाता में आंदोलन करने वाले इन जूनियर डॉक्टरों को नैतिक ताकत देने वाले कोई और नहीं है।
ये स्थानीय लोग ही हैं, जिन्होंने इनकी साथी को हर हाल में न्याय दिलाने में इनका साथ देने के लिए अपना दिल खोल दिया है। उन्हें हर संभव मदद पहुंचाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों की हर संभव मदद करने में जुटी चुकी है आम जनता
सोमवार और मंगलवार को कोलकाता के बीबी गांगुली मार्ग पर स्थानीय निवासियों, व्यापारियों और तमाम तरह के कारोबारियों ने इस आंदोलन में खुलकर इन आंदोलनकारियों का सहयोग किया। वे अपनी साथी के लिए सड़क पर हैं, तो उनकी परेशानी कम करने के लिए इन स्थानीय लोगों ने हर संभव सहायता उपलब्ध करवानी शुरू कर दी। इन स्थानीय निवासियों के बर्ताव से आरजी कर की घटना के खिलाफ स्थानीय जनता के मूड का भी अंदाजा लगने लगा है।
तबतक शौचालय इस्तेमाल की छूट दी, जबतक पानी खत्म नहीं हुआ
सोमवार को लालबाजार तक जाने के प्रदर्शनकारियों के मार्च को रोके जाने के बाद डॉक्टरों ने अचानक धरने का फैसला लिया था। करीब 1,000 प्रदर्शनकारियों में बड़ी तादाद में महिला जूनियर डॉक्टर भी शामिल थीं। धीरे-धीरे रात आ गई। खासकर महिलाओं के लिए समस्या बढ़नी शुरू हो गई। आसपास कहीं पर कोई सार्वजनिक शौचालय भी नहीं था।
इन युवा डॉक्टरों की तकलीफ एक स्थानीय मुगलई रेस्टोरेंट के मालिक मोहम्मद आमीर बख्तियार बेग से बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने मंगलवार सुबह तक अपनी दुकान खुली रखी, ताकि प्रदर्शनकारी वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकें। बेग ने टीओआई से कहा है, 'हमारे इलाके में महिला प्रदर्शकारियों के लिए एक उचित शौचालय खोज पाना बहुत मुश्किल था। हमने तबतक शौचालय इस्तेमाल करने की छूट दी, जबतक टैंक में से पानी खत्म नहीं हो गया।' लगभग, 550 महिला प्रदर्शनकारियों ने उनके रेस्टोरेंट का शौचालय इस्तेमाल किया।
पूरी रात बिल्डिंग की मेनगेट खोल दी, ताकि प्रदर्शनकारियों को दिक्कत न हो
थोड़ी ही दूर पर एक रिहायशी इमारत थी। इसने पूरी रात इसका मेनगेट खुला रखा ताकि पुरुष प्रदर्शनकारी पूरी रात कॉमन टॉयलेट इस्तेमाल कर सकें। उस इमारत के गेटगीपर गंभीर लाल यादव ने बताया, 'देर रात करीब साढ़े 12 बजे बिल्डिंग के मालिक ने मुझसे कहा कि गेट खोल दो, पैसेज की लाइट जली रहने दो और प्रदर्शनकारियों को टॉयलेट इस्तेमाल करने दो।'
टी स्टॉल वालों और स्थानीय लोगों ने मुफ्त में किया नाश्ते-पानी का प्रबंध
कुछ स्थानीय निवासी और यहां तक कि चाय स्टॉल चलाने वालों ने भी सुबह में आंदोलनकारियों को मुफ्त में नाश्ते और पीने के पानी का इंतजाम कराया। 12 साल से टी स्टॉल चलाने वाले देबू मंडल को इस बात की खुशी हो रही थी कि उन्होंने अपने हाथों से बने सैंडबिच डॉक्टरों को खाते देखा।
स्थानीय महिलाओं ने प्रदर्शनकारियों को हर संभव मदद उपलब्ध करवाने की कोशिश की
स्थानीय लोगों से मिल रही इस तरह की मदद से प्रदर्शनकारी जूनियर डॉक्टरों का उत्साह और बढ़ गया था। यहां तक कि स्थानीय महिलाएं भी महिला डॉक्टरों को सैनिटरी नैपकिन, टॉयलेट वाइप्स, टिशू पेपर और साबुन उपलब्ध करवा रही थीं।
एक डेकोरेटर ने सड़क को ही तिरपाल से कवर करवा दिया
सियालदह के एक डेकोरेटर देबजीत बनर्जी ने सड़क के एक बड़े हिस्से को तिरपाल से कवर करवा दिया, ताकि धूप और बारिश से आंदोलनकारियों को राहत मिल जाए। इसी तरह से पूरे दिन खासकर के महिलाएं इन प्रदर्शनकारियों को खाने और स्नैक्स के पैकेट उपलब्ध करवाने में जुटी रहीं।
यह जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन नहीं, बल्कि जन-आंदोलन बन चुका है
यही वजह है कि अब यह आंदोलन सिर्फ अपने साथी को न्याय दिलाने के लिए चंद हजार जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन नहीं रह गया है। बंगाल में यह एक जन-आंदोलन का शक्ल अख्तियार कर चुका है। बिजॉयगढ़ के थियेटर कलाकार बिदिशा चक्रबर्ती के मुताबिक, 'यह सिर्फ डॉक्टरों के आंदोलन या उनकी मांगों को पूरी करने का मुद्दा नहीं रह गया है। यह हमारी भी लड़ाई है।'












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