जानिए, पहले लोकसभा चुनाव से अबतक कैसे बदल गया प्रचार का अंदाज

नई दिल्ली- देश में पहला लोकसभा चुनाव 1951-1952 में हुआ। तब से लेकर अबतक इसमें बहुत बदलाव आ चुका है। चुनाव प्रचार करने के तरीकों और उसमें लगने वाले नारे भी काफी बदल चुके हैं। तब देश में साक्षरता कम थी और नेता जो भी भाषण देते थे, वह आम तौर अपने मन से बोल देते थे। चुनावी रैलियों में उनके सामने स्क्रिप्ट कम ही होते थे। इसलिए कई बार उनकी जुबान से जो निकलता था, वही पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए नारा बन जाता था। लेकिन, अब जनता ज्यादा पढ़ी-लिखी और साक्षर है, तो नेताओं के भाषण लिखने वाले स्मार्ट लोग भी मैदान में उतर चुके हैं। एक-एक लाइन, एक-एक स्लोगन काफी सोच-समझकर और विचार-विमर्श करके तैयार की जा रही है। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि कैसे देश बदलता रहा, चुनाव के रंग बदलते रहे और नारों का अंदाज भी कैसे बदलता गया।

पहले ही चुनाव से सांप्रदायिकदा बना मुद्दा

पहले ही चुनाव से सांप्रदायिकदा बना मुद्दा

भारतीय जनता पार्टी आज भी अपनी चुनावी रैलियों में कांग्रेस पर प्रहार करने के लिए पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ती। देश के पहले आम चुनाव में बीजेपी नहीं थी। लेकिन, उसकी जगह जनसंघ मौजूद था। बीजेपी से पहले जनसंघ भी नेहरू की नीतियों की उतनी ही मुखालफत करता था, जैसा आज भाजपा करती है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक पहले ही आम चुनाव में उसने नेहरू सरकार के खिलाफ नारा दिया था, "वाह रे नेहरू तेरी मौज, घर में हमला बाहर फौज।" दरअसल, इसके बहाने नेहरू की रक्षा नीति के विरोधाभास को दिखाने की कोशिश थी। मसलन,अपनी सीमाएं असुरक्षित हैं और भारतीय सेना को विदेश भेजा जा रहा है।

तब जनसंघ के नारे की काट में कांग्रेस नेसांप्रदायिकता और स्थायित्व का स्लोगन तैयार किया था। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक तब कांग्रेस के पोस्टर पर यह नारा लिखा गया था- "स्थायी, असांप्रदायिक प्रगतिशील राष्ट्र के लिए।" जाहिर है कि इस नारे के जरिए जनसंघ की नीतियों पर पलटवार की कोशिश थी। अखबार के मुताबिक 1951 में कानपुर में नेहरू का एक भाषण सुनने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि उन्होंने स्पीच के दौरान कह दिया कि 'नया भारत बनाएंगे और सांप्रदायिकता को जड़ से उखाड़ फेकेंगे।' अगले दिन से वही नारा हर कांग्रेस कार्यकर्ता की जुबान पर छाया हुआ था। यानि, वह नारा खुद नेहरू ने दिया था और वही पार्टी के प्रचार का हथियार बन गया। शायद 1950 के दशक में देश की महज 18% साक्षरता का ही यह प्रभाव था कि मतदाताओं पर लिखे हुए नारों का कम और नेताओं के मुंह से निकले शब्दों का ज्यादा असर होता था।

दूसरे आम चुनाव से उछला गरीबी का मुद्दा

दूसरे आम चुनाव से उछला गरीबी का मुद्दा

पहले आम चुनाव के नारों में भले ही गरीबी को प्रमुखता से जगह नहीं मिली हो, लेकिन दूसरे आम चुनाव, यानि 1957 आते-आते इसने अपना वो स्थान पा लिया, जो आजतक हर चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा रहता है। तब जवाहर लाल नेहरू ने मेरठ की एक सभा में देश की गरीबी और पिछड़ेपन का जिक्र करते हुए कहा था- "हमें छलांग मारनी है।" हकीकत यह है कि आरबीआई के आंकड़ों के हिसाब से 1973-74 तक भी देश की 55% आबादी गरीबी रेखा के नीचे ही रह रही थी। यानि, लगता है कि नेहरू ने जो गरीबी से निकलकर देश के पिछड़ेपन को दूर करने की बात कही थी, उसमें 1973-74 तक ज्यादा बदलाव नहीं आया था। इसी का परिणाम हुआ कि उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनावों के दौरान अपना बहुर्चित 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया। हालांकि, उस चुनाव में कांग्रेस ने करीब 36 नारे इस्तेमाल किए थे, लेकिन गरीबी हटाओ वाले नारे ने इतनी सुर्खियां बटोरीं, जिसका जिक्र 2019 तक किया जाता है। तब इंदिरा ने कहा था- 'वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, इंदिरा कहती है गरीबी हटाओ।' उसी चुनाव से कांग्रेस ने अपने नारों में समाजवाद को भी उठाना शुरू कर दिया। यह नारा था- 'समाजवाद को वोट दें,कांग्रेस को वोट दें।'

इमरजेंसी के बाद कैसे बदलते गए नारे

इमरजेंसी के बाद कैसे बदलते गए नारे

इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में विपक्ष ने 'गरीबी हटाओ' वाले कांग्रेस के नारे को ही हथियार बनाकर यह नारा दिया- 'इंदिरा हटाओ, देश बचाओ।' बाद में आंतरिक कलह के कारण जब जनता सरकार गिर गई, तो 1980 के चुनाव में कांग्रेस ने समय और परिस्थितियों के अनुसार नया नारा तैयार किया- 'सरकार वो चुनें, जो चल सके'।

लेकिन, 1989 आते-आते देश को एक और गठबंधन की राजनीति झेलने को मजबूर होना पड़ा। इसके चलते 1991 में हुए चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने फिर से स्थायित्व को अपना हथियार बनाने की कोशिश की। उस चुनाव में कांग्रेस का नारा था- 'स्थायित्व को वोट दें, कांग्रेस को वोट दें'। यह चुनाव मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद हो रहा था। देश ने उसके कारण पैदा हुई हालात को झेला था। इसलिए कांग्रेस के नारे पर उन परिस्थितियों का भी असर पड़ा। कांग्रेस का एक नारा था- 'ना जात पर, ना पात पर, स्थिरता की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर'। उस दौरान बीजेपी ने नारा दिया था- 'सबको परखा, हमको परखो'। उसका दूसरा नारा था- 'राम, रोटी और स्थिरता'। यह राम मंदिर आंदोलन का असर था।

1998 आते-आते बीजेपी के स्लोगन ने सबको पीछे छोड़ते हुए नई धार पकड़ ली। नारा दिया- 'अबकी बारी, अटल बिहारी'। एक और नारा जो इस दौरान काफी चर्चित हुआ था, वह है- 'राज तिलक की करो तैयारी, आर रहे हैं अटल बिहारी'।

2014 से 2019 तक

2014 से 2019 तक

यूपीए के दस साल के शासन के बाद 2014 में नरेंद्र मोदी के लिए बीजेपी का जो चुनाव अभियान चला, उसने नारेबाजी में सबको पीछे छोड़ दिया। 2014 में बीजेपी का नारा था- 'मोदी जी आएंगे, अच्छे दिन लाएंगे'। इस नारे की मुखालफत में विपक्ष पूरे 5 साल तक मुहिम चलाता रहा है। 2014 में बीजेपी का एक और चर्चित नारा था- "अबकी बार मोदी सरकार'। बीजेपी ने उस लाइन को 2019 में फिर आगे बढ़ाया है। इसबार का नारा है- 'फिर एकबार, मोदी सरकार'। यही नहीं इसबार बीजेपी के चुनावी नारों की तरकश में 'मोदी है तो मुमकिन है', जैसे नारे भी शामिल हो गए हैं। एक और नए नारे को भी बहुत तेजी से फैलाने की कोशिश शुरू है- 'मैं भी चौकीदार'। यह कांग्रेस के 'चौकीदार चोर है' कैंपेन के जवाब में तैयार किया गया है।

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