जानिए, उत्तर प्रदेश में वो कौन सी 47 लोकसभा सीटें हैं, जिनसे तय होगा बीजेपी का भविष्य?
नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन बीजेपी की केंद्र में फिर से वापसी का सबसे बड़ा रोड़ा है, ये बात किसी से छिपी नहीं है। क्योंकि, यूपी और बिहार की राजनीति आज भी पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर टिकी हैं और उसमें महागठबंधन सत्ताधारी बीजेपी से कई गुना ज्यादा मजबूत नजर आता है। सी-वोटर (C-Voter)के मुताबिक मौजूदा परिस्थितियों में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 47 सीटों पर जातीय समीकरणों के हिसाब से महागठबंधन की जीत पहले से ही तय लगती है। ये वो सीटें हैं, जिसपर मुस्लिम-यादव-दलित (MYD)मतदाताओं का दबदबा है।

मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD)का समीकरण
सी-वोटर (C-Voter)के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD)की जनसंख्या 40 फीसदी से ज्यादा है। 1980 के दशक के आखिरी वर्षों से अगर हम उत्तर भारतीय राज्यों, खासकर यूपी और बिहार के चुनावी पैटर्न पर गौर करें, तो उन सब में मुस्लिम-यादव और दलित (MYD)समीकरण के आधार पर ही परिणाम तय होते आए हैं। आज यूपी में 24 साल बाद अगर मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव और बीएसपी सुप्रीमो मायावती एक चुनावी छतरी के नीचे आए हैं, तो उसका कारण सिर्फ और सिर्फ जातीय गणित ही है। अगर हम 2011 की जनगणना पर नजर डालें तो यूपी में मुस्लिमों की आबादी करीब 19 प्रतिशत और दलितों की लगभग 21 प्रतिशत है। जबकि, जानकारों की राय में राज्य में यादवों की जनसंख्या करीब 9 से 10 प्रतिशत बनती है। इसका मतलब ये हुआ कितीनों की आबादी को मिला दें तो यह जनसंख्या पूरे राज्य की जनसंख्या के करीब-करीब आधी बैठती है।

मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD) की दबदबे वाली 47 सीटें
बीएसपी का दावा है कि उसका जनाधार दलितों में है, जबकि समाजवादी पार्टी यादवों और मुस्लिमों पर प्रभाव रखने के हिसाब से अपनी रणनीतियां तय करती है। यह दबदबा दो दशकों से लगातार बना हुआ है, जिसकी जुगलबंदी ने इसबार नरेंद्र मोदी और बीजेपी का सियासी संकट गहरा दिया है। सी-वोटर (C-Voter) के मुताबिक राज्य की 10 लोकसभा सीटों पर मुस्लिम-यादव और दलितों की जनसंख्या 60% से भी ज्यादा है। ये सीटें हैं- आजमगढ़,घोसी,डुमरियागंज,फिरोजाबाद,जौनपुर,अंबेडकर नगर,भदोही,बिजनौर,मोहनलालगंज और सीतापुर। आजमगढ़ में इस समीकरण की कुल आबादी करीब 68.3% है और पिछली बार मुलायम सिंह यादव ने यहां से 35.43% वोट पाकर जीत दर्ज की थी। 2014 में इस सीट पर बीएसपी के उम्मीदवार शाह आलम तीसरे नंबर पर रहे थे और उन्हें भी 27.75% वोट मिले थे। अगर इन दोनों का वोट शेयर जोड़ दें तो यह आंकड़ा 63.18% हो जाता है।
इसके अलावा 37 सीटें वो हैं जहां मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD)की जनसंख्या 50 से 60% के बीच है। रायबरेली,अमेठी और मैनपुरी की सीटें भी इसी श्रेणी की हैं, जहां से क्रमश: सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मुलायम सिंह यादव प्रत्याशी हैं। गौरतलब है कि मुलायम सिंह महागठबंधन के उम्मीदवार हैं और सोनिया एवं राहुल गांधी के खिलाफ एसपी और बीएसपी कभी उम्मीदवार नहीं उतारते हैं। मैनपुरी में इन मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD)की जनसंख्या 57.2% है।

बाकी 33 सीटों पर भी 40-50% मुस्लिम-यादव-दलित (MYD)
यूपी में महागठबंधन की दबदबे वाली जिन 47 सीटों की ऊपर बात की है, उनके अलावा बाकी की 33 सीटों पर भी मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD)की अच्छी-खासी जनसंख्या (यानी 40-50%) मौजूद है। इन सीटों में प्रधानमंत्री मोदी की वाराणसी सीट भी शामिल है।
अगर 2014 की मोदी की लहर की बात करें तो उस चुनाव में भले ही बीएसपी को एक भी सीट न मिली हो और एसपी में सिर्फ मुलायम का परिवार 5 सीटें जीतने में सफल हो पाया हो, लेकिन तब भी मायावती की पार्टी को 20% और अखिलेश की पार्टी को 22.5% वोट मिले थे। वह चुनाव भले ही मोदी लहर के नाम से जाना गया हो, लेकिन उसमें भी राज्य की 41 लोकसभा सीटों पर बीएसपी-एसपी का साझा वोट शेयर एनडीए से ज्यादा था। इनमें जहां पर मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD)की जनसंख्या 50 से 60% है, वहां एसपी-बीएसपी का साझा वोट शेयर 21 सीटों पर और एनडीए का 14 सीटों पर अधिक था। लेकिन, जिन 33 सीटों पर मुस्लिम-यादव और दलितों (MYD) की जनसंख्या 40 से 50% के बीच है, वहां एनडीए का वोट शेयर 23 सीटों पर ज्यादा था, जबकि एसपी-बीएसपी का साझा वोट शेयर सिर्फ 10 सीटों पर ही अधिक रहा था।
इस आधार पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि यूपी में जातीय समीकरणों के हिसाब से फिलहाल महागठबंधन बीजेपी पर बहुत भारी पड़ता दिख रहा है।
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