Khalistan Movement: ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, सिख दंगा, खूनी है खालिस्तान आंदोलन का इतिहास
Khalistan Movement: खालिस्तान शब्द एक बार फिर से चर्चा में है। खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। आइए डालते हैं इस पूरे आंदोलन के खूनी इतिहास पर एक नजर।

Khalistan Movement Explained: देश में एक बार फिर से खालिस्तान आंदोलन की खबरें सामने आने लगी हैं। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह की घटनाएं सामने आई हैं उसने एक बार फिर से 1980 के दशक की याद दिला दी है, जब खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया था।

क्यों है फिर से चर्चा में
दीप सिद्धू किसान आंदोलन के समय चर्चा में आया था, उस वक्त तिरेंगे के अपमान की वजह से वह चर्चा में आया था। लेकिन एक सड़क हादसे में दीप की मौत हो गई। दीप ने वारिस पंजाब दे नाम के सामाजिक संगठन की शुरुआत की थी। दीप की मौत के बाद अमृतपाल सिंह ने इस संगठन की कमान संभाल ली थी।

अजनाला की घटना के बाद सुर्खियों में अमृतपाल
ध्यान देने वाली बात है कि अमृतपाल सिंह को कुछ महीने पहले कोई नहीं जानता था। लेकिन जिस तरह से पंजाब के अजनाला पुलिस स्टेशन की घटना सामने आई उसके बाद एकदम से अमृतपाल सिंह सुर्खियों में आ गया। अजनाला में अमृतपाल सिंह अपने समर्थकों के साथ हथियार लेकर पुलिस स्टेशन अपने साथी को छुड़ाने के लिए पहुंचा था।

हथियार लेकर पहुंचे थे पुलिस स्टेशन
अमृतपाल सिंह और उसके सैकड़ों समर्थक थाने पर हथियार लेकर पहुंचता है और कहते हैं कि पुलिस ने उसके साथी लवप्रीत सिंह उर्फ तूफान को गलत तरह से गिरफ्तार किया है। अहम बात यह है कि जब अमृतपाल सिंह और उसके समर्थक यहां पहुंचे थे तो वह अपने साथ पवित्र पुस्तक गुरुग्रंथ साहिब को लेकर पहुंचे थे।

अमित शाह को दी थी धमकी
अमृतपाल सिंह के साथ पुलिस ने समझौता करने की कोशिश की और उसे भरोसा दिया कि लवप्रीत सिंह को रिहा कर दिया जाएगा। इस घटना के बाद अमृतपाल सिंह ने खुलकर कहा था कि गृहमंत्री अमित शाह का भी वही हाल होगा जो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का हुआ था।
खालिस्तान आंदोलन का जन्म
अक्सर लोगों को लगता है कि इस आंदोलन की शुरुआत 1980 में हुई थी। लेकिन इस आंदोलन के बीच अंग्रेजों ने बोए थे। अंग्रेजों ने ना सिर्फ हिंदू मुस्लिम बल्कि सिखों के बीच भी दरार डालने की कोशिश की थी। हिंदूओं से सिखों को दूर करने के लिए अंग्रेजों ने इसके बीच बोए थे।
1857 से डर गए थे अंग्रेज
1857 में जिस तरह से भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों को तकरीबन देश से बाहर करने में सफलता हासिल की थी, उसके बाद अंग्रेजों ने इस बंटवारे की नींव डालनी शुरू कर दी। अंग्रेजों ने भारतीयों को भाषा, धर्म, जाति के आधार पर अलग करने की शुरुआत की ताकि वह कभी उनके खिलाफ एकजुट ना हों।
1971 में पहली बार खालिस्तान शब्द का इस्तेमाल
देश को आजादी मिलने के बाद पंजाब 1966 में तीन हिस्सों हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में बंट गया। 1971 में पश्चिम पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान बंट गए और बांग्लादेश का गठन हुआ। 1971 में पहली बार खालिस्तान शब्द का इस्तेमाल न्यूयॉर्क टाइम्स के एक विज्ञापन में किया गया था। कहा जाता है कि इसे पाकिस्तान की आईएसआई ने ही छपवाया था।
पाकिस्तान क्यों चाहता है खालिस्तान
रिपोर्ट की मानें तो पाकिस्तान भारत से इस बात का बदला लेना चाहता है कि उसने पाकिस्तान के दो टुकड़े किए। लिहाजा पाकिस्तान भी भारत के दो टुकड़े करना चाहता है। पाकिस्तान को यह भी लगता है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान को जोड़ने का काम पंजाब करता है, ऐसे में अगर पंजाब भारत से अलग होता है तो उसे खालिस्तान के साथ बात करने में आसानी होगी।
भिंडरावाले का उदय
अकाली दल ने 1967 में जम्मू कश्मीर की तरह पंजाब को भी अनुच्छेद 370 की तरह विशेष अधिकार दिए जाने की मांग की। 1973 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को पास किया गया। इसी दौरान जरनैल सिंह भिंडरावाले नाम का नेता सामने आया। उसने युवाओं को कट्टरता की ओर ढकेलना शुरू किया और धर्म युद्ध मोर्चा की शुरुआत की।

खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का जन्म
भिंडरवाला ने खालिस्तान लिबरेशन फोर्स की शुरुआत की। जोकि हत्या, अपहरध, किडनैपिंग, बम धमाका जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगा। कई सिख इसका विरोध करते थे। 1980 में इस आंदोलन ने तकरीबन 22000 लोगों की जान ले ली। जिसमे 12000 आम नागरिक भी शामिल थे।
ऑपरेशन ब्लू स्टार, सिख दंगा
जरनैल सिंह भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर को जबरदस्ती अपना बेस बना लिया था और यहां पर हथियार आदि को छिपाया था। जिसके बाद इंदिरा गांधी ने 6 जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत की थी, जिसमे जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत हो गई।

इंदिरा गांधी की हत्या
रिपोर्ट के अनुसार इसमे तकरीबन 3000 निर्दोष सिखों की मौत हो गई थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के कुछ महीनों के बाद इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी और देश में सिख दंगे भड़क गए थे। माना जाता है कि इस दंगे में तकरीबन 8000 लोगों की जान चली गई थी।

देश के बाहर खालिस्तान आंदोलन
सिख दंगों के बाद कई सिख देश छोड़कर चले गए और अलग-अलग देशों में बस गए। खालिस्तान समर्थक इन लोगों को भारत के खिलाफ भड़काते हैं और उन्हें खालिस्तान के समर्थन में आने के लिए प्रेरित करते हैं। भिंडरावाले की मौत के बाद एक बार फिर से खालिस्तान आंदोलन की चर्चा तेज हो गई। हाल ही में यूके में भारतीय दूतावास पर खालिस्तानी झंडा फहराया गया था।













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