Khagaria Lok Sabha: सांसद महबूब अली का तीसरी बार MP बनने का सपना हो सकता है चूर, समझिए गणित
Khagaria Lok Sabha Ground Report: लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनज़र राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी मंथन शुरू कर दिया है। मतदाताओं को लुभाने के लिए विभिन्न दल अपनी रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। इसी क्रम में वन इंडिया हिंदी की टीम ग्राउंड रिपोर्ट लेने खगड़िया लोकसभा क्षेत्र पहुंची। वहां की जनता से विभिन्न मुद्दों पर बात की।
खगड़िया लोकसभा में जो नए समीकरण बन रहे हैं, उससे एक नया रिज़ल्ट आने की उम्मीद है। इस समीकरण को खुद महबूब अली कैसर ने रास्ता दिया है। सूत्रों की मानें तो हाल ही में उन्होंने नीतीश कुमार से मुलाक़ात कर जदयू की तरफ़ कदम बढ़ा दिया है।

दो बार के लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन की तरफ़ से लोजपा की टिकट पर महबूब अली कैसर लगातार दो बार सांसद बन चुके हैं। आइए समझते हैं पूरा गणित क्या है? सबसे पहले देखते हैं पिछला इतिहास, महबूब अली कैसर साल 2009 में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़े थे।
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जदयू उम्मीदवार दिनेश चंद्र यादव ने उन्हें भारी मतों के अंतर हरा दिया था। साल 2014 में कांग्रेस ने महबूब अली कैसर को टिकट नहीं दिया। इससे नाराज़ होकर महबूब अली कैसर ने लोजपा की सदस्यता ले ली। उस दौरान राजनीति के मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले रामविलास की पार्टी लोजपा एनडीए का हिस्सा थी।

2014 के चुनाव में महबूब अली कैसर ने लोजपा की टिकट से चुनाव लड़ा। रामविलास के समर्थकों के साथ-साथ उन्हें मोदी समर्थकों का भी फ़ायदा मिला और वह चुनाव जीत गए। 2019 के चुनाव में नीतीश की पार्टी जदयू का गठबंधन एनडीए से हुआ। एनडीए गठबंधन के तहत खगड़िया सीट लोजपा के खाते में गई।
महबूब अली कैसर को दूसरी बार रामविलास और मोदी समर्थकों के अलावा जदयू (नीतीश) समर्थकों का भी साथ मिला। इस समीकरण के साथ महबूब अली कैसर दूसरी बार खगड़िया सांसद चुने गए। लेकिन इस बार के समीकरण अलग हैं। उस समीकरण को समझने से पहले यह भी देखना ज़रूरी है।
2019 के लोकसभा चुनाव में कोई बड़ी पार्टी नहीं होने के बावजूद पहली बार मुकेश सहनी (विकासशील इंसान पार्टी) से चुनावी मैदान में उतरे और अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि वह जीत नहीं पाए, बिहार में कहीं न कही जातिवाद सियासी फ़ैक्टर होता है। मुकेश सहनी की मज़बूती निषाद समुदाय के मतदाता माने जा रहे हैं।
आज की तारीख में इन समीकरणों को देखें तो सूत्रों के हवाले से खबर है कि महबूब अली कैसर लोजपा की बजाए जदयू (इंडिया गठबंधन) से चुनावी ताल ठोक सकते हैं। ऐसी स्थिति में महबूब अली कैसर को एनडीए के समर्थकों (मोदी और लोजपा) का साथ नहीं मिलेगा।
ऐसी स्थिति में अब दूसरा आंकड़ा समझते हैं, लोकसभा चुनाव को बिहार में बेहद चुनौती के रूप में ले रही एनडीए की प्रमुख दल बीजेपी अपनी हर चाल चलने वाली है। जिसमें उनके पास पुराने प्रत्याशी दिनेश चंद्र यादव (2009 में जदयू से खगड़िया में दर्ज की थी जीत) हो सकते हैं। इसके पीछे की वजह बताई जा रही है कि इंडिया गठबंधन की वजह से दिनेश चंद्र यादव का क्षेत्र बदला जा सकता है। क्षेत्र बदलने की वजह से वह जदयू का दामन छोड़ एनडीए के उम्मीदवार बन सकते हैं।
दिनेश चंद्र यादव और महबूब अली कैसर का शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। ऐसे में महबूब अली कैसर अगर जदयू से चुनावी ताल ठोकने जाते हैं तो, दिनेश चंद्र यादव पीछे हटने वाले नहीं है। वह भी उनके खिलाफ एनडीए से चुनावी ताल ठोक सकते हैं। क्योंकि दिनेश यादव पहले भी खगड़िया से महबूब अली को सियासी मात दे चुके हैं।
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष सहनी भी खगड़िया से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। वन इंडिया हिंदी से बात करते हुए संतोष सहनी ने कहा कि किसी न किसी गठबंधन से चुनाव लड़ने की तैयारी है। अगर भाजपा हमारी शर्तों को मान लेती है तो उसके साथ गठबंधन में चुनावी ताल ठोक सकते हैं।
अब अगर इन समीकरणों को देखें तो एनडीए की तरफ़ से चुनावी मैदान में उतरने के लिए दो प्रबल दावेदार (दिनेश यादव और संतोष सहनी) खगड़िया से तैयार है। अब अगर वीआईपी का एनडीए से गठबंधन हो जाता है तो दोनों में से कोई एक चुनावी ताल ठोकेगा और उन्हें एक दूसरे का समर्थन मिलेगा।
इस समीकरण के तहत इंडिया गठबंधन की तरफ़ महबूब अली कैसर के बढ़ाए क़दम, उनके तीसरी बार सांसद बनने का सपना चूर कर सकता है, क्योंकि नए समीकरण के तहत एनडीए उम्मीदवार को पासवान, यादव, निषाद समुदाय के साथ-साथ पीएम मोदी के चेहरे पर वोट मिलने की उम्मीद है। महबूब अली का इंडिया गठबंधन की तरफ़ बढाये क़दम, संसद में क़दम रखने से रोक सकता है।












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