Kerala local body election:600 सीटिंग सीटें हार गई BJP,सबरीमाला इलाके में कैसा रहा प्रदर्शन ?

नई दिल्ली- हैदराबाद के स्थानीय निकाय चुनाव से उत्साहित भाजपा के लिए केरल का चुनाव परिणाम न तो उसे खुलकर हंसने दे रहा होगा और ना ही कांग्रेस की तरह भविष्य का सपना टूटने जैसी स्थिति बनी है। अगर 2015 के निकाय चुनाव से तुलना करेंगे तो पार्टी का प्रदर्शन काफी सुधरा है। वह राजधानी तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर काबिज होने का सपना देख रही थी, लेकिन मतदाओं ने उसे मुख्य विपक्ष की भूमिका में जरूर ला दिया है। यही स्थिति प्रदेश के कई और इलाकों में हुई है। इस दक्षिणी राज्य में पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाया है, इसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन, सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि वह अपना जनाधार बचाकर रख क्यों नहीं पाई है?

600 सीटिंग सीटें हारी, करीब इतनी ही नई सीट जीत गई बीजेपी

600 सीटिंग सीटें हारी, करीब इतनी ही नई सीट जीत गई बीजेपी

2015 के स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी ने केरल में 1,236 वार्ड में जीत दर्ज की थी और उसे 14 फीसदी वोट मिले थे। इस बार पार्टी 2,500 वार्ड जीतने का लक्ष्य लेकर चली थी, लेकिन वह सिर्फ 1,800 सीटें ही जीत पाई। यानि पार्टी यह टैली देखकर खुश हो सकती है कि लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो क्या, वह करीब 600 ज्यादा वार्ड जीतने में सफल हुई। लेकिन, पार्टी इसलिए ज्यादा खुशी नहीं मना पा रही होगी कि 2015 में उसने जितने वार्ड पर कब्जा किया था, उनमें से कम से कम 600 सीटें उसके हाथों से इस बार निकल गई है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के सुंदरन ने इसके लिए एनडीए उम्मीदवारों के खिलाफ एलडीएफ और यूडीएफ की ओर से क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाकर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है।

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    पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाया है

    पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाया है

    जाहिर है कि भारतीय जनता पार्टी जैसे दल के लिए जीती हुई सीटें गंवाना घोर चिंता की वजह हो सकती है, खासकर उस राज्य में जहां अपनी सियासी जमीन तैयार करने के लिए पिछले एक-डेढ़ दशक से वह बहुत ही ज्यादा संघर्ष कर रही है। यही नहीं, ये ऐसा राज्य है जहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संगठन भी काफी मजबूत है। लेकिन, इस चुनाव में बीजेपी के लिए सकारात्मक सोच के साथ आगे की लड़ाई के लिए बढ़ने के भी कई कारण मौजूद हैं। पार्टी ने इस बार उन सीटों को बड़ी तादाद में जीत लिया है, जहां पर अब तक उसकी मौजूदगी ना के बराबर थी। परिणाम बताते हैं कि प्रदेश भर के 600 वार्ड में वह दूसरे नंबर पर रही है। 100 वार्ड वाले तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भी वह 32 वार्ड में दूसरे नंबर पर रही है। यहां बीजेपी ने 35 सीटें अपने पास बरकार रखी है, लेकिन यहां भी 10 सीटिंग सीटें वह सीपीएम के हाथों गंवा बैठी है। कोझीकोड में भी पार्टी ने वही कहानी दोहराई है। उसे पिछली बार की तरह ही 7 सीटें मिली हैं, लेकिन 5 सीटिंग सीटों पर चुनाव हार गई है।

    23 ग्राम पंचायतों पर भाजपा काबिज

    23 ग्राम पंचायतों पर भाजपा काबिज

    अगर केरल के ग्राम पंचायतों की बात करें तो पार्टी ने 2015 के मुकाबले अपना प्रदर्शन काफी सुधार किया है। 2015 में उसका 14 ग्राम पंचायतों पर कब्जा था तो इस बार उसने 23 ग्राम पंचायतों पर कब्जा कर लिया है। इसी तरह नगरपालिकाओं और नगर निगमों में भी पार्टी ने अपने निर्वाचित सदस्यों की संख्या में अच्छा सुधार किया है। लेकिन, भाजपा या एनडीए एक भी ब्लॉक या जिला पंचायत पर नियंत्रण नहीं कर सकी है। अगर ओवरऑल रिजल्ट की बात करें तो 941 ग्राम पंचायतों में से सत्ताधारी एलडीएफ का 514, 14 में से 10 जिला पंचायतों और 152 में से 108 ब्लॉक पंचायतों पर कब्जा हो गया है। वहीं कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ को 375 ग्राम पंचायत, 44 ब्लॉक पंचायत और 4 जिला पंचायतों पर कब्जा मिला है।

    सबरीमाला आंदोलन से भाजपा को हुआ फायदा

    सबरीमाला आंदोलन से भाजपा को हुआ फायदा

    अभी तक बीजेपी सिर्फ पलक्कड़ नगरपालिका पर काबिज थी। इस बार उसने पलक्कड़ नगरपालिका पर तो कब्जा बरकरार ही रखा है, एलडीएफ से पंदलम नगरपालिका भी छीन ली है। गौरतलब है कि पंदलम उसी पत्तनमतिट्टा जिले में है, जो 2018 में पवित्र सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बना था। भाजपा ने सबरीमाला मंदिर की पवित्रता तोड़े जाने की कोशिश के खिलाफ एलडीएफ सरकार का सख्त विरोध किया था। पार्टी ने जिले की कई ग्राम पंचायतों में भी जीत दर्ज की है। पार्टी ने दो नगरपालिकाओं में बहुमत में आने के अलावा भी कई नगरपालिकाओं अपनी बेहतरीन उपस्थिति दर्ज कराई है।

    कई समाजों का भरोसा जीता है

    कई समाजों का भरोसा जीता है

    तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्जा करना इस चुनाव में भाजपा का एक मुख्य एजेंडा था। वह सपना पूरा नहीं हुआ है। लेकिन, इस बात में कोई दो राय नहीं कि उसने राज्य के नए इलाकों में अपनी पैठ बना ली है। खासकर इस बात के पुख्ता संकेत है कि पार्टी और एनडीए ने सेंट्रल त्रावणकोर और दक्षिणी केरल की एज्हावा और नायर समाज का भरोसा जीत लिया है। इसकी कोशिश में पार्टी लंबे वक्त से लगी हुई थी।

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