कश्मीर: जहां पाकिस्तानी शेलों से खेलते हैं बच्चे: ग्राउंड रिपोर्ट
वो मेरी सुरक्षा जैकेट को धीरे से छूती है और दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर कहती है, "ये देखो". उसकी छोटी सी मुट्ठी में पाकिस्तान से हुई शेलिंग के टूटे हुए टुकड़े हैं.
काले, बदबूदार लोहे के उन टुकड़ों को वो जीत के मेडल की तरह पेश करती है.
चेहरे पर मुस्कान है क्योंकि आज वो एक अच्छी तादाद बटोर पाई है. उसे इस खेल में बाक़ी बच्चों को पछाड़ने की उम्मीद है.
मैं उससे उन्हें फेंककर साबुन से हाथ धोने को कहती हूं. एक पुलिस अफ़सर ने बताया है कि इन टुकड़ों से रसायनिक गैस निकलती है जो ख़तरनाक हो सकती है.
वो हाथ ख़ींचकर मुट्ठी बंद कर लेती है. मैं पूछती हूं, "तुम्हें डर नहीं लगता"? वो कहती है, "हम बड़े होकर पुलिस बनेंगे, हम बहादुर होंगे, हमें किस बात का डर."
नियंत्रण रेखा के पास के कलसिया गांव में बच्चों का वास्ता गोली, बारूद और उनका इस्तेमाल करनेवालों से ही ज़्यादातर होता है.
तनाव बढ़ने पर स्कूल बंद हो जाते हैं. खेती-मज़दूरी के अलावा पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरियों के आयाम कम हैं.
ज़्यादातर परिवार में से कोई ना कोई पुलिस या फ़ौज में ही नौकरी तलाशता है.
जम्मू के पास राजौरी ज़िले के नौशहरा सेक्टर में हम ज़ीरो प्वाइंट के पास हैं. नियंत्रण रेखा पर बने भारतीय कैंप यहां से दिखाई देते हैं.
ख़तरा बहुत क़रीब है और कई लोगों ने शेलिंग में अपने क़रीबी को खोया है. कलसिया गांव के रतन लाल की पत्नी भी इसी का शिकार हुई थीं.
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जंग की क़ीमत
रतन लाल बताते हैं, "कोई खेती में काम कर रहा है, कोई कहीं पर. जब शेलिंग आती है तो कोई शेल्टर है भी तो वहां पहुंच नहीं सकता. इसी तरह से मेरी पत्नी भी कुंए पर पानी भरने गई थी तो वहां अचानक आकर जब शेल गिरा तो उनकी मौक़े पर ही मौत हो गई."
भारत-पाक तनाव में अपने घर के एक सदस्य को खोने के बावजूद, रतन लाल का बेटा अब फ़ौज में है.
उनके मुताबिक़ पढ़ाई-लिखाई ठीक ना होने की वजह से मजबूरी में उनके बच्चों को फ़ौज में जाना पड़ता है.
अश्विनी चौधरी उनके पड़ोसी हैं. वो कहते हैं लगातार पाकिस्तानी शेलिंग का डर बच्चों के ज़हन पर गहरा असर डालता है.
वो कहते हैं, "ये बच्चे ऐसे हालात में एग्ज़ाम की कोई तैयारी नहीं कर सकते. आप सोचिए कि ये बच्चे दिल्ली और मुंबई के स्कूलों में पढ़े हुए बच्चों के साथ कैसे कम्पीट कर सकते हैं? कभी नहीं कर सकते."
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घर में क़ैद
पास के गनेहा गांव की रहनेवाली सुदेश कुमारी का बेटा भी फ़ौज में श्रीनगर में तैनात है. पर यहां उनकी अपनी ज़िंदगी भी जंग का मैदान ही है.
घर की दीवारों में जगह-जगह छेद हो गए हैं और चारों तरफ़ कांच और मलबा बिखरा हुआ है.
पिछली शाम हुई छह घंटे की शेलिंग का ख़ौफ़ अब भी ताजा है.
दबी आवाज़ में वो बताती हैं, "बंकर भी हिल चुका था. सभी रोने लगे थे. बच्चे भी, बड़े भी. घबरा गए थे. हमारे चारों तरफ़ शेलिंग हो रही थी. हम बाहर निकल नहीं सकते थे."
सुदेश इस माहौल में ख़ुद को घर में कैद पाती हैं. ज़्यादातर औरतें तनाव बढ़ने पर घर छोड़कर जाने से हिचकती हैं.
छोटे बच्चों की खाने-पीने की ज़रूरतें और मवेशियों की देखभाल के अलावा स्कूलों में बनाए जानेवाले राहत कैम्पों में अनजान लोगों के बीच रहना मुश्किल होता है.
बंकर का इंतज़ार
सुदेश ख़ुशकिस्मत हैं कि उनके गांव में बंकर बने हैं. रतन लाल समेत कई गांवों के लोगों को ये भी नसीब नहीं.
पिछले साल अगस्त में गृह मंत्रालय ने सीमावर्ती गांवों में 14,000 बंकर बनाने का ऐलान किया था पर इनमें से 1,500 ही बन पाए हैं.
रतन लाल के गांव समेत कई को इसका अब भी इंतज़ार है.
जम्मू के डिविज़नल कमिश्नर संजीव वर्मा के मुताबिक अगले तीन महीने में वो बाक़ी बंकर बनाने का काम तेज़ी से पूरा करेंगे.
बंकर सुरक्षा तो देता है पर लंबे समय तक इसमें रहना भी आसान नहीं. अक़्सर एक बंकर में दर्जन से ज़्यादा लोग छिपते हैं.
बंकर में पानी भर जाए तो सीलन से और घुटन हो जाती है. जैसा सुदेश के घर के पास के बंकर में भी हुआ है.
सुदेश शादी के बाद यहां आईं. 35 साल नियंत्रण रेखा के ख़तरे में रहने का मलाल तो नहीं पर थक गई हैं.
कहती हैं उस दिन का इंतज़ार है जब शांति आए तो लौटने की जल्दी में ना हो. और बच्चे गोली-बारूद नहीं, फिर से किताबों के साथ खेलने लगें.
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